ताज़ा खबर
 

Lok Sabha Election 2019: कैसे होता है ओपिनियन पोल, कितना आता है खर्च, जानें एग्जिट पोल से जुड़ी हर अहम जानकारी

Lok Sabha Election 2019: ओपिनियन पोल्स एक बेहद लंबी और उलझाऊ प्रक्रिया से गुजरकर हम तक पहुंचते हैं। ऐसे में इनकी जटिलताओं और सीमितता को समझना बेहद अहम है।

सर्वे एजेंसी सीएनएक्स के को-फाउंडर भावेश झा ने बताए कई दिलचस्प तथ्य।

Lok Sabha Election 2019: 17वीं लोकसभा के चुनावी नतीजे जल्द ही आने वाले हैं और मतदान के बाद टीवी चैनल्स पर विभिन्न ओपिनियन पोल्स की बहार आ जाती है। डेटा और ढेर सारे आंकड़े आम तौर पर भले ही बेहद नीरस लगते हों, लेकिन चुनावी आंकड़ों में आम जनता को बेहद दिलचस्पी होती है। शायद तभी, दर्शक इन ओपिनियन पोल्स को बेहद चाव से देखते और समझताे हैं। राजनीतिक दलों की भी इन पोल्स को काफी दिलचस्पी होती हैं। हालांकि सर्वे यदि राजनैतिक पार्टियों के पक्ष में ना आए तो वे इन पोल्स को सिरे से खारिज करते हुए मतगणना का इंतजार करने के लिए कहते हैं। इसकी वजह भी है।

दरअसल, ये चुनावी पोल्स हमेशा सही साबित नहीं होते, शायद तभी राजनीतिक दलों को भी इनके आंकड़ों-नतीजों को अपनी तरह से इस्तेमाल करने की सहूलियत मिल जाती है। यहां यह समझना भी बेहद जरूरी है कि इन ओपिनियन पोल्स के नतीजे एक बेहद लंबी और उलझाऊ प्रक्रिया से गुजरकर हम तक पहुंचते हैं। ऐसे में इनकी जटिलताओं और सीमितता को समझना बेहद अहम है। इन चुनावी ओपिनियन और एग्जिट पोल्स की बारीकियों और विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए हमने सीएनएक्स के सह संस्थापक भावेश झा से बातचीत की।

सवाल: चुनावी सर्वे की प्रक्रिया कितनी जटिल है? कितने चरणों से गुजरकर चुनावी डेटा ओपिनियन पोल के नतीजों में कन्वर्ट होता है? इसमें किन बातों का ध्यान रखते हैं?

ओपिनियन पोल तैयार करने में पहला बड़ा काम फील्ड वर्क होता है। इसमें चुनावी सर्वे करने वाली एजेंसी के कर्मचारी आम लोगों से निजी तौर पर मिलते हैं और कई सवाल पूछते हैं। सर्वे में जिन लोगों को शामिल किया जाता है, उनसे एक फॉर्म भी भरवाया जाता है। इस फॉर्म को भरवाने की भी एक लंबी प्रक्रिया होती है। बहुत सारे लोग यह शेयर नहीं करना चाहते कि वह किसे वोट देंगे। ऐसे में उन्हें चुनावी मतदान की तरह ही बैलेट बॉक्स की सुविधा दी जाती है ताकि वे अपने पसंद के उम्मीदवार के बारे में पर्ची में लिखकर उसमें डाल दें। इसके अलावा, ओपिनियन पोल्स में सबसे अहम चीज होती है सैंपलिंग। आसान भाषा में कहें तो सर्वे में किन लोगों को शामिल किया जाए।

हम किसी एक तरीके से कुछ लोगों से सवाल पूछकर सही नतीजे पर नहीं पहुंच सकते। मसलन दिल्ली में किए सर्वे और बिहार में किए सर्वे में सैंपलिंग का आधार अलग-अलग होगा। दिल्ली के मुकाबले यूपी-बिहार में सैंपलिंग के लिए इस्तेमाल मेथडोलॉजी अलग-अलग होगी। अगर हम यूपी-बिहार में सर्वे करते हैं तो सर्वे में शामिल शख्स की सामाजिक पृष्ठभूमि, जाति या धर्म आदि का भी ध्यान रखना पड़ता है। सैंपल साइज (सर्वे में कितने लोगों को शामिल किया गया) भी मायने रखता है, लेकिन ज्यादा बड़ा सैंपल साइज बेहतर निष्कर्ष की गारंटी नहीं। यूपी-बिहार जैसी जगहों पर जरूरी नहीं कि 50 हजार लोगों का सैंपल साइज लिया जाए। अगर सोशल बैकग्राउंड, कास्ट और रिलिजन से संबंधित इक्वेशन को ध्यान में रखा गया है तो 5000 के सैंपल साइज से भी बेहद सटीक निष्कर्ष निकाला जा सकता है। मसलन- अगर हमने फिरोजाबाद में सर्वे किया तो हमें यह ध्यान में रखना होगा कि यहां मुस्लिमों और दलितों की आबादी करीब 60 फीसदी है। ऐसे में हम यहां जो भी सैंपल लेंगे, उसमें ध्यान रखेंगे कि उसमें भी 60 फीसदी हिस्सेदारी मुस्लिमों और दलितों की हो।

