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Lok Sabha Election: रिपोर्ट: वंशवाद के मामले में पीछे नहीं बीजेपी, कम समय में कांग्रेस को भी पीछे छोड़ा!

Lok Sabha Election: भारतीय जनता पार्टी से कांग्रेस काफी पुरानी पार्टी है। मगर, आंकड़े बताते हैं कि 1955 से लगातार चुनाव लड़ रही कांग्रेस के मुकाबले काफी कम वक्त में वंशवाद की जड़ से निकले नेताओं को बीजेपी ने सबसे ज्याद मौका दिया है।

कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी में भी वंशवाद की जड़ें गहरी होती जा रही हैं। (फोटो सोर्स: द इंडियन एक्स्प्रेस)

चुनावों (Indian Electoral System) में ‘वंशवाद’ का मुद्दा काफी हावी रहा है। खासकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस मुद्दे को लेकर काफी आक्रामक रही है। लेकिन, रिपोर्ट्स बताते हैं कि वंशवाद को लेकर बीजेपी का भी ट्रैक रिकॉर्ड कांग्रेस और तमाम क्षेत्रीय दलों से जुदा नहीं है। इंडियास्पेंड के मुताबिक पिछले 20 सालों में बीजेपी के भीतर परिवारवाद या वंशवाद की जड़ें काफी मजबूत हुई हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि बीजेपी में राजनीतिक परिवार से जुड़े प्रतिनिधियों के इजाफे की रफ्तार कांग्रेस से कहीं ज्यादा है। 13वीं लोकसभा (1999) में कांग्रेस के 36 सांसद राजनीतिक परिवार से संबंध रखते थे, इस दौरान बीजेपी भी ज्यादा पीछे नहीं थी। बीजेपी के 31 सांसद राजनीतिक घरानों से संबंध रखने वाले थे।

2009 में तो कांग्रेस और बीजेपी के बीच चुनावी राजनीति में ‘वंशवादी’ व्यवस्था को लेकर कांटे की टक्कर देखने को मिली। आंकड़े बताते हैं कि उस दौरान कांग्रेस के 12 फीसदी तो बीजेपी के 11 फीसदी सांसद राजनीतिक परिवार के सदस्य थे। हालांकि, 2004 में ही कांग्रेस में वंशवाद बीजेपी से करीब दो गुना अधिक पाया जाता है। 14वीं लोकसभा जहां बीजेपी में 7 फीसदी सांसद सियासी घराने से थे, वहीं कांग्रेस में यह आंकड़ा 13 फीसदी था। गौरतलब है कि आजादी के बाद से कांग्रेस सबसे ज्यादा सत्ता में रही है। कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत को देखते हुए इस पर हमेशा भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। लेकिन, इंडियास्पेंड के मुताबिक तमाम रिसर्च बताते हैं कि इस क्रम में सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान के अधिकांश दल काफी आगे हैं।

इंडियास्पेंड ने इस मसले पर अमेरिका स्थित हॉवर्ड और जर्मनी की मैनहायम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का हवाला दिया है। हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के पीएचडी करने वाले सिद्धार्थ जॉर्ज बताते हैं कि यदि आप मीडिया के नजरिए से देखेंगे तो कभी नहीं मानेंगे कि कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी में तेज रफ्तार से वंशवाद बढ़ा है। सिद्धार्थ बताते हैं, “बीजेपी (कांग्रेस से) एक पीढ़ी छोटी पार्टी है। लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि यह तुलनात्मक रूप से कांग्रेस से कम नहीं है।” गौरतलब है कि इंडियास्पेंड ने जो तथ्य पेश किए हैं उसमें ‘वंशवाद’ के तहत सिर्फ नेताओं के माता-पिता, भाई-बहन, बेटे-बेटियां शामिल हैं। इनमें अभी संयुक्त परिवार के बाकी सदस्य जैसे भतीजे-भतीजियां, इसके अलावा सास-ससुर और साला जैसे रिश्ते शामिल नहीं किए गए हैं। अभी सिर्फ भाई-बहन और संतानों के मामले में ही वंशवाद 75 फीसदी है।

दुनिया के अधिकांश विशेज्ञों का मानना है कि कांग्रेस में वंशवाद के घेरे में इसलिए हमेशा रहती है, क्योंकि पार्टी पर प्रभाव हमेशा नेहरू-गांधी परिवार का रहा है। शीर्ष नेतृत्व पर नेहरू-गांधी परिवार का कब्जा होने की वजह से इस पर भाई-भतीजावाद का आरोप सबसे ज्यादा लगते रहे हैं। जबकि, बीजेपी का परिवारवाद छिपा हुआ है। शीर्ष नेतृत्व पर अभी तक पारिवारिक पृष्ठभूमि के लोगों का ज्यादा कब्जा नहीं हो पाया है।

जहां ‘वंशवाद’, वहां गरीबी!

 ट्रेंड बताते हैं कि जिन राज्यों में सबसे ज्यादा ‘वंशवाद है, वहां पर गरीबी भी काफी ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा गरीबी है और यहां पर राजनीतिक घरानों से जुड़े जनप्रतिनिधि देश के बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा हैं। यहां पर 1952 लोकसभा चुनाव से लेकर अभी तक 51 वंशवाद की जड़ से निकले हुए जन-प्रतिनिधि रहे हैं। दूसरे नंबर पर बिहार है। यहां पर राजनीतिक विरासत वाले खानदान से 27 जनप्रतिनिधि रहे हैं।

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