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Lok Sabha Election 2019: लोकसभा नतीजों से तय होगा विधानसभा का रास्ता

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): भाजपा और कांग्रेस के मतदाताओं का बंटवारा दिल्ली में साफ दिखता रहा है। कांग्रेस को मुख्य रूप से दलित, अल्पसंख्यक, कमजोर वर्ग के लोग, पूर्वांचल के प्रवासी और दिल्ली देहात के लोगों में बड़ा समर्थन था।

अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित। (file pic)

Lok Sabha Election 2019: लोकसभा चुनाव के नतीजों के आने से पहले ही दस महीने बाद होने वाले दिल्ली विधानसभा के समीकरण बनने लगे हैं। माना जा रहा है कि इस बार के लोकसभा चुनाव के नतीजों का असर विधानसभा चुनाव पर ज्यादा हो सकता है। फरवरी, 2015 के विधानसभा चुनाव में 70 में 67 सीटों का प्रचंड बहुमत लाने वाली आम आदमी पार्टी का असर कम हो रहा है। उसने जिस कांग्रेस के वोट बैंक को हासिल करके ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, वही कांग्रेस इस लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करती दिख रही है। सही जानकारी तो 23 मई को नतीजे घोषित होने के बाद सामने आएगी, लेकिन दिल्ली के मतदाता एक होने के बावजूद नगर निगमों, विधानसभा और लोकसभा में एक तरह का जनादेश नहीं देते रहे हैं। कई बार तो एक चुनाव से विपरित नतीजे दूसरे चुनाव के होते रहे हैं।

मतदाता एक, नतीजे अनेक
2015 के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ को 70 विधानसभा में 67 सीटों और 54 फीसद वोट मिले, इसके बाद ‘आप’ कमजोर होते गई। राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में उसके उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई। 2017 के निगम चुनाव में अगर बगावत न होती तो कांग्रेस दूसरे नंबर पर होती, जैसा राजौरी गार्डन विधानसभा उप चुनाव और 2016 में निगमों के उप चुनाव में हुआ था। दिल्ली नगर निगमों का इलाका दिल्ली का 87 फीसद इलाका है। भाजपा की त्रासदी यह है कि 1993 के विधानसभा चुनाव के बाद विधानसभा और निगमों के चुनाव में उसके वोट 37 फीसद से ज्यादा नहीं बढ़े। 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 43 फीसद वोट मिले और वह सत्ता में आ गई। संयोग से तीन बार से इतने ही वोट आने पर गैर भाजपा मतों का बंटवारा होने पर भाजपा निगमों के चुनाव में जीत हासिल करती रही है।

मतदाताओं की बदली है पसंद
भाजपा और कांग्रेस के मतदाताओं का बंटवारा दिल्ली में साफ दिखता रहा है। कांग्रेस को मुख्य रूप से दलित, अल्पसंख्यक, कमजोर वर्ग के लोग, पूर्वांचल के प्रवासी और दिल्ली देहात के लोगों में बड़ा समर्थन था। उन्हीं के बूते कांग्रेस सालों दिल्ली पर राज करती रही। भाजपा को मध्यमवर्ग, पाकिस्तान से आए पंजाब मूल के लोगों, व्यवसायी, सरकारी कर्मचारी आदि की पार्टी मानी जाती थी। कांग्रेस के माने जाने वाले वोटरों में कांग्रेस से ज्यादा पैठ ‘आप’ की हो गई है। ‘आप’ को कुछ वैश्य बिरादरी का भी समर्थन मिला है।

कहा जाता है कि मध्यमवर्ग का भी झुकाव 2015 के विधानसभा चुनाव के समय ‘आप’ के पक्ष में हो गया था। यह जरूर है कि अगर ‘आप’ को लोकसभा चुनाव में सफलता नहीं मिली तो उसके लोगों में हड़कंप मच जाएगा और पार्टी नेताओं को पार्टी बचाने के लिए काफी मेहनत करनी होगी। यह भी संभव है कि इस चुनाव की बुनियाद पर कांग्रेस के लोग फिर से सक्रिय हो जाएं। इसका असर विधानसभा चुनाव की तैयारी पर जरूर होगा, लेकिन वही नतीजे विधानसभा में होंगे जो लोकसभा में आएंगें, कहना कठिन होगा।

आती-जाती रही सत्ता
1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पांच सीटें मिलीं और 1997 निगम चुनाव भाजपा जीती, लेकिन 1998 विधानसभा चुनाव कांग्रेस जीत गई, जबकि 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा सभी सातों सीटें जीती, लेकिन 2002 के निगम चुनाव और 2003 के विधानसभा चुनाव कांग्रेस जीत गई। 2004 लोस चुनाव कांग्रेस जीती और 2007 निगम चुनाव भाजपा जीती जबकि 2008 के विधानसभा चुनाव कांग्रेस जीती। 2009 लोकसभा फिर कांग्रेस ने जीत दर्ज की, लेकिन 2012 के निगम चुनावों में भाजपा को जीत मिली। 2013 आते-आते दिल्ली की राजनीति में ‘आप’ की धमाकेदार एंट्री हुई और 2013 के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ ने करीब तीस फीसद वोट और 28 सीटें लेकर कांग्रेस को तीसरे नंबर पर धकेल दिया। बिना मांगे कांग्रेस के समर्थन से 49 दिन की सरकार बनाई और जबरन लोकपाल बिल पेश करने से रोकने के बहाने इस्तीफा दे दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 46 फीसद से ज्यादा वोट प्राप्त करके सातों सीटें जीत लीं। कांग्रेस के बजाए ‘आप’ हर सीट पर दूसरे नंबर पर रही।

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