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गोड्डा: 2014 जैसा रहा वोटिंग पैटर्न तो भाजपा की हैट्रिक मुश्किल, JVM के पक्ष में लामबंद यादव-मुस्लिम-आदिवासी 

Lok Sabha Election 2019: 2014 के जैसा अगर वोटिंग पैटर्न रहा तो बीजेपी उम्मीदवार के लिए हैट्रिक लगा पाना मुश्किल हो सकता है क्योंकि कांग्रेस, झामुमो और जेवीएम के एक होने से उनका वोट प्रतिशत और वोट दोनों बढ़ रहा है।

गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकंत दुबे (बाएं) इस बार हैट्रिक लगाने को बेकरार हैं। उनका मुख्य मुकाबला पूर्व सांसद और झारखंड विकास मोर्चा के उम्मीदवार प्रदीप यादव (दाएं) से है।

Lok Sabha Election 2019: झारखंड के गोड्डा, दुमका और राजमहल संसदीय सीट पर आखिरी चरण में 19 मई को वोट डाले जाने हैं। उससे पहले आज (बुधवार, 15 मई को) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देवघर में चुनावी सभा की और राष्ट्रीयता और देश की सुरक्षा का मुद्दा उठा समां बांधा। उन्होंने भाजपा के लिए वोट भी मांगे। गोड्डा संसदीय सीट पर पिछले दस सालों से भाजपा का कब्जा है। भाजपा सांसद निशिकंत दुबे इस बार हैट्रिक लगाने को बेकरार हैं। उनका मुख्य मुकाबला पूर्व सांसद और झारखंड विकास मोर्चा के उम्मीदवार प्रदीप यादव से है। यादव गठबंधन के उम्मीदवार हैं। उन्हें कांग्रेस, राजद और झामुमो का समर्थन हासिल है।

गोड्डा सीट संथाल परगना की तीन सीटों (गोड्डा, दुमका और राजमहल) में से एक है। साथ ही भाजपा के लिए इसे बचाना अब बड़ी चुनौती है। दुमका और राजमहल सीट झारखंड मुक्ति मोर्चा के कब्जे में है। गोड्डा इकलौती सीट है जो भाजपा के पास है। निशिकांत दुबे यहां से लगातार दो बार साल 2009 और साल 2014 में जीते हैं। हालांकि, 1962 से अबतक कांग्रेस ने इस सीट से छह बार जीत दर्ज की है। 1962 और 1967 में कांग्रेस के प्रभुदयाल हिम्मतसिंहका जीते। 1971 में कांग्रेस के जगदीश मंडल, 1980 और 1984 में मौलाना समीउद्दीन और 2004 में कांग्रेस के फुरकान अंसारी जीते। भाजपा की पकड़ भी यहां कमजोर नहीं रही। सात बार गोड्डा के पथरीले इलाके में भाजपा का कमल खिल चुका है। 1977, 1996 और 1998 में जगदम्बी यादव, 1989 में जनार्दन यादव, 2000 में प्रदीप यादव, 2009 और 2014 में भाजपा के निशिकांत दुबे ने विजय पताका फहराया है। केवल 1991 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के सूरज मंडल ने जीत दर्ज की थी।

साल 2009 और 2014 में इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला था। 2009 में झामुमो और कांग्रेस दोनों आमने-सामने थी तो भाजपा के निशिकांत दुबे केवल छह हजार मतों से जीत गए। 2014 के चुनाव में कांग्रेस और झाविमो इनके मुकाबले में लड़े तो भी जीत भाजपा की ही हुई। निशिकांत दुबे को 3 लाख 80 हजार तो कांग्रेस के फुरकान अंसारी को 3 लाख 19 हजार और प्रदीप यादव (झाविमो) को 1 लाख 93 हजार वोट मिले थे। इस बार मुकाबला सीधा है। हालांकि, निशिकांत दुबे ने तमाम कोशिश की कि इसे लड़ाई त्रिकोणात्मक बन जाय पर वो नाकाम रहे। न फुरकान अंसारी और न ही इनकी बेटी चुनाव लड़ने या बागी बनने को तैयार हुई। नतीजतन लड़ाई दिलचस्प बनी हुई है।

गोड्डा संसदीय सीट पर विकास के कामों पर जातीय समीकरण भारी है। यही वजह है कि भाजपा के मुकाबले महागठबंधन मजबूती से लड़ रहा है। महागठबंधन के मुख्य सहयोगी दल कांग्रेस, राजद, झामुमो और झाविमो एक साथ अपने उम्मीदवार प्रदीप यादव के लिए लगे हुए हैं। मधुपुर के राजद नेता अरविंद यादव जातीय आधारित आंकड़े पेश करते हुए बताते हैं कि गोड्डा संसदीय सीट पर तीन लाख यादव, चार लाख मुसलमान, दो लाख आदिवासी और ढाई लाख दलित-महादलित, तीन लाख वैश्य और एक लाख अगड़ी जाति के मतदाता हैं। इस हिसाब से झाविमो प्रत्याशी प्रदीप यादव का पलड़ा भारी नजर आता है।

मगर, विकास की बात करें तो भाजपा के निशिकांत दुबे भारी पड़ते हैं। भाजपा का कहना है कि दस साल के कार्यकाल में निशिकांत दुबे ने काफी बड़े-बड़े काम किए हैं। देवघर में एयरपोर्ट, तमाम खेलों के लिए स्टेडियम, एम्स, इंजीनियरिंग कॉलेज, कृषि कॉलेज, सड़कें, गोड्डा को रेल लाइन से जोड़ने बगैरह का काम गिनाया जा रहा है। भाजपा के सुनील मिश्रा काम गिनाते नहीं थकते। मगर अडानी के पावर प्रोजेक्ट के लिए गोड्डा में जमीन अधिग्रहण को लेकर भारी विरोध भी इन्हें झेलना पड़ रहा है। यहां के लोग कहते हैं जान दे देंगे मगर जमीन नहीं देंगे। आदिवासियों के बीच छोटानागपुर-संथाल परगना टेनेंसी एक्ट राज्य की भाजपा सरकार द्वारा किया संशोधन भी गुस्से की बड़ी वजह है।

जानकार बताते हैं कि दूसरी तरफ भाजपा को भितरघात का भी खतरा सता रहा है। महगामा के विधायक अशोक भगत, गोड्डा के विधायक अमित मंडल और मधुपुर के विधायक राज पालिवार दिखावटी तौर पर इनके साथ हैं। ये सभी भाजपा के विधायक हैं। इसके अलावा तीन और विधानसभा क्षेत्र इस संसदीय क्षेत्र के तहत आता है। देवघर (सुरक्षित), जरमुंडी और पोड़ैयाहाट। धनबाद से कांग्रेस के टिकट पर किस्मत आजमा रहे कीर्ति आजाद ने भी प्रदीप यादव के पक्ष में महगामा में खूंटा गाड़ दिया है। दरअसल, आजाद का पैतृक घर इसी इलाके के कसबा में है और अविभाजित बिहार में महगामा भागलपुर संसदीय सीट का हिस्सा था। कीर्ति के पिता भागवत झा आजाद पांच बार यहां से सांसद रह चुके हैं। इस इलाके में उनका काफी दबदबा है। जातीय समीकरणों के मुकाबले भाजपा उम्मीदवार की कोशिश है कि विकास के मुद्दे पर वोटिंग हो। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी जैसे नेता इनके विकास के कामों को इलाके में गुना चुके हैं। माना जा रहा है कि पीएम मोदी की जनसभा के बाद शायद मतदाताओं का मूड बदल जाय।

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