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गुजरात: कांग्रेस ने अमित शाह- नरेंद्र मोदी के गढ़ में मजबूत की पकड़, भाजपा नहीं कर सकेगी ‘क्लीन स्विप’

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): माना जा रहा है कि 2019 में 2014 का दोहराव हो पाना मुश्किल है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी इन पांच वर्षों में भाजपा को कड़ी चुनौती दी है।

Author March 27, 2019 8:52 PM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी। (Photo: PTI)

Lok Sabha Election 2019: पिछले लोकसभा चुनाव यानी 2014 में गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों की जीत हुई थी। उस वक्त देशभर में नरेंद्र मोदी की लहर थी लेकिन पांच साल बाद स्थितियां वैसी नहीं रहीं। लिहाजा, माना जा रहा है कि 2019 में 2014 का दोहराव हो पाना मुश्किल है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी इन पांच वर्षों में भाजपा को कड़ी चुनौती दी है। सबसे ज्यादा चुनौती नरेंद्र मोदी और अमित शाह के गृह राज्य गुजरात में पेश की है।

इसकी बानगी 2017 के विधान सभा चुनावों में भी देखने को मिला, जब भाजपा का विजय रथ 99 आंकड़ों पर जा रुका। राज्य के कुल 182 विधान सभा सीटों में से भाजपा को 16 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और मात्र 99 सीट से संतोष करना पड़ा, जबकि कांग्रेस ने 16 सीटें ज्यादा हासिल कर 77 पर जीत दर्ज की थी। कई विधान सभा सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है।

सौराष्ट्र की बाढ़ में डूबी भाजपा पर पंजे की पकड़ हुई मजबूत- पिछले विधान सभा चुनाव के नतीजों को देखें तो साफ होता है कि कांग्रेस भाजपा का गढ़ कहे जाने वाले सौराष्ट्र में ज्यादा मजबूत हुई है। इस इलाके की 54 विधान सभा सीटों में से 30 पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की। इस जीत के बाद कांग्रेस नेताओं को उम्मीद है कि सौराष्ट्र इलाके की चार लोकसभा सीटें (अमरेली, जूनागढ़, बोटाड और सुरेंद्रनगर) भाजपा से छीन सकती है।

इनके अलावा कांग्रेस उत्तरी और मध्य गुजरात के आनंद, बनासकांठा और पाटन पर भी नजरें गड़ाई हुई है। वैसे कांग्रेस की नजर दाहोद, छोटा उदयपुर और साबरकांठा पर भी टिकी है। माना जाता है कि साल 2016 में सौराष्ट्र में आई बाढ़ से निपटने में राज्य की भाजपा सरकार नाकाम रही, इस वजह से लोगों ने चुनावों में भाजपा की जगह कांग्रेस को विकल्प के तौर पर चुनना पसंद किया।

पटेल समुदाय के वोट में पांच साल में तिगुना इजाफा- लोकनीति और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के सर्वे के मुताबिक साल 2012 में हुए विधान सभा चुनाव में पाटीदार समाज के 78 फीसदी कदवा पटेलों और 63 फीसदी लेउवा पटेलों ने भाजपा को वोट दिया था लेकिन 2017 के चुनावों में यह आंकड़ा क्रमश: 68% और 51% रह गया। यानी दोनों को जोड़ दें तो यह आंकड़ा 22 फीसदी तक पहुंच जाता है। इससे उलट इन दोनों समुदायों ने कांग्रेस के पक्ष में 2012 के मुकाबले तीन गुना ज्यादा वोट किए।

2012 में यह आंकड़ा क्रमश: 9% और 15% था जो 2017 में बढ़कर 27% और 46% हो गया। इसके अलावा 2017 के चुनावों में पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने कांग्रेस नहीं ज्वाइन की थी। इसके अलावा भाजपा ने चतुराई दिखाते हुए न केवल हार्दिक पटेल की अहम सहयोगी रेशमा पटेल को अपने पाले में कर लिया था बल्कि हार्दिक की तथाकथित सीडी भी जारी की थी।