ग्राउंड पर जाकर लोगों की प्रतिक्रियाएं लेने के अलावा कई सारी सर्वे एजेंसियां फोन कॉल्स का भी इस्तेमाल करती हैं। रैंडम डायलिंग करके लोगों से कई तरह के सवाल पूछे जाते हैं। हालांकि, भारत में फोन से सैंपलिंग बेहद कारगर नहीं क्योंकि इसके जरिए बहुत सारगर्भित जानकारी नहीं मिल पाती। इसके अलावा, एमएनपी के कारण आप सिर्फ फोन नंबर्स के जरिए किसी क्षेत्र विशेष की राय नहीं तय कर सकते। लोगों के इंटरव्यू के बाद उनके फीडबैक को डेटा के तौर पर जुटाया जाता है, फिर इनकी कम्प्यूटर में एंट्री की जाती है। इस डेटा को एनलाइज करने के लिए कई अलग-अलग तरह के सॉफ्टवेअर का इस्तेमाल किया जाता है। डेटा को पूरी तरह एनलाइज करने के बाद ही हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं।

सवाल: चुनावी सर्वे कराने में कितना खर्च आता है? कोई भी एजेंसी इसका खर्च कैसे उठाती हैं?

दिखने में भले ही आसान लगे लेकिन भारत में चुनावी सर्वे करना एक लंबी और बेहद खर्चीली प्रक्रिया है। इन सर्वे को कराने के लिए एजेंसियों के लिए मुमकिन नहीं कि वे मासिक सैलरी पर कर्मचारी हायर करे। उदाहरण के तौर पर सीएनएक्स के लिए पूरे भारत में अभी 1300 लोग काम कर रहे हैं, लेकिन ये सभी सीएनएक्स के कर्मचारी नहीं हैं। ऐसे में सीएनएक्स जैसी एजेंसियां लोगों को प्रोजेक्ट बेसिस पर हायर करती हैं। उन्हें बताया जाता है कि कितने इंटरव्यू करने हैं और उसी आधार पर भुगतान किया जाता है। सर्वे का खर्च इस आधार पर भी तय होता है कि इसे कहां करवाया गया है? मसलन- अगर दिल्ली या किसी अन्य राज्य जहां कनेक्टिविटी की बेहतर सुविधा है, तो वहां खर्च बेहद कम आता है। वहीं, सुदूर नॉर्थ ईस्ट या नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कहीं ज्यादा खर्च आता है। इस बड़े खर्च को वहन करना अकेले सर्वे एजेंसी के बस की बात नहीं होती। इसकी वजह से एजेंसी के साथ तीन या चार न्यूज चैनल या न्यूजपेपर काम करते हैं। जो खर्च आता है, वो इनमें बंट जाता है। इस प्रक्रिया में नैशनल से लेकर रीजनल चैनल तक शामिल होते हैं। इनकी माली क्षमता के आधार पर खर्च आपस में बांट लिया जाता है।

चैनलों की भूमिका मूल रूप से सर्वे को कंडक्ट करवाने के लिए फाइनैंशल सपोर्ट देना होता है। अगर खर्च के आंकड़ों की बात करें तो सीधे कोई रकम बताना सही नहीं होगा। आम तौर पर प्रति सैंपल चार्ज से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सर्वे में शामिल एक सैंपल के लिए खर्च 400 से 500 रुपये आता है। यानी सैंपल साइज जितना बड़ा होगा, खर्च उतना ही ज्यादा होगा। आम तौर पर एक न्यूज चैनल इस खर्च को वहन नहीं कर सकता। इसलिए तीन या चार मीडिया हाउस मिलकर इस खर्च को उठाते हैं। अब खर्च का अंदाजा लगाना हो तो इसी बात से समझिए कि लोकसभा चुनाव के लिए कराए गए हमारे सबसे हालिया ओपिनियन पोल का सैंपल साइज 54000 था। एक चैनल इतना खर्च (54000×500=2.7 करोड़ रुपये) नहीं उठा सकता। इसे नैशनल और रीजनल चैनल मिलकर बांट लेते हैं। हालांकि, हर तरह के सर्वे में जरूरी नहीं कि खर्च ज्यादा ही आए। मसलन- अगर हमें देश के मूड का पता करना हो तो इसके लिए सैंपल साइज का 50 हजार का होना जरूरी नहीं है। इसके लिए 3 हजार का सैंपल साइज पर्याप्त है। अगर आपने 3000 लोगों का इंटरव्यू साइंटिफिक तरीके से कर लिया तो इससे भी चुनावी निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

