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कांग्रेस में भी हैं एक ‘मौसम वैज्ञानिक’, 17 साल बाद गुलाम नबी आजाद फिर मार सकते हैं यू-टर्न

Lok Sabha Poll 2019: लंबे समय तक केंद्र की राजनीति में सक्रिय रहे आजाद ने 17 साल बाद अपने स्टैंड से यू-टर्न लेते हुए फिर से गृह राज्य जम्मू-कश्मीर का रुख किया है। पिछले दिनों वो जम्मू स्थित कांग्रेस मुख्यालय में दिखे। आजाद 17 साल बाद वहां गए थे।

कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद। साथ में अहमद पटेल और पी एल पुनिया। (एक्सप्रेस फोटो)

Lok Sabha Poll 2019: मिशन 2019 को साधने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में न केवल पुराने प्रभारी महासचिव बदले बल्कि बहन प्रियंका गांधी और विश्वस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया को वहां का प्रभार दिया। इस दौरान पुराने प्रभारी महासचिव गुलाम नबी आजाद को हरियाणा का प्रभार दिया गया। इस फेरबदल के बाद आजाद ने भी अपनी रणनीति में फेरबदल किया है। लंबे समय तक केंद्र की राजनीति में सक्रिय रहे आजाद ने 17 साल बाद अपने स्टैंड से यू-टर्न लेते हुए फिर से गृह राज्य जम्मू-कश्मीर का रुख किया है। पिछले दिनों वो जम्मू स्थित कांग्रेस मुख्यालय में दिखे। आजाद 17 साल बाद वहां गए थे और इस बीच उन्होंने एक बार भी प्रदेश दफ्तर का रुख नहीं किया था।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह आजाद का नया दांव लगता है क्योंकि इससे पहले साल 2002 में भी उन्होंने ऐसा ही किया था। तब गुलाम नबी आजाद केंद्र की राजनीति में कमजोर पड़ने के बाद जम्मू-कश्मीर जा पहुंचे थे। उस वक्त उनके समर्थकों ने पार्टी अध्यक्ष से मांग की थी कि आजाद को राज्य कांग्रेस का प्रमुख बनाया जाय। इसके लिए आजाद के समर्थकों ने जम्मू से लेकर नई दिल्ली तक आंदोलन किया था।

अंत में थक हारकर पार्टी नेतृत्व ने गुलाम नबी आजाद को राज्य कांग्रेस का प्रमुख बना दिया था। कांग्रेस ने उनके ही नेतृत्व में 2002 का विधान सभा चुनाव लड़ा था। उनका जादू चल गया था। राज्य में मृतप्राय पड़ी कांग्रेस ने चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया था। बाद में पीडीपी के साथ मिलकर कांग्रेस ने सरकार बनाई। आजाद भी आधे टर्म के बाद साल 2005 में राज्य के सीएम बने। 70 वर्षीय गुलाम नबी आजाद को राज्य के धुरंधर नेताओं में गिना जाता है, इसके अलावा कांग्रेस में भी उनकी गिनती तेज-तर्रार नेता के रूप में है लेकिन अचानक 17 साल बाद फिर से केंद्र की राजनीति छोड़कर राज्य की ओर वापसी करने का उनका दांव एक मौसम वैज्ञानिक के बदलाव के लंबे अनुमान की तरह लग रहा है। राज्य में फिलहाल कांग्रेस की स्थिति खस्ताहाल है, आने वाले कुछ महीनों में चुनाव होने वाले हैं। हो सकता है लोकसभा चुनावों के साथ ही विधान सभा चुनाव भी हो। ऐसे में दिल्ली छोड़ जम्मू के दफ्तर में आजाद के जमने के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।

राज्य में पार्टी पर आजाद की अच्छी पकड़ मानी जाती है। पार्टी में कई गुटों में बंटे नेताओं पर भी उनकी अच्छी पकड़ है। संभव है कि आलाकमान ने ही उन्हें जम्मू-कश्मीर में फिर से पार्टी को जिताने का जिम्मा उनके कंधों पर सौंपा हो। इसके अलावा चुनाव बाद पीडीपी या नेशनल कॉन्फ्रेन्स से भी गठबंधन की संभावनाओं के लिए भी आजाद उपयुक्त व्यक्ति हैं। पिछले ही साल कर्नाटक में जेडीएस के साथ कांग्रेस की साझा सरकार बनाने में आजाद ने बड़ी भूमिका निभाई थी और एचडी देवगौड़ा और उनके बेटे एचडी कुमारास्वामी पर चारों तरफ से सियासी घेराबंदी की थी। बता दें कि आजाद 1989 से लगातार राज्य सभा के सांसद रहे हैं। फिलहाल वो सदन में विपक्ष के नेता हैं। उन्होंने 1973 में राजनीति में एंट्री ली थी लेकिन पहला चुनाव जीतने के लिए 30 साल का इंतजार करना पड़ा था।

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