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लोकसभा चुनाव 2019: 68 फीसद युवाओं की नाराज आवाज है नोटा

Lok Sabha Elections 2019: ताजा सर्वे में युवाओं में इस बात को लेकर नाराजगी दिखी कि अभी भी वोट मांगने वालों में जवान हिंदुस्तान नहीं दिखता है। सर्वे में शामिल 38 फीसद युवाओं का कहना है कि जनप्रतिनिधियों में युवा चेहरों की अनुपस्थिति निराशाजनक है।

भारत के प्रमुख शहरों के इन 68 फीसद युवाओं का मानना है कि नोटा वह हथियार है जिसके जरिए वे अपनी नाराज आवाज सत्ताधारी पार्टी तक पहुंचा सकते हैं।

Lok Sabha Elections 2019: अप्रैल-मई की तपती दुपहरी में जब नेता कहीं फसल काट रहे हैं तो कहीं घर-घर जाकर खाना खा रहे हैं, वहीं एक सर्वे में शुमार 68 फीसद शहरी युवा नोटा की बात करते हैं। भारत के प्रमुख शहरों के इन 68 फीसद युवाओं का मानना है कि नोटा वह हथियार है जिसके जरिए वे अपनी नाराज आवाज सत्ताधारी पार्टी तक पहुंचा सकते हैं। इसी सर्वे में 28 फीसद युवाओं ने नोटा को वोट बर्बाद करने का तरीका बताते हुए इसे बेकार विकल्प बताया। वहीं 62 फीसद छात्र राजनीति को जरूरी मानते हैं। यह सर्वे किया है युवाओं को समर्पित वेबसाइट ‘इन यूथ’ की साझेदारी में ‘युवा’ ने।

25 शहरों के युवा: इस साल जनवरी और मार्च के बीच इस संगठन ने देश के 25 शहरों के उन युवाओं से बात की जो पहली बार मतदान करने जा रहे हैं। इन्होंने युवाओं के राजनीतिक रुझान को वेब सीरिज यूथ अड्डा के जरिए समझने की कोशिश की। युवाओं ने महिला सुरक्षा को सबसे पहले नंबर पर रखा है। दूसरे अहम मुद्दे के रूप में सांप्रदायिक राजनीति को युवा नापसंद कर रहे हैं तो उनके जेहन में भ्रष्टाचार भी मुद्दा है। केंद्रीय चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2019 के आम चुनाव में 8.1 करोड़ नए युवा मतदाता ईवीएम का बटन दबाएंगे। ये युवा हर संसदीय सीट का समीकरण बदलने का माद्दा रखते हैं। युवाओं का यह जोश 2014 के चुनावों में भाजपा की लहर के रूप में आया था।

जवान हिंदुस्तान नदारद: ताजा सर्वे में युवाओं में इस बात को लेकर नाराजगी दिखी कि अभी भी वोट मांगने वालों में जवान हिंदुस्तान नहीं दिखता है। सर्वे में शामिल 38 फीसद युवाओं का कहना है कि जनप्रतिनिधियों में युवा चेहरों की अनुपस्थिति निराशाजनक है। उनका कहना है कि युवा चेहरों की कमी को मुख्य चुनावी मुद्दा होना चाहिए।

पेशेवर युवाओं की राय: सर्वे में हिंदुस्तान की नामचीन शिक्षण संस्थाओं आइआइटी, एनआइटी, एम्स, आइआइएम और निफ्ट के युवा भी शामिल हैं। ज्यादातर छात्रों ने कहा कि वे पार्टी नहीं उम्मीदवार को देखेंगे और उसी आधार पर वोट देंगे। 20 फीसद से अधिक युवाओं ने महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण को सबसे बड़ा मुद्दा माना। लड़कियों ने भ्रष्टाचार और गरीबी को दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा माना। लड़कों ने सांप्रदायिक हिंसा और शिक्षा को दूसरे पायदान पर अहमियत दी। सांप्रदायिक हिंसा पर अलग श्रेणी के युवाओं के अलग विचार हैं। दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, बंगलुरु जैसे शहरों के छात्र भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक हिंसा को दूसरा सबसे अहम मुद्दा मानते हैं लेकिन दूसरी श्रेणी के शहरों के युवाओं का कहना है कि शिक्षा और बुनियादी ढांचा बड़े मुद्दे हैं। सर्वे में मुंबई के 86 फीसद युवाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन किया। इसमें लड़के और लड़कियां दोनों हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी को पसंद करने वाले सभी लोग उनकी पार्टी की कुछ नीतियों से इत्तफाक नहीं रखते हैं। ये युवा पार्टी और उम्मीदवार दोनों को अलग-अलग देखने के हिमायती हैं।

बड़े और छोटे शहरों का फर्क: शहरों की श्रेणी का असर युवाओं के रुझान पर दिखता है। प्रथम श्रेणी के शहरों के युवाओं को भ्रष्टाचार और बेरोजगारी की चिंता ज्यादा है तो द्वितीय श्रेणी के युवा शिक्षा और आधारभूत संरचनाओं को लेकर फिक्रमंद हैं। रोचक तथ्य यह है कि द्वितीय श्रेणी के युवा राजनीतिक होना पसंद करते हैं। वे राजनीतिक मुद्दों पर रुचि लेते हैं। इसके साथ ही इस श्रेणी के युवा जातिवाद, उग्रवाद, स्वच्छता और फेक न्यूज को लेकर भी चिंतित हैं। इनकी तुलना में प्रथम श्रेणी के युवाओं का सियासत को लेकर उदासीन रुख दिखता है। वहीं लड़कों की तुलना में लड़कियां राजनीति को लेकर सजग हैं।

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