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वोटिंग से तीन दिन पहले सीमांचल पहुंचे पीएम मोदी, मुस्लिम-यादव बहुल इलाके में ध्रुवीकरण कर कमल खिलाने की कोशिश

Lok Sabha Election 2019: अररिया संसदीय क्षेत्र में पौने आठ लाख मुस्लिम और पौने तीन लाख यादव मतदाता हैं जिनका राजद के माई (MY) समीकरण की ओर झुकाव है। मगर सवा दो लाख सवर्ण, सवा पांच लाख पिछड़ा, अतिपिछड़ा, महादलित और संथाल मतों के ध्रुवीकरण की उम्मीद पर भाजपा टिकी है।

बिहार के अररिया में बोलते हुए पीएम नरेंद्र मोदी फोटो सोर्स- बीजेपी/ट्विटर

Lok Sabha Election 2019: बिहार के पूर्वी इलाके के मुस्लिम बहुल अररिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (20 अप्रैल) को चुनावी रैली कर हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की और पुलवामा हमले और एयर स्ट्राइक को भी वोट लेने का जरिया बनाने से कोई परहेज नहीं किया। उन्होंने अपने भाषण में इन बातों के साथ आरक्षण का भी जिक्र किया और कहा कि हमारी सरकार ने आरक्षण को मजबूती प्रदान की है। पीएम ने कहा कि विपक्षी दल भ्रम फैला रहे हैं। उन्होंने लोगों से कमल निशान पर बटन दबाने की अपील की। अररिया में तीसरे चरण में 23 अप्रैल को चुनाव है।

सीमांचल की चार, कोशी की दो और भागलपुर डिवीजन की दो सीट यानी कुल आठ सीटों में से केवल अररिया संसदीय सीट पर ही भाजपा का उम्मीदवार मैदान में है। बाकी पर एनडीए की साझेदार जदयू के प्रत्याशी हैं। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यहां आना लाजमी माना जा रहा है। 2014 के चुनाव प्रचार में भी यहां आए थे। यह अलग बात है कि भाजपा के प्रदीप सिंह उस वक्त राजद के तस्लीमुद्दीन से एक लाख 46 हजार मतों से हार गए थे। तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद 2018 में हुए उप चुनाव में राजद ने इनके बेटे सरफराज आलम को चुनाव मैदान में उतारा था। भाजपा ने फिर से प्रदीप सिंह को टिकट दिया। तब तक जदयू भी साथ आ चुकी थी। बावजूद इसके अररिया में कमल नहीं खिल सका। प्रदीप सिंह करीब 62 हजार वोटों से हार गए थे।

भारत-नेपाल सीमा पर बसे इस इलाके की आमदनी का मुख्य जरिया खेती के साथ-साथ तस्करी है। तस्करी चाहे विदेशी सामानों की हो, शराब की या नशीली दवाओं की। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सब मिले हुए हैं, इसलिए धड़ल्ले से तस्करी हो रही है। बिहार में शराबबंदी है मगर यहां थोड़ी ज्यादा कीमत पर उपलब्ध है। यहां से अबतक हुए चुनाव में चार बार कांग्रेस, चार बार राजद और तीन बार भाजपा जीती है। दिलचस्प बात यह है कि यदि उपचुनाव को छोड़ दें तो 1967 से लेकर 2014 तक बारह बार हुए संसदीय चुनाव में केवल दो बार ही मुस्लिम उम्मीदवार की जीत हुई है।

अररिया संसदीय क्षेत्र में पौने आठ लाख मुस्लिम और पौने तीन लाख यादव मतदाता हैं जिनका राजद के माई (MY) समीकरण की ओर झुकाव है। मगर सवा दो लाख सवर्ण, सवा पांच लाख पिछड़ा, अतिपिछड़ा, महादलित और संथाल मतों के ध्रुवीकरण की उम्मीद पर भाजपा टिकी है। चूंकि, चुनाव में तीन दिन बाकी है, इसलिए ध्रुवीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता है। बता दें कि यह इलाका अमरकथा शिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु का है। ये हमेशा अपनी माटी से ही जुड़े रहे। इस संसदीय क्षेत्र में छह विधान सभा इलाके हैं। नरपतगंज, रानीगंज, फारबिसगंज, अररिया, जोकीहाट और सिकटी।

अररिया सीट से 1971 में कांग्रेस से और 2014 में राजद के टिकट पर तस्लीमुद्दीन जीते। 1967 में कांग्रेस के टीएम राम, 1977 में भारतीय लोकदल से महेंद्र नारायण सरदार, 1980 और 1984 में कांग्रेस के दामोदर लाल बैठा, जबकि 1991 और 1996 में जनता दल के टिकट पर, 1999 में राजद और 2004 में भाजपा के टिकट पर सुखदेव पासवान जीते। 1998 में रामजी दास ऋषिदेव भाजपा से और 2009 में भाजपा के प्रदीप सिंह ने भी कमल खिलाया था। इस बार फिर से प्रदीप सिंह का मुकाबला महागठबंधन के राजद उम्मीदवार सरफराज आलम से है। वैसे कुल बारह उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं।

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