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बंगाल रायगंज- दिग्गज दंगल: अबकी है चौतरफा मुकाबला

पश्चिम बंगाल की रायगंज संसदीय सीट पर माकपा उम्मीदवार मोहम्मद सलीम इस बार अपने राजनीतिक करिअर की संभवत: सबसे कड़ी चुनौती से जूझ रहे हैं। कांग्रेस का गढ़ कही जाने वाली इस सीट पर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में वे महज 1634 वोटों के अंतर से जीते थे।

माकपा उम्मीदवार मोहम्मद सलीम

पश्चिम बंगाल की रायगंज संसदीय सीट पर माकपा उम्मीदवार मोहम्मद सलीम इस बार अपने राजनीतिक करिअर की संभवत: सबसे कड़ी चुनौती से जूझ रहे हैं। कांग्रेस का गढ़ कही जाने वाली इस सीट पर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में वे महज 1634 वोटों के अंतर से जीते थे। इस बार भी इस सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी की पत्नी दीपा दासमुंशी कांग्रेस उम्मीदवार हैं। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ने भी यहां पूरी ताकत झोंक दी है।
रायगंज की संसदीय सीट लंबे अरसे तक कांग्रेस का गढ़ रही है। पहले यहां वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रियरंजन दासमुंशी जीतते रहे हैं और उसके बाद उनकी पत्नी दीपा दासमुंशी यहां चुनाव जीत चुकी हैं। लेकिन वर्ष 2014 के चुनावों में भाजपा के मजबूती से लड़ने के कारण कांग्रेस के समीकरण गड़बड़ा गए। भाजपा के कांग्रेस वोट बैंक में गहरी सेंध लगाने से माकपा के मोहम्मद सलीम कम वोटों के अंतर से ही सही, यहां जीत गए थे।

वैसे, वर्ष 1991, 1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों में यह सीट माकपा के ही कब्जे में रही थी। लेकिन उसके बाद दासमुंशी ने उस पर अपना कब्जा कर लिया था। अब भाजपा भी धीरे-धीरे मजबूत हो रही है। ऐसे में मामूली अंतर से यह सीट किसी की भी झोली में जा सकती है। कोलकाता को उत्तर बंगाल से जोड़ने वाले हाईवे के किनारे बसा यह इलाका आधारभूत सुविधाओं के लिहाज से काफी पिछड़ा है। इस संसदीय क्षेत्र में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी लगभग बराबर है। ऐसे में भाजपा को अल्पसंख्यक वोटों के वाममोर्चा, कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस में बंटने की उम्मीद है। उसे भरोसा है कि इलाके के हिंदू वोटरों का बड़ा हिस्सा पार्टी को ही समर्थन देगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए 30 फीसद वोट काफी हैं। पिछली बार सलीम को 29 फीसद वोट मिले थे और उनकी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार दीपा दासमुंशी को 28.5 फीसद। तब यहां भाजपा व तृणमूल कांग्रेस को क्रमश: 18.32 और 17.39 फीसद वोट मिले थे। तृणमूल कांग्रेस ने इस बार यहां अपने विधायक और स्थानीय नगरपालिका अध्यक्ष कन्हैया लाल अग्रवाल को मैदान में उतारा है जबकि भाजपा ने प्रदेश महासचिव देवश्री चौधरी को। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि माकपा और कांग्रेस में तालमेल नहीं हो पाने से अबकी यहां अल्पसंख्क वोटों के धुव्रीकरण की संभावना बन रही है।

इलाके में यह चर्चा हो रही है कि अल्पसंख्यक वोटों के बिखराव के कारण भाजपा यहां जीत सकती है। ऐसे में अल्पसंख्यक ऐसे उम्मीदवार का समर्थन कर सकते हैं जो भाजपा के सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरे। मोहम्मद सलीम यहां अकेले अल्पसंख्यक उम्मीदवार हैं।जहां तक चुनावी नतीजे का सवाल है तमाम उम्मीदवार अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। मोहम्मद सलीम कहते हैं कि अबकी लोग उन पर ही भरोसा जताएंगे और जीत का अंतर भी बढ़ेगा। कांग्रेस उम्मीदवार दीपा दासमुंशी का दावा है कि बीते लोकसभा चुनावों में समनीकरणों के गड़बड़ होने के कारण वे मामूली अंतर से हार गई थीं। लेकिन इस बार पिछली गलती सुधारते हुए लोग उनको ही चुनेंगे।

भाजपा भी इस सीट पर जीत के दावे कर रही है। पार्टी का दावा है कि पिछली बार उसके उम्मीदवार का प्रदर्शन बढ़िया रहा था। इस बार उसमें और सुधार की उम्मीद है। पार्टी के एक नेता कहते हैं कि लोग पुराने चेहरों से आजिज आ चुके हैं। लगातार वामपंथी और कांग्रेस नेताओं की जीत के बावजूद रायगंज संसदीय क्षेत्र की हालत में कोई सुधार नहीं आया है। इसलिए लोग अबकी भाजपा पर ही भरोसा जताएंगे।
उत्तर दिनाजपुर जिले की इस सीट पर दूसरे चरण में 18 अप्रैल को मतदान होना है।

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