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पूर्णिया: उम्मीदवार पुराने पर समीकरण नए, राजद के वोट बैंक पर जीत की उम्मीद में कांग्रेस के पप्पू सिंह

Lok Sabha Election 2019: पूर्णिया सीट पर छह बार कांग्रेस और तीन बार भाजपा प्रत्याशी की जीत हो चुकी है। 1957, 1962 और 1967 में कांग्रेस के फनी गोपाल सेन गुप्ता जीते।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ पूर्णिया के उम्मीदवार उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह। बीच में हैं तारिक अनवर। (फोटो-फेसबुक)

Lok Sabha Poll 2019: बिहार की पूर्णिया संसदीय सीट पर समीकरण भले नए हों लेकिन चुनावी जंग पुराने लड़ाकों के ही बीच है। यों तो यहां कुल 16 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं मगर कांटे की टक्कर एनडीए खेमे के जदयू उम्मीदवार संतोष कुशवाहा और महागठबंधन के कांग्रेस प्रत्याशी उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह के बीच है। उदय सिंह 2014 का चुनाव भाजपा टिकट पर लड़े थे मगर मोदी लहर के बावजूद जदयू के संतोष कुशवाहा से एक लाख से ज्यादा मतों से हार गए। इस बार भाजपा ने सीटिंग सीट होने की वजह से ये सीट बंटवारे में जदयू को दे दी तो उदय सिंह ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। इनके लिए राहुल गांधी भी चुनावी सभा करने आ चुके हैं। लिहाजा, बदले समीकरण में संतोष कुशवाहा की जीत भी आसान नहीं लग रही है।

दरअसल, इस संसदीय सीट पर 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम और डेढ़ लाख यादव वोटरों का माई समीकरण कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़ा है। इसके अलावे करीब ढाई लाख सवर्ण मतदाता हैं। इनमें सवा लाख राजपूत और सवा लाख ब्राह्मण हैं। उदय सिंह राजपूत जाति से आते हैं। लिहाजा, महागठबंधन खेमे को लगता है कि यादव और राजपूत वोटरों के साथ मुस्लिम वोट बैंक की वजह से उसकी जीत पक्की है जबकि जिला जदयू के महासचिव प्रवीण कुमार दास मुन्ना दावा करते हैं कि मुस्लिम जदयू के पक्ष में मतदान करेंगे। जदयू को पांच लाख पिछड़ी, अतिपिछड़ी और एससी-एसटी मतदाताओं पर भी भरोसा है, जिन्हें लुभाने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी कई बार आकर सभा कर चुके हैं। उधर, राजद के युवा नेता तेजस्वी यादव ने भी ताबड़तोड़ सभाएं की है।

पूर्णिया सीमांचल की चार सीटों में से एक है। कपास की खेती के लिए यह क्षेत्र विख्यात है मगर सरकारी उपेक्षा की वजह कपास की खेती दम तोड़ रही है। वायसी गांव के किसान राधा मोहन कुशवाहा कहते हैं कि प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि एक करोड़ साठ लाख किसानों के खाते में किसान सम्मान निधि का पैसा गया लेकिन यह किसे मिला, किसी को पता नहीं। इस संसदीय इलाके की ग्रामीण आबादी पीने के पानी, स्वास्थ्य सेवा और बेरोजगारी से बेहाल है, जबकि नेता उनसे जुड़ी समस्याओं पर बात नहीं करके पाकिस्तान, चौकीदार, राफेल और भूलभुलैया वाले मुद्दों में उलझे हैं।

पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र के तहत छह विधान सभा इलाके कस्बा, रुपौली, धमदाहा, पूर्णिया, कोढ़ा और बनमनखी आते हैं। पूर्णिया शहर राष्ट्रीय राजमार्ग 31 पर बसा है। यह सड़क बंगाल होते हुए असम तक चली जाती है। यहां के चूनापुर में वायु सेना की छावनी है। यहां के लोगों की मुख्य आमदनी किसानी है। मक्का और केला की भी खेती खूब होती है मगर सिताबी यादव बताते हैं कि उत्पादन में लागत के हिसाब से दाम नहीं मिलता। डेढ़ गुणा किसानों की फसलों का मूल्य देने की बात और आमदनी दो गुणी करने की बात खोखली है।

पूर्णिया सीट पर छह बार कांग्रेस और तीन बार भाजपा प्रत्याशी की जीत हो चुकी है। 1957, 1962 और 1967 में कांग्रेस के फनी गोपाल सेन गुप्ता जीते। 1971में कांग्रेस के मो. ताहिर ने जीत हासिल की तो 1977 में बीएलडी के लखनलाल कपूर ने जीत दर्ज की। 1980 और 1984 में फिर कांग्रेस की ही माधुरी सिंह को जीत मिली। 1989 में जनता दल के तस्लीमुद्दीन ने जीत दर्ज कराई। 1989 से कांग्रेस के पांव पूर्णिया से उखड़ गए मगर कांग्रेस ने अपना धैर्य नहीं खोया और हर बार उम्मीदवार खड़े किए। 1996 में समाजवादी पार्टी से राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जीते। 1999 में भी निर्दलीय की हैसियत से इन्हें ही सफलता मिली। 1998 में भाजपा के जयकृष्ण मंडल जीते। 2004 और 2009 में भाजपा से उदय सिंह को विजयश्री मिली मगर 2014 में जदयू के संतोष कुशवाहा से हार गए। इस बार कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे हैं। कांग्रेस भी 1989 से अपनी खोई जमीन पर फिर से पंजा लहराने की कोशिश में है।

यहां कुल 17,53,701 मतदाता 18 अप्रैल यानी दूसरे चरण के मतदान में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इसके लिए 1758 बूथ बनाए गए हैं। 2014 के चुनाव में 64.31 फीसदी वोट पड़े थे। अबकी सीधी लड़ाई पूर्व और वर्तमान सांसद के बीच है लेकिन जीत के लिए दोनों ही उम्मीदवारों को लोहे के चने चबाने पड़ रहे हैं।

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