हार्दिक ने थामा कांग्रेस का हाथ, रेशमा ने फूंकी शाह के खिलाफ बगावत- पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल ने कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। इससे उलट 2017 के विधान सभा चुनावों के वक्त भाजपा में शामिल हुई उनकी सहयोगी रेशमा पटेल ने करीब डेढ़ साल बाद न केवल भाजपा छोड़ दी है बल्कि अमित शाह के खिलाफ बगावत का बिगूल फूंक दिया है। रेशमा ने कहा है कि वो पोरबंदर से लोकसभा चुनाव और मनवाडार से विधान सभा उप चुनाव लड़ेंगी। अगर किसी भी पार्टी से टिकट नहीं मिला तो वो निर्दलीय खड़ी होकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ेंगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की पकड़ हुई मजबूत- गुजरात में आई बाढ़ के अलावा कृषि संकट, रोजगार संकट की वजह से गुजरात के ग्रामीण इलाकों में भी भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश उभरा है। आनंद के डेयरी किसान पर्याप्त कीमत नहीं मिलने से नाराज हैं, जबकि तंबाकू किसान, प्याज उत्पादक न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग कर रहे हैं और चुनावों का बहिष्कार करने की धमकी दे रहे हैं। पिछले दिनों भावनगर में भी पुलिस ने आंदोलनरत किसानों पर लाठीचार्ज किया था। इस बीच, कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पंजाब और कर्नाटक सरकारों द्वारा किसानों की कर्जमाफी का एलान कर गुजरात के किसानों को भी लुभाने की कोशिश की है। बता दें कि मूंगफली घोटाला भी भाजपा के लिए काल बन चुका है। 2017 में सौराष्ट्र के अधिकांश किसान इससे प्रभावित हुए थे जहां भाजपा को सबसे अधिक सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है।

आडवाणी समेत बुजुर्गों का टिकट काटने से भुगतना पड़ सकता है खामियाजा- भाजपा ने अपने संस्थापकों में शामिल रहे दिग्गज नेता लालकृषण आडवाणी का गांधीनगर संसदीय सीट से टिकट काट है। उनके अलावा सुरेंद्र नगर से देवजी फातेपारा का भी टिकट काटा गया है। भाजपा ने 26 मौजूदा सांसदों में से फिलाहल 14 को ही दोबारा मैदान में उतारा है। सूत्रों के मुताबिक तीन से चार अन्य सांसदों का भी टिकट काटा जा सकता है। इनमें पोरबंदर से विट्ठल राडिया का भी नाम शामिल है।

इनके अलावा भाजपा आनंद, जूनागढ़, पाटन, बनासकांठा, मेहसाणा और छोटा उदयपुर के सांसदों पर भी गाज गिरा सकती है। इन इलाकों में पार्टी को सबसे ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ रहा है। माना जा रहा है कि इतने नेताओं का टिकट काटे जाने से उनके समर्थक भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उधर, कांग्रेस ने मौके की नजाकत को देखते हुए आनंद से पूर्व केंद्रीय मंत्री और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भरत सोलंकी को उम्मीदवार बनाया है, वो वहां से 2004, 2009 में जीत चुके हैं।

अहमद पटेल को अहमियत: कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2019 को न केवल राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी की चुनावी जंग बना दिया है बल्कि कई मोर्चों पर कांग्रेस भाजपा के खिलाफ दो-दो हाथ कर रही है। पार्टी ने इसी के मद्देनजर अहमद पटेल को पिछले साल मुश्किल परिस्थितियों में भी राज्यसभा भेजने में कामयाबी हासिल की। ऐसा कर कांग्रेस ने अमित शाह को करारी शिकस्त दी क्योंकि शाह किसी भी सूरत में पटेल को रोकना चाहते थे। इसके बाद पार्टी ने अहमद पटेल का कद बढ़ाते हुए उन्हें कोषाध्यक्ष बनाया।

दरअसल, अहमद पटेल को कांग्रेस का चाणक्य कहा जाता है। वो भाजपा के हिन्दू ध्रुवीकरण की काट के रूप में जाने जाते हैं क्योंकि उनकी स्वीकार्यता गुजरात में ‘अहमद’ और ‘पटेल’ दोनों समुदायों में है। कांग्रेस ने इसी वजह से अहमद पटेल का न केवल कद ऊंचा किया बल्कि सियासी समीकरण साधने की भी बड़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर सौंपी है। 2017 के विधान सभा चुनावों में उसकी बानगी दिख चुका है।

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