ममता बनाम भाजपा: पांच साल में बढ़ा 8% वोट बैंक, पश्चिम बंगाल में ऐसे “भगवा रंग” भरती रही बीजेपी

दो साल पहले अप्रैल 2017 तक भाजपा और आरएसएस ने संयुक्त तौर पर अलग-अलग जिलों में 175 जगहों पर राम नवमी मनाने की घोषणा की थी। इसके बाद के दो वर्षों में राज्य में रामनवमी पर इन संगठनों द्वारा अभूतपूर्व तौर पर "सशस्त्र जुलूस" निकाले गए।

Author Updated: February 6, 2019 3:44 PM
तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी। (एक्सप्रेस आर्काइव)

2019 के लोकसभा चुनावों के लिए वैसे तो भाजपा देशभर में एड़ी चोटी एक किए हुए है लेकिन पश्चिम बंगाल पर उसकी खास नजर है। इसकी बड़ी वजह यह है कि उत्तर प्रदेश (80) और महाराष्ट्र (48) के बाद यहां से सबसे ज्यादा (42) लोकसभा सदस्य चुने जाते हैं। फिलहाल भाजपा के यहां से दो सांसद हैं और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की चाहत यहां से 23 सीटें जीतने की है। इस वजह से भाजपा ने पश्चिम बंगाल में पीएम नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, यूपी के सीएम और हिन्दुत्व के नए फायरब्रांड योगी आदित्यनाथ और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को विशेष तौर पर उतारा है। शनिवार (02 फरवरी) को पीएम मोदी ने बांग्लादेश की सीमा से सटे ठाकुरनगर में न केवल चुनावी रैली का आगाज किया बल्कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर भी राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस से समर्थन मांगा। टीएमसी इस विधेयक का विरोध कर रही है क्योंकि इस बिल में बांग्लादेश से आए प्रवासियों में हिन्दू समुदाय विशेष के लिए खास प्रबंध किए गए हैं जबकि मुस्लिमों को उससे वंचित रखा गया है।

दरअसल, पश्चिम बंगाल की मुस्लिम आबादी पारंपरिक तौर पर वाम दलों की समर्थक रही है लेकिन ममता बनर्जी के उभार के बाद यह वोट बैंक टीएमसी की तरफ शिफ्ट होता चला गया। पश्चिम बंगाल वाम दलों का गढ़ भी रहा है लेकिन 2011 से यहां ममता का राज है। अब ममता राज को उखाड़ फेंकने के लिए भाजपा जोर लगाए हुई है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इसी वजह से साल 2017 में नक्सलवाड़ी से मिशन 2019 के अपने राष्ट्रीय अभियान की शुरुआत की थी। हालांकि, तब कहा गया कि भाजपा-आरएसएस ने संयुक्त तौर पर लेफ्ट की विचारधारा और जड़ पर प्रहार किया है। इसके तुरंत बाद पड़ोसी राज्य त्रिपुरा से 25 वर्षों के सीपीएम शासन का खात्मा भी हो गया लेकिन अब भाजपा के निशाने पर तृणमूल कांग्रेस है। भाजपा टीएमसी को ही न्यू लेफ्ट मानती है।

अब पश्चिम बंगाल में लेफ्ट और राइट की सियासी लड़ाई नंबर गेम की राजनीतिक लड़ाई बन चुकी है। जो कोई दल बंगाल का विजेता होगा, वही 2019 में किंगमेकर होगा। 2014 में जब देशभर में मोदी लहर थी तब यहां से भाजपा ने मात्र दो सीटें (दार्जिलिंग और आसनसोल) जीती थीं। ममता बनर्जी की टीएमसी ने 42 में से 34 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने चार और वाम दलों ने दो सीटें जीती थीं। 2014 में तृणमूल कांग्रेस लोकसभा में चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। अगर टीएमसी ने 2019 में फिर बेहतर प्रदर्शन किया तो गठबंधन सरकार की सूरत में ममता बनर्जी प्रधानमंत्री पद की दावेदार भी हो सकती हैं।

इधर, भाजपा का प्रदर्शन भी राज्य में बेहतर होता दिख रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 14 फीसदी वोट हासिल हुए थे। उससे पहले 2016 के विधान सभा चुनाव में उसे 10 फीसदी और 2009 के लोकसभा में मात्र 6 फीसदी वोट मिले थे। यानी पांच सालों में भाजपा के वोट बैंक में पश्चिम बंगाल में आठ फीसदी का इजाफा हुआ है। 2014 में भाजपा (17%) तीसरे नंबर पर थी। सबसे ज्यादा टीएमसी को 40 फीसदी, लेफ्ट को 30 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस को मात्र 10 फीसदी वोट मिले थे। भाजपा के इस प्रदर्शन ने आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों को नई ऊर्जा दी है। पहले इन संगठनों की उपस्थिति राज्य में इक्के-दुक्के जगहों पर थी जिसका अब तेजी से फैलाव हो रहा है। ये संगठन अब राज्य में अधिक मुखर भी हो चुके हैं।

दो साल पहले अप्रैल 2017 तक भाजपा और आरएसएस ने संयुक्त तौर पर अलग-अलग जिलों में कुल 175 जगहों पर रामनवमी मनाने की घोषणा की थी। इसके बाद के दो वर्षों में राज्य में रामनवमी पर इन संगठनों द्वारा अभूतपूर्व तौर पर “सशस्त्र जुलूस” निकाले गए। इसके जवाब में  तृणमूल कांग्रेस ने भी रामनवमी पर राज्यभर में जुलूस निकाले। दोनों दलों ने बाद में हनुमान जयंती पर भी उत्सव की घोषणा की जो बंगाल में पहले कभी नहीं हुआ। रामनवमी पर कई जगहों पर साम्प्रदायिक हिंसा भी भड़की। 2017 में हुगली, 2018 में रानीगंज, आसनसोल और पुरुलिया में दंगे हुए। इससे पहले 2016-17 के दिसंबर-जनवरी में भी धूलगढ़ और उल्बेरिया (हावड़ा) में दंगे हुए थे। उसी साल भाजपा ने उल्बेरिया उप चुनाव में सीपीएम को धकेलते हुए दूसरे नंबर पर अपनी मौजूदगी दर्शाई थी।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मौजूदा स्थिति में राज्य में भाजपा और टीएमसी के बीच ही मुकाबला है। हालांकि, सीपीएम और कांग्रेस भी सियासी शतरंज के खिलाड़ी हैं मगर कांटे की टक्कर उन्हीं दोनों दलों के बीच है। राजनीतिक समीक्षकों के मुताबिक यह स्थिति पिछले पंचायत चुनाव (मई 2018) के बाद से साफ हुई है। इन चुनावों में आरोप लगे थे कि टीएमसी ने करीब 34 फीसदी सीटों पर बिना चुनाव लड़े कब्जा कर लिया था। इसमें या तो विपक्षियों को नामांकन करने से रोका गया था या फिर वोट डालने से रोका था। इससे खफा लोगों की गोलबंदी भाजपा के पक्ष में होने लगी। जानकारों का मानना है कि यह गोलबंदी भाजपा के लिए सीटों में तब्दील हो सकती है। बता दें कि पिछले महीने ममता बनर्जी ने भी अपना शक्ति प्रदर्शन किया था और कोलकाता में एक मंच पर 23 दलों के महारथियों का जुटान कर विपक्षी एकता का संदेश भाजपा को दिया था।

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