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Lok Sabha Election 2019: यहां लोगों की जुबां पर तो है बीजेपी, लेकिन दिल में रोजगार और विकास: भाजपा खुलेआम कर रही सेना के नाम पर प्रचार

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): मालदा उत्तर सीट पारंपरिक रूप से कांग्रेस का गढ़ रही है। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एबीए गनी खान चौधरी सांसद रह चुके हैं। भाजपा यहां सेना के नाम पर प्रचार कर रही है।

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Lok Sabha Election 2019: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस अपने चुनावी अभियान में यह दावा कर रही है कि राज्य में हजारों नौकरियां पैदा की जा रही हैं। हालांकि, मालदा जिले के इनायतपुर की रहने वाली मुन्नी खातून इससे सहमत नहीं हैं। दो महीने पहले उनके पति आजाद मोमिन का शव यूपी से ताबूत में रखकर उनके पास पहुंचा था।

आजाद उन 9 लोगों में शामिल थे, जिनकी मौत भदोही की एक कालीन फैक्ट्री में हुए धमाके में हुई थी। इनायतपुर में रोजगार के हालात बेहद खराब हैं। इसकी वजह से युवाओं को यूपी, दिल्ली, मुंबई और यहां तक कि मिडल ईस्ट तक का रुख करना पड़ता है। अधिकतर गांवों में सिर्फ बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे नजर आते हैं। जो युवा यहां रह भी गए, उनके लिए विकल्प बेहद सीमित हैं। इनमें से अधिकतर आइसक्रीम बेचने, छोटे खाने-पीने की दुकान चलाने का काम कर रहे हैं या फिर आम के बागों में 200 से 300 रुपये की दिहाड़ी पर काम कर रहे हैं।

इनायतपुर गांव के रहने वाले समीनुर रहमान 30 साल से ज्यादा उम्र वाले गांव के चुनिंदा लोगों में से एक हैं। उन्होंने बताया, ‘यहां कोई नौकरी नहीं है। यहां तक कि मैं भी हाल फिलहाल तक सऊदी में काम कर रहा था। उन्होंने हमारा वेतन 40 हजार रुपये से घटाकर 15 हजार रुपये कर दिया। मैं वापस चला आया। फिलहाल के लिए मेरे पास कुछ बचत है।

हालांकि, मुझे जल्द ही नौकरी की तलाश में निकलना होगा।’ बता दें कि इन इलाकों में बेहद गरीबी है, लेकिन लोगों ने शिक्षा हासिल करने में कसर नहीं छोड़ी। भदोही धमाके में दो बेटों को गंवाने वाली तैरान बेवा ने बताया कि उनकी बहू 12वीं तक पढ़ी है। हादसे के बाद से वह अपनी बहू की नौकरी के लिए ग्राम प्रधान के चक्कर काट रही है। नौकरी तो नहीं मिली, उधर यह परिवार धमाके में मारे गए लोगों के लिए घोषित 2 लाख रुपये के मुआवजे का इंतजार अब भी कर रहा है।

आर्थिक दुश्वारियों के अलावा ‘बीजेपी का डर’ भी शायद वो कारण है, जिसकी वजह से तैरान और उनके सभी पड़ोसियों ने तृणमूल को वोट देने का फैसला किया है। यह सीट परंपरागत तौर पर कांग्रेस के गढ़ के तौर पर जानी जाती है। इसकी वजह यहां पूर्व केंद्रीय मंत्री एबीए घानी खान चौधरी का प्रभाव है। 2014 में कांग्रेस ने बंगाल में जो 4 सीटें जीती थीं, उनमें से दो मालदा (मालदा नॉर्थ और साउथ) की थीं।

स्कूल, अस्पताल से लेकर सड़कों आदि तक पर चौधरी के कराए काम की झलक नजर आती है। मालदा साउथ के वर्तमान सांसद अबू हसीम खान चौधरी घानी के भाई हैं। दालुदा के नाम से मशहूर हसीम खान चौधरी दोबारा से मैदान में हैं। गृहिणी रेनू भी कांग्रेस समर्थक हैं। वह प्रियंका गांधी से बेहद प्रभावित हैं। उनका कहना है कि प्रियंका वही कर रही हैं, जो एक बहन को करना चाहिए।

हालांकि, मालदा कस्बे में कहानी जरा बदली सी नजर आती है। शहरी वोटर ‘सशक्त और सक्षम’ पीएम नरेंद्र मोदी के पक्ष में झुका नजर आता है। एक स्थानीय अध्यापक ने नाम न प्रकाशित किए जाने की शर्त पर कहा, ‘दालुदा के मुंह से तो आवाज भी नहीं निकलती। उन्होंने कौन सा विकास किया है? बीजेपी के लिए यहां काफी समर्थन है। मेरा एक सहकर्मी, जिसका परिवार सेना में है, वे मोदी के लिए बेहद अच्छा कहते हैं। मेरा आधा स्कूल बीजेपी को समर्थन देता है। हमें तो 2014 में भी लगता था कि बीजेपी जीतेगी। कांग्रेस की जीत ने तो हमें हैरान कर दिया था।’

मालदा साउथ कैंडिडेट श्रीरूपा मित्रा चौधरी के प्रचार के दौरान बालाकोट एयर स्ट्राइक में ‘300 लोगों के मारे जाने’ और विंग कमांडर की बहादुरी की गाथा सुनाई देती है। यहां चुनाव प्रचार में सेना के राजनीतिकरण को लेकर सवाल पूछने वाला कोई नहीं है। राष्ट्रवाद के जरिए भले ही भीड़ जुटाई जा रही हो लेकिन विकास का मुद्दा किसी के दिमाग में नहीं है। एक 52 साल के टीचर ने कहा, ‘यहां इंजीनियरिंग कॉलेज है, लेकिन कोई प्लेसमेंट नहीं है। नारायणपुर में एक आईटी हब बनने वाला है लेकिन इसकी शुरुआत नहीं हुई है।’

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