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अब उड़न खटोलों में उड़ते राजनेता!

चुनाव प्रचार में जमीनी हकीकत की बात करने वाले नेता हवा हवाई हो रहे हैं। कम समय में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की विवशता शायद कारण है कि हर उम्मीदवार को छोटे विमानों या हेलिकॉप्टरों का सहारा लेना पड़ रहा है।

Author April 16, 2019 1:52 AM
चुनावी मौसम शुरू होते ही आसमान नेताओं के हेलिकॉप्टरों व छोटे विमानों से पट रहा है। अब हर पार्टी चुनावी मौसम में हेलिकॉप्टर या छोटे विमानों पर ज्यादा से ज्यादा आश्रित होने लगी हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

श्रीशचंद्र मिश्र
चुनाव प्रचार में जमीनी हकीकत की बात करने वाले नेता हवा हवाई हो रहे हैं। कम समय में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की विवशता शायद कारण है कि हर उम्मीदवार को छोटे विमानों या हेलिकॉप्टरों का सहारा लेना पड़ रहा है। मथुरा से दूसरी बार सांसद बनने की कोशिश में जुटीं हेमा मालिनी का फसल काटते हुए एक फोटो खास चर्चित हुआ। खेत तक पहुंचने के लिए वे हेलिकॉप्टर से गईं। अमेठी के अलावा केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ रहे राहुल गांधी का हेलिकॉप्टर जब सभा स्थल पर मंडराया तो काफी समय तक धूल का अंधड़ छा गया। चुनावी मौसम शुरू होते ही आसमान नेताओं के हेलिकॉप्टरों व छोटे विमानों से पट रहा है। अब हर पार्टी चुनावी मौसम में हेलिकॉप्टर या छोटे विमानों पर ज्यादा से ज्यादा आश्रित होने लगी हैं। कुछ नेताओं ने तो चुनाव की तारीखों की घोषणा होने से पहले हवा में उड़ना शुरू कर दिया था। पर्टियां जिन उड़न खटोलों को किराए पर लेती हैं, वे रोज औसतन दो से तीन घंटे उड़ते हैं। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ हेलिकॉप्टर व विमान अब नेताओं को उड़ाने के लिए उपलब्ध हैं। पार्टियों की बढ़ती मांग को देखते हुए किराए पर विमान या हेलिकॉप्टर देने वाली कंपनियां मुस्तैद हो गई हैं। चुनाव प्रचार में इस बार 80 हेलिकॉप्टर और 65 छोटे विमान इस्तेमाल होने की उम्मीद है।

हाजिर हैं हर तरह के उड़न खटोले
ज्यादातर हेलिकॉप्टर या छोटे विमान और औद्योगिक घरानों से लिए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं जिंदल ग्रुप। उसके पास ग्लोबल 5000 (लग्जरी), फाल्कान 7 एक्स, एक्स एलएस साइटेशन, साइटेशन जेट, प्लाटस, वेल 407, बेल 429, ए डब्ल्यू 109 पावर, फाल्कन 2000, बेल 407, बेल 412 जैसे विमान अरसे से चुनाव प्रचार में इस्तमाल किए जा रहे हैं। चुनाव प्रचार के लिए बड़े पैमाने पर छोटे विमान या हेलिकॉप्टर किराए पर लेने का सिलसिला भाजपा ने 1990 के दशक में शुरू किया था। लालकृष्ण आडवाणी हवा में सबसे ज्यादा उड़ने वाले नेता रहे हैं। 2009 के आम चुनाव में उन्होंने बेल 412 हेलिकॉप्टर में करीब दो सौ घंटे की उड़ान भरी। 1995 में तो एक दिन में वे ग्यारह घंटे हवा में रहे। एक दिन में इतने समय तक हेलिकॉप्टर में रहने का यह रेकॉर्ड आज तक नहीं टूट सका है। सीटों की संख्या और तकनीकी दक्षता के आधार पर हेलिकॉप्टर या विमान का किराया तय होता है जो डेढ़ लाख रुपए से शुरू होकर तीन-साढ़े लाख रुपए प्रति घंटे तक पहुंच जाता है।

हेलिकॉप्टर और छोटे विमान के प्रति घंटे किराए में 12.36 फीसद सेवा कर अलग से लिया जाता है। इसके अलावा अन्य शुल्क के रूप में 15 फीसद लिए जाते हैं जिसमें उन्हें उतारने, पार्किंग करने व सुरक्षा के उपाय करने का दाम शामिल है। चुनाव प्रचार में इस्तेमाल होने वाले हेलिकॉप्टरों में करीब 50 करोड़ की लागत वाला बेल 429 हेलीकॉप्टर सबसे आलीशान है। एक घंटे की इसकी उड़ान का किराया डेढ़ लाख रुपए से एक लाख 65 हजार रुपए है। पिछले विधानसभा चुनाव के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसी हेलिकॉप्टर के जरिए प्रचार किए। आगस्ता वेस्टलैंड 109 हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने किया। राज्य स्तरीय नेताओं को बेल 407 हेलिकॉप्टर ज्यादा भाता है। चुनाव में प्रचार के लिए हेलिकॉप्टर की मांग ज्यादा रहती है। माना यह जाता है कि आम लोग हेलिकॉप्टर से ज्यादा आकर्षित होते हैं। भले ही महंगाई बढ़ रही हो और चुनाव आयोग बेहताशा खर्च पर सख्ती दिखा रहा हो, पार्टियोंं पर इसका कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है।

चुनावी सभाओं को भव्य से भव्य बनाने की होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। एक सभा पर औसतन पांच करोड़ से दस करोड़ रुपए तक खर्च हो जाता है। कोई भी पार्टी इस तरह की सभाओं में खर्च होने वाली रकम का खुलासा नहीं करती। उनकी दलील होती है कि यह काम संगठन अनेक इकाइयों को सौंप दिया जाता है और वही संसाधन जुटाती हैं। जमा जोड़ तो बाद में होता है।

अनुमान यह है कि किसी सभा में एक लाख या ज्यादा लोगों को जुटाने पर कम से कम दस करोड़ रुपए खर्च जो जाते हैं। इसमें पंडाल व हेलिपैड बनाने के अलावा वाहनों, भोजन, लोगों को ठहराने, उनके व कार्यकर्ताओं के लिए चिकित्सा सुविधा, पोस्टर व बैनर लगाने, रोशनी व साउंड का इंतजाम करने, सुरक्षा व्यवस्था व मनोरंजन का इंतजाम करने और मीडिया प्रबंधन करने का खर्च शामिल है। पार्टियां भले ही कहती रहें कि आम लोगों से मिले चंदे को ही वे आम लोगों तक पहुंचने के लिए खर्च करती हैं लेकिन माना यही जाता है कि ऐसे राजनीतिक तमाशे के लिए बड़े व्यापारी व उद्योगपति पैसा देते हैं, इस उम्मीद में कि अगर पार्टी विशेष सत्ता में आ गई तो उनके वारे-न्यारे हो जाएंगे। शायद यही वजह है कि कोई भी पार्टी अपनी आय के स्रोत को सूचना के अधिकार कानून के तहत नहीं लाना चाहती।

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