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Lok Sabha Election 2019: पश्चिमी यूपी में सपा, बसपा और आरएलडी का गठजोड़ काफी मजबूत, मतदान से पहले 8 सीटों पर बीजेपी काफी नर्वस

Election 2019: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 8 लोकसभा सीटों पर बीजेपी की अग्निपरीक्षा है। पहले चरण के चुनाव में इन सीटों पर उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होने वाला है। लेकिन, जातीय समीकरण का पलड़ा गठबंधन (सपा, बसपा, आरएलडी) की ओर भारी है।

Author April 9, 2019 3:19 PM
पश्चिमी यूपी की 8 सीटों पर विपक्षी गठबंधन का पलड़ा भारी है। जातीय समीकरण के हिसाब से बीजेपी सही स्थिति में नहीं है। (फोटो सोर्स: AP)

Lok Sabha Election: गुरुवार (11 अप्रैल) को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 8 लोकसभा सीटों; सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर में मतदान होने वाला है। मगर, इन सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) साफ तौर पर नर्वस नज़र आ रही है। इन सीटों पर बिजेपी के कई दिग्गजों की साख दांव पर लगी है। केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह, महेश शर्मा, सत्यापाल सिंह और इनके अलावा पूर्व मंत्री संजीव बालियान जैसे दिग्गज अपनी सीट बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं। इन्हीं क्षेत्रों के जाट वोटरों पर अपना दोबारा प्रभाव जमाने के लिए किसान नेता चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह और उनके पोते जयंत चौधरी भी कोशिश कर रहे हैं।

11 अप्रैल को होने वाले वाला चुनाव महागठबंधन के लिए पहला परीक्षण होगा और तय होगा कि मायावती की बीएसपी, अखिलेश यादव की सपा और अजीत सिंह की आरएलडी क्या जमीन पर अपना दबादबा कामय कर पाई हैं। जो भी पहले चरण के चुनाव में अच्छा लीड लेगा, वह मनोवैज्ञानिक रूप से अगले चरण के चुनावों में हावी रहेगा। देश की सत्ता में कौन काबिज होगा, इसमें उत्तर प्रदेश की जीती हुईं सीटों का अहम रोल रहने वाला है।

2014 में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से जीत दर्ज की थी। इस जीत के पीछे 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के चलते हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का बहुत बड़ा हाथ था। गौर करने वाली बात यह है कि पश्चिमी यूपी की 8 लोकसभा सीटों में से 6 पर जाट और मुस्लिम मतदाताओं का कब्जा है। पिछले लोकसभा चुनाव की तरह इस पर कहीं भी मोदी लहर नहीं है। हालांकि, लोगों के बीच प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता बरकरार है। लेकिन, इन सब के बावजूद बीजेपी के लिए जातीय समीकरण सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि, जब 2014 में मोदी लहर थी तब सपा, बसपा और आरएलडी का कुल वोट क्षेत्र की 4 लोकसभा सीटों पर बीजेपी से अधिक था।

वर्तमान में गठबंधन के समर्थक इस समीकरण को ‘कैराना मॉडल’ बता रहे हैं। गौरतलब है कि 2014 में गुर्जर नेता हुकुम सिंह ने 50.5 फीसदी वोट से जीत हासिल की थी। लेकिन, 2018 में हुए उपचुनाव के दौरान विपक्षी दल एक साथ आए और उनकी बेटी मृगांका सिंह को पटखनी दे दी। बीजेपी प्रत्याशी मृगांका को गठबंधन की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने 51.26 फीसदी वोट के साथ हरा दिया। आरएसएस के कार्यकर्ता दिनेश सेठी का मानना है कि पहले चरण के चुनाव में कुछ झटके लग सकते हैं।

दरअसल, कैराना में तबस्सुम हसन तीन बड़े वोट बैंकों को साधने में सफल रहीं। इनमें दलित, मुस्लिम और जाट मतदाता निर्णायक भूमिका में थे। इस दौरान भारतीय जनता पार्टी के वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट देखी गई। लेकिन, विपक्षी दलों ने एक साथ आकर सारा परिदृश्य ही बदलकर रख दिया। इस बार हसन सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। ऐसे में तमाम आंकलन के बाद कहा जा सकता है कि इस दफे बीजेपी किसी भी सूरत में 2014 की तरह 8 की 8 लोकसभा सीटों को नहीं जीत पाएगी। हालांकि, क्षेत्र में एयर-स्ट्राइक के बाद से खासकर जाट समुदाय के अधिकांश नौजवानों में मोदी पहली पसंद के रूप में कायम हैं। इसके अलावा स्थानीय मुद्दे में जिनमें गन्ने का बकाया भुगतान शामिल है, वह भी स्थिति बदलने का माद्दा रखता है। प्रधानमंत्री मोदी ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि अप्रैल के पहले सप्ताह में गन्ने का बकाया भुगतान किसानों को कर दिया जाएगा। यही असर है कि उत्तर प्रदेश की सरकार दिन-रात इस दिशा में काम कर ही है। वहीं, दूसरी ओर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ कानून व्यवस्था के मसले पर एनकाउंटरों का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं।

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