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Lok Sabha Election 2019: सुरक्षित सीटों ने बढ़ाई राजग में रार, जदयू की मांग से लोजपा बेचैन, भाजपा परेशान

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं और उनमें से छह सीटें सुरक्षित हैं। इन छह सीटों ने सभी दावेदारों को बेचैन कर रखा है। बता दें कि ये 6 सीटें हैं गया, सासाराम, गोपालगंज, हाजीपुर, जमुई और समस्तीपुर।

प्रतीकात्मक फोटो, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

Lok Sabha Election 2019:  बिहार में लोकसभा की सुरक्षित सीटों ने दावेदारों को बेचैन कर रखा है। राजग में उम्मीदवारों की घोषणा का एक पेच यह भी है। बहरहाल जदयू ने अपने कोटे की सीटों की सूची भाजपा के हवाले तो कर दी है, लेकिन उसमें दर्ज दो सुरक्षित सीटों ने लोजपा को परेशान कर रखा है।

राज्य में लोकसभा की 40 सीटें हैं: राज्य में लोकसभा की 40 सीटें हैं और उनमें से छह सुरक्षित। पिछले चुनाव में छह की छह सीटें राजग के खाते में आई थीं। उनमें गया जैसी परंपरागत सीट भी थी, जिस पर भाजपा पिछले कई चुनावों से जीत दर्ज कराती रही है। गया से सटे सासाराम लोकसभा क्षेत्र भी भाजपा के खाते में गई थी। उसके अलावा भाजपा के हिस्से की एक सीट उत्तर बिहार में गोपालगंज है। गया में हरि मांझी, सासाराम में छेदी पासवान और गोपालगंज में जनक राम विजयी रहे थे। इस बार इन तीन सीटों में से कोई एक जदयू के हिस्से में जाने वाली है। गया की अपेक्षा सासाराम और गोपालगंज पर विशेष नजर है। उन दोनों क्षेत्रों के सांसद एक से दूसरे दल में एडजस्ट हो जाने वाले मिजाज के हैं। जिताऊ उम्मीदवार की एक शर्त में भाजपा-जदयू के लिए यह सुविधाजनक स्थिति मानी जा रही। चुनाव चिह्न हमारा, उम्मीदवार तुम्हारा वाली व्यवस्था पहले भी चलती रही है।

बिहार में लोकसभा की सुरक्षित सीटों का पिछला रिकॉर्ड

सीट विजेता (पार्टी) उप विजेता (पार्टी)
गया हरि मांझी (भाजपा) रामजी मांझी (राजद)
सासाराम छेदी पासवान (भाजपा) मीरा कुमार (कांग्रेस)
गोपालगंज जनक राम (भाजपा) डॉ. ज्योति भारती (कांग्रेस)
हाजीपुर रामविलास पासवान (लोजपा) संजीव प्रसाद टोनी (कांग्रेस)
जमुई चिराग पासवान (लोजपा) सुधांशु शेखर भास्कर (राजद)
समस्तीपुर रामचंद्र पासवान (लोजपा) अशोक राम (कांग्रेस)


हासिल तीनों सीटें परिवार के नाम :
हाजीपुर, जमुई और समस्तीपुर भी अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्र हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में ये तीनों सीटें लोजपा के खाते में गई थीं। दिलचस्प यह कि तीनों की तीनों सीटों पर पासवान परिवार के चेहरे विजेता रहे। लोजपा का मतलब ही एक तरह से पासवान परिवार होता है। पासवान परिवार यानी रामविलास पासवान का परिवार। रामविलास पासवान ने हाजीपुर का मैदान मारा था। वे लोजपा के अध्यक्ष हैं। उनके पुत्र चिराग पासवान जमुई से विजयी हुए थे। संसदीय राजनीति की अपनी पहली लड़ाई में ही वे जीत का स्वाद चख लिए। चिराग अभी लोजपा के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। समस्तीपुर में रामचंद्र पासवान ने जीत दर्ज कराई थी। वे रामविलास पासवान के सगे भाई हैं। इस बार जदयू को इनमें से कोई दो या एक सीट चाहिए ही चाहिए।