सवाल: चुनावी सर्वे कराने वाली कितनी एजेंसियां फिलहाल काम कर रही हैं? एजेंसियों के पास क्या हमेशा काम रहता है? इसके जरिए कितने लोगों को रोजगार मिलता है?

सर्वे करने वाली एजेंसियां सिर्फ चुनावी सर्वे करने तक सीमित नहीं रहतीं। ये एजेंसियां मार्केट रिसर्च का काम भी करती हैं। मसलन कोई कंपनी किसी प्रोडक्ट विशेष के बारे में लोगों के फीडबैक लेने के लिए भी इन एजेंसियों को हायर करती है। जब चुनावी सीजन नहीं होता तो एजेंसियां इस तरह के प्रोजेक्ट से खर्च निकालती हैं। सीएसडीएस और सी वोटर जैसी एजेंसियां सिर्फ चुनावी सर्वे करने तक सीमित नहीं, वे कई तरह के रिसर्च के काम भी करती हैं। कुल मिलाकर ये एजेंसियां खाली नहीं रहतीं, कुछ न कुछ काम चलता रहता है। वहीं, भारत में चुनावी कैलेंडर भी कुछ ऐसा है कि इलेक्शन होते ही रहते हैं। मसलन-आम चुनाव के कुछ महीने बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव होंगे। ऐसे में एजेंसियों की व्यस्तता बनी रहती है। जहां तक इन एजेंसियों से कितने लोगों को रोजगार मिलने का सवाल है, यह सही सही बता पाना बेहद मुश्किल है। दरअसल, चुनावी सर्वे करने वाली ये एजेंसियां गैर संगठित सेक्टर की तरह ही काम कर रही हैं। ज्यादातर एजेंसियों का फील्ड वर्क अपना नहीं है। कोई भी एजेंसी यह दावा नहीं कर सकती है कि उसके सारे फील्ड वर्कर अपने हैं। भारत की तीन चार बड़ी एजेंसियों की बात करें तो उनमें सीएसडीएस, सी वोटर, एक्सिस और सीएनएक्स शामिल हैं। सीएनएक्स के साथ कुल 1300 लोग काम कर रहे हैं। भारत में इस वक्त मोटा-मोटी 35 एजेंसियां काम कर रही हैं। ये सभी 35 हमेशा सक्रिय तौर पर काम करते हों, यह भी जरूरी नहीं। अगर रेगुलर काम करने वाली एजेंसियों की संख्या 10 मानें तो इस आधार पर कहा जाता है कि इन सर्वे एजेंसियों के जरिए करीब 15 हजार लोगों को रोजगार मिल रहा है, जो अभी फील्ड में काम कर रहे हैं। हालांकि, यह एक अंदाजा भर है, इसे साबित करने के लिए डेटा नहीं है।

सवाल: मतदान के बाद चुनाव अयोग की डेडलाइन खत्म होते ही समाचार चैनल तुरंत ही एग्जिट पोल्स के नतीजे दिखाने लगते हैं। सर्वे एजेंसियां मतदाताओं के जवाब से इतनी जल्दी निष्कर्ष कैसे निकाल लेती हैं?

