ताज़ा खबर
 

Lok Sabha Election 2019: आखिर क्‍यों गांधीनगर से लालकृष्‍ण आडवाणी की जगह अमित शाह बने बीजेपी उम्‍मीदवार?

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): शाह भाजपा अध्‍यक्ष हैं। आडवाणी पार्टी के पूर्व अध्‍यक्ष हैं और वरिष्‍ठतम नेता रहे हैं। ऐसे में उनकी सीट का सांकेतिक महत्‍व है, जो भाजपा के सबसे बड़े नेता को दी गई है।

Lok Sabha Election 2019: बीजेपी ने होली के दिन 184 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की, जिसमें एलके आडवाणी का नाम नहीं था। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

Lok Sabha Election 2019: लाल कृष्ण आडवाणी जहां से 1998 से लोकसभा पहुंचते रहे हैं, उस सीट पर 2019 में अमित शाह लड़ेंगे। गांधीनगर से नए उम्‍मीदवार का ऐलान बीजेपी ने 21 मार्च को कर दिया। इसे कई लोग मोदी-शाह की जोड़ी द्वारा आडवाणी का सम्‍मान नहीं किए जाने और उनका राजनीतिक कॅरिअर समाप्‍त करने के रूप में देख रहे हैं। लेकिन, यह अप्रत्‍याशित नहीं है। बीजेपी ने आडवाणी की सीट पर अपने अध्‍यक्ष को लड़ाने का फैसला क्‍यों किया, इस सवाल पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। न बीजेपी की ओर से, न आडवाणी की ओर से। लेकिन, इस बात की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि यह फैसला आडवाणी की सहमति से ही लिया गया हो। यह बात अलग है कि उनकी सहमति की परिस्‍थिति क्‍या रही होगी? ऐसी संभावना बताने के पीछे की वजह यह है:

सांसदी की चाह नहीं: आडवाणी जिंंदगी के सफर में शतक पूरा करने के करीब हैं। उनका जन्‍म 1927 में 8 नवंवर को कराची में हुआ था। आरएसएस से उनका जुड़ाव 1942 का रहा है। 1970 में पहली बार सांसद (राज्‍यसभा) और 1977 में मंत्री बने। अटल सरकार में उप प्रधानमंत्री भी रहे। 1986 में बीजेपी के अध्‍यक्ष भी चुने गए। मतलब उनके लिए प्रधानमंत्री, उपराष्‍ट्रपति और राष्‍ट्रपति जैसे पद ही बचे रह गए हैं, जिन पर जाने की उनकी इच्‍छा बची हो सकती है। बाकी किसी पद के लिए अब वह शायद ही ख्‍वाहिशमंद हों।

बड़ा पद पाना संभव नहीं: अतीत में कई बार ऐसी चर्चा आम हुई कि आडवाणी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी ओर से कुछ जुगत भिड़ाई। यह भी चर्चा चली कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तब वह खुद भी बन सकते थे, लेकिन कुछ राजनीतिक मजबूरियों के चलते अपना नाम आगे नहीं कर/करा सके। अतीत में जो भी हो, पर पिछले पांच साल की परिस्‍थितियों के मद्देनजर भविष्‍य में अब यह पद पाना उनके लिए लगभग असंभव है, यह बात वह भली-भांति समझते होंगे। ऐसे में राजनीति से किनारा करने का उनका निर्णय अपना भी हो सकता है।

उम्र की सीमा: जहां तक सांसद बनने की बात है तो शारीरिक रूप से यह जिम्‍मेदारी निभाना भी अब आडवाणी के लिए आसान नहीं होगा। फिर, जिस तरह नरेंद्र मोदी पहले ही ”राजनीतिक संन्‍यास” के लिए उम्र की सीमा घोषित कर चुके थे, उसके मद्देनजर भी आडवाणी अपने लिए टिकट की संभावना पहले ही क्षीण मान चुके होंगे। उनकी राजनीतिक सक्रियता बीते पांच सालों में भी कम ही रही।

कम सक्रियता: आठ नवंबर, 2017 को 90वें जन्मदिन पर जब आडवाणी अपनी बेटी प्रतिभा आडवाणी के साथ अपने घर पर मेहमानों का स्वागत कर रहे थे तो उनसे पूछा गया था कि क्या वो गुजरात (विधानसभा चुनाव) में प्रचार करने जाएंगे? उनकी जगह प्रतिभा ने जवाब दिया था, “नहीं, हम इसी दुनिया में खुश हैं।” उनका ज्‍यादातर वक्‍त किताबों और बेटी के साथ यात्रा में बीतता रहा है।

इन परिस्‍थितियों के मद्देनजर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आडवाणी ने स्‍वेच्‍छा से चुनाव लड़ने से मना कर दिया हो और मोदी-शाह की जोड़ी के लिए फैसला लेना आसान कर दिया हो। जो परिस्‍थितियां हैं, उनमें आडवाणी के लिए सबसे सम्‍मानजनक कदम भी यही कहा जाएगा। जहां तक बात है आडवाणी की जगह शाह को उम्‍मीदवार बनाने की तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।

शाह भाजपा अध्‍यक्ष हैं। आडवाणी पार्टी के पूर्व अध्‍यक्ष हैं और वरिष्‍ठतम नेता रहे हैं। ऐसे में उनकी सीट का सांकेतिक महत्‍व है, जो भाजपा के सबसे बड़े नेता को दी गई है। नरेंद्र मोदी पिछली बार गुजरात की एक सीट से भी चुनाव लड़ेे थे। इस बार वह शायद ही ऐसा करें। ऐसे में अपने सबसे भरोसेमंद और बड़े नेता को गुजरात से लड़ा कर वह गुजरातियों को संदेश देना भी चाह रहे होंगे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X