जमुई में कोई समझौता नहीं करेगी लोजपा: जमुई में मतदान पहले ही दौर में होने वाला है और वहां से चिराग पासवान ने अपनी तैयारी भी शुरू कर रखी है। इस मद्देनजर बहुत कम संभावना है कि लोजपा वह सीट खाली करे। अपनी सेहत के तकाजे से रामविलास पासवान इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे। वे पहले ही इसकी घोषणा कर चुके हैं। वैसे हाजीपुर की जातीय संरचना पासवान परिवार की जीत के मुफीद बैठती है। इस कारण भी लोजपा के लिए इस सीट से समझौता कर पाना थोड़ा कठिन हो रहा है। परिवार में यहां से कई उम्मीदवार हैं। समस्तीपुर वाले रामचंद्र पासवान के अलावा रामविलास पासवान के दूसरे भाई व राज्य सरकार में मंत्री पशुपति पारस भी। रामविलास पासवान की पत्नी रीना पासवान भी दावेदार बताई जा रहीं।

रामचंद्र को एडजस्ट करने की समस्या: समस्तीपुर से दावेदारी छोडऩे पर परिवार के एक सदस्य के रूठने की आशंका है। अगर हाजीपुर में रीना पासवान या पशुपति पारस उम्मीदवार होते हैं तो फिर रामचंद्र पासवान को एडजस्ट करने की चुनौती होगी। लोजपा के लिए यही परेशानी है। पासवान परिवार को बिहार के बजाय दिल्ली की सियासत ज्यादा रास आती है। वहां पद-प्रभाव के लिए गुंजाइश बन आती है। यह पहली बार हुआ है कि राज्य की सरकार में इस परिवार भी कोई नुमाइंदा है।

जदयू की भी अपनी मजबूरी : अब तनिक जदयू की परेशानी समझनी चाहिए। एक दौर में पार्टी व प्रदेश के मौजूदा मुखिया नीतीश कुमार ने दलितों में से महादलित का निर्धारण किया। तब यह दलितों के सामाजिक-राजनीतिक उद्धार की एक पहल बताई गई। अब महादलित वर्ग की संवैधानिक व्यवस्था नहीं रही, लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा बलवती हो चुकी है। राजनीतिक विश्लेषक रामप्रवेश सिंह कहते हैं कि वैसे भी उस वर्ग के वोट के लिए उसकी नुमाइंदगी निर्धारित करनी होगी। सामान्य सीट से अनुसूचित जाति या जनजाति के उम्मीदवार की जीत बेहद कठिन होगी। इस बार की गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा कोई दल या गठबंधन किसी सीट को यूं ही दांव पर लगा भी नहीं सकता। ऐसे में जदयू को सुरक्षित सीट चाहिए ही चाहिए। पार्टी की मांग कम से कम दो सीटों की है। लोजपा को जदयू वैसे भी भाजपा का सहयोगी मानता है। ऐसे में लोजपा को मनाने की जिम्मेदारी भाजपा की बन आई है।

 

भाजपा के सामने है धर्मसंकट : भाजपा का ग्राफ सुरक्षित सीटों की बदौलत अब तक आगे रहा है। फिलहाल की स्थिति में पार्टी के लिए यही मुसीबत है। अंदरखाने नाराजगी के साथ विद्रोह की आशंका है। अब बची उम्मीदवारों की अदला-बदली की बात। इस संदर्भ में भाजपा के लिए निर्णय लेना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन लोजपा को मना पाना टेढ़ी खीर है। लोजपा की पूरी सियासत उसी तबके के हवाले से है, जिसके लिए सीटें आरक्षित होती हैं। दलित और महादलित की खींची गई विभाजक रेखा के समय लोजपा को वैसे भी एक दूसरी तरह की समस्या का सामना करना पड़ा था। इस विभाजन में अंतत: केवल पासवान बिरादरी ही दलित के खाने में रह गई थी। अनुसूचित जाति के शेष उप वर्ग महादलित के खाने में आ गए थे।

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