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गुजरात दंगों के वक्त मासूम थे ये दोनों बच्चे, पहली बार वोट डालकर बोले- दंगों के किस्से सुनकर हुए बड़े, भूलना चाहते हैं कड़वी यादें

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): साल 2002 में अहमदाबाद में हुए दंगों में बचे दो बच्चों में एक मुस्लिम लड़का और लड़की शामिल थे। आज वह दोनों 18 साल के हो चुके हैं। उनका कहना है कि वो इन दंगों को भूल जाना चाहते हैं।

प्रतीकात्नक फोटो सोर्स- जनसत्ता

Lok Sabha Election 2019: गुजरात में 28 फरवरी 2002 की रात जो हुआ, उसने हजारों लोगों की जिंदगी बदल दी। उस वक्त अहमदाबाद में रहने वाले 2 मासूम बच्चे रफीक और पूजा जाधव भी उन दंगों की तपिश से रूबरू हुए। 23 अप्रैल 2019 को लोकसभा चुनाव के दौरान गुजरात की सभी सीटों पर मतदान के दौरान इन दोनों बच्चों ने पहली बार वोटिंग की। रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि हम सांप्रदायिक गुस्से के बीच बड़े हुए हैं और उन कड़वी यादों को भूलना चाहते हैं। इस दौरान उन्होंने पिछले 17 साल के हालात भी साझा किए।

मुस्लिम विरोधी पार्टी मानी जाती है बीजेपी : रफीक एक कारखाने में काम करते हैं, जिसमें राजनीतिक पार्टियों के झंडे आदि की छपाई होती है। वह बताते हैं, ‘‘राजनीति और चुनाव की समझ होने से पहले ही मुझे बताया गया कि बीजेपी मुस्लिम विरोधी पार्टी है। दंगों के दौरान हिंदुओं ने हमें लूटा। बस्ती से भागते वक्त मेरे पिता के पैर में गोली लगी थी और मां के सिर में गंभीर चोटें आई थीं। दंगे के बाद मेरा पूरा परिवार काफी समय तक राहत शिविर में रहा। बीजेपी के प्रति मेरा गुस्सा खत्म नहीं हो सकता। मैं उन्हें माफ कर सकता हूं, लेकिन सबकुछ भूल नहीं सकता।’

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मुसलमानों की परवाह करते तो स्थिति जरूर देखतेः रफीक कहते हैं, ‘अगर मोदी कभी मुस्लिमों की परवाह करते तो देखते कि हमने किस तरह लैंडफिल की बदबू के साथ जीना सीख लिया है। बता दें कि 2002 में गोधरा कांड के बाद अहमदाबाद में हुए दंगों में नरौदा पाटिया इलाके के करीब 97 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें अधिकतर मुस्लिम थे।

मोदी पर लगे थे दंगे भड़काने के आरोपः मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिस दौरान ये दंगे हुए, उस वक्त मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उन पर दंगे करवाने और उन्हें भड़काने के आरोप लगे थे। हालांकि, कानूनी जांच के दौरान कोर्ट को उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। बता दें कि 2002 में कारसेवकों को ले जा रही एक ट्रेन में गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर आग लगा दी गई थी। इसमें 59 कारसेवक जिंदा जल गए थे। माना जाता है कि उनकी मौत के बाद गुजरात में दंगे भड़के थे।

दंगों से बदल गई हमारी जिंदगी : रफीक बताते हैं, ‘‘दंगों के बाद अहमदाबाद का माहौल बदल गया। हिंदुओं ने मुसलमानों को घर बेचने से इनकार कर दिया और मुस्लिमों को इस समृद्ध शहर के बाहर बस्ती बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। मरेे पिता ने नरौदा पाटिया वाला घर बेच दिया और अपना अलग कारोबार शुरू