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Lok Sabha Election 2019: ‘दीदी ने नहीं रोके दंगे फिर भी TMC को ही देंगे वोट’, BJP को रोकने पर बोले अल्पसंख्यक नेता

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): अखिल बंगाल अल्पसंख्यक युवा फेडरेशन के महासचिव मोहम्मद कमरुज्जमान ने कहा, 'जब भाजपा से मुकाबले की बात आती है तो बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को ज्यादा विश्वसनीय ताकत माना जाता है क्योंकि वह सत्ता में है।'

Author Updated: March 18, 2019 7:27 AM
तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के झंडे फोटो सोर्सः इंडियन एक्सप्रेस

Lok Sabha Election 2019 से पहले पश्चिम बंगाल की सियासत में जबर्दस्त उठापटक देखने को मिल रही है। अखिल बंगाल अल्पसंख्यक युवा फेडरेशन के महासचिव मोहम्मद कमरुज्जमान ने भाषा से बातचीत में कहा, ‘राज्य में कई दंगों समेत विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ गुस्सा होने के बावजूद अल्पसंख्यक अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य में तृणमूल कांग्रेस को वोट देंगे।’ उन्होंने कहा, ‘जब भाजपा से मुकाबले की बात आती है तो बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को ज्यादा विश्वसनीय ताकत माना जाता है क्योंकि वह सत्ता में है।’
उन्होंने कहा, ‘सांप्रदायिक दंगे रोकने में कथित नाकामी को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ नाराजगी के बावजूद राज्य के अल्पसंख्यक भाजपा को रोकने के लिए तृणमूल कांग्रेस को वोट दे सकते हैं। राज्य में कई लोकसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाले अल्पसंख्यक खासतौर से मुस्लिम राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को वोट दे सकते हैं जिसे वे कांग्रेस-माकपा गठबंधन से ज्यादा विश्वसनीय मानते हैं।’

कोलकाता की बड़ी मुस्लिम आबादी पर प्रभाव रखने वाले इमामों का मानना है कि अल्पसंख्यकों को सबसे मजबूत धर्मनिरपेक्ष उम्मीदवार के लिए वोट करना चाहिए। हर साल ईद पर रेड रोड में नमाज अता कराने वाले इमाम काजी फजलुर रहमान ने कहा, ‘हम अल्पसंख्यकों से अपने-अपने इलाकों में सबसे मजबूत धर्मनिरपेक्ष ताकतों के पक्ष में वोट देने की अपील करेंगे। यह सुनिश्चित करने के प्रयास होने चाहिए कि केवल धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक उम्मीदवार जीते।’

 

उत्तर बंगाल में रायगंज, कूचबिहार, बालुरघाट, मालदा उत्तर, मालदा दक्षिण, मुर्शिदाबाद और दक्षिण बंगाल में डायमंड हार्बर, उलुबेरिया, हावड़ा, बीरभूम, कांथी, तमलुक, जॉयनगर जैसी संसदीय सीटें मुस्लिम बाहुल्य मानी जाती हैं। तृणमूल का राज्य में अल्पसंख्यक वोटों पर काफी प्रभाव है लेकिन पिछले चार सालों में कई दंगे हुए जिससे अल्पसंख्यकों का एक वर्ग काफी नाराज है। गृह मंत्रालय द्वारा 2018 में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में साल 2015 से ही सांप्रदायिक हिंसा तेजी से बढ़ी है।

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