एग्जिट पोल्स उन मतदाताओं की प्रतिक्रियाओं पर आधारित होता है, जो वोट करके निकलते वक्त यह बताते हैं कि उन्होंने किसे वोट दिया है। इस प्रक्रिया को वर्तमान लोकसभा चुनाव से समझा जाता है। यह चुनाव 7 चरणों में होगा। पहला चरण 11 अप्रैल को है। उससे जुड़ा डेटा एजेंसियों के पास 2-3 दिन में आ जाएगा। हालांकि, एजेंसियां इसे सार्वजनिक नहीं कर सकतीं। इसी तरह 6 चरणों का डेटा आखिरी एग्जिट पोल्स के पहले एजेंसियों के पास तैयार होता है। जिस दिन सातवां चरण होगा, उस दिन के दोपहर के 3-4 बजे तक के डेटा के आधार पर एक शुरुआती रिपोर्ट तैयार की जाती है। यही रिपोर्ट न्यूज चैनल को सब्मिट कर दिया जाता है। हालांकि, चैनलों को यह बता दिया जाता है कि शाम 6 बजे तक के डेटा को एनलाइज करने के बाद रिवाइज रिपोर्ट उन्हें भेज दी जाएगी। यानी चैनल पर तुरंत जो एग्जिट पोल्स के नतीजे आते हैं, वो दोपहर 3-4 बजे तक के डेटा पर आधारित होते हैं। पूरे डेटा आने के बाद अगर कोई बाद में बदलाव आता है तो चैनल भी अपने आंकड़ों में फेरबदल करके दिखाते हैं। इसके बाद, फाइनल आंकड़ों में थोड़ा बहुत बदलाव आता ही है। वैसे भी एग्जिट पोल्स के आंकड़ों की प्रोसेसिंग ऐप के जरिए होती है। इसमें फॉर्म नहीं भरवाना होता। इसलिए डेटा जल्दी प्रोसेस होता है और मतदान खत्म होते होते एग्जिट पोल्स के नतीजे सामने आने लगते हैं।

सवाल: क्या इन सर्वे के नतीजों को भरोसेमंद माना जा सकता है? क्या इसमें वोटिंग प्राथमिकता को प्रभावित करने की क्षमता होती है?

इसके लिए एजेंसियों को खुद को भरोसेमंद बनाना पड़ता है। कोई एजेंसी कितनी प्रामाणिक है, इसके लिए उसका ट्रैक रिकॉर्ड देखा जाता है। उदाहरण के तौर पर बीते 10 सालों में हमारा आकलन हालिया छत्तीसगढ़ चुनाव में गलत साबित हुआ। बाकी सारे आकलन सही साबित हुए। आप पीछे जाएंगे तो पाएंगे कि हमने कई बार नतीजों का सटीक अंदाजा लगाया। हमें यह भी समझना होगा कि सारी एजेंसियों का सर्वे करने का तरीका एक नहीं होता। उदाहरण के तौर पर एजेंसियों को अगर सर्वे से पता चलता है कि बीजेपी को चुनाव में 40 पर्सेंट वोट मिलेंगे तो इसे सीट में कन्वर्ट करने का तरीका सबका अलग अलग होता है। आपको एक ही वोट शेयर से सीटों के नंबर के अलग अलग आंकड़े मिलेंगे। यहां आप ध्यान दें कि सैफोलॉजी में सीट का अंदाजा नहीं लगाया जाता। इस विज्ञान में सिर्फ वोट शेयर का पता लगाते हैं। हमारी मजबूरी है कि अगर हम सिर्फ वोट शेयर दे दें तो किसी को ये आंकड़े दिलचस्प नहीं लगेंगे। ऐसे में जनता की दिलचस्पी का ध्यान रखते हुए न्यूज चैनल वोट शेयर से सीट कन्वर्जन के आंकड़े मांगते हैं। यह अंदाजा अलग-अलग एक्सपर्ट्स का अलग-अलग हो सकता है। कोई सीटों के नंबर का बिलकुल सही अंदाजा लगाता है, कोई ज्यादा तो कोई कम। इसका यह मतलब बिलकुल नहीं कि फलां सर्वे प्रामाणिक है और फलां नहीं। जहां तक वोटरों के इससे प्रभावित होने का सवाल है, निजी तौर पर मुझे ऐसा नहीं लगता। लोगों को इसे बस सूचना की तरह ही लेना चाहिए। लोगों को बस यह मानना चाहिए कि यह पब्लिक का मूड है।

Read here the latest Lok Sabha Election 2019 News, Live coverage and full election schedule for India General Election 2019

Next Stories
1 National Hindi News, 11 April 2019 Updates: दो दिन पहले नक्सली हमले में मारे गए बीजेपी MLA के परिजनों ने डाला वोट
2 Lok Sabha Election 2019 Voting: हिंसा-तोड़फोड़ व तकनीकी खामी संग पहले चरण का मतदान पूरा, जानें कहां कितने फीसदी हुई वोटिंग
3 सुबह सात बजे से शुरू होगा मतदान, शहर में मतदान फीसद बढ़ाने की चुनौती
ये पढ़ा क्या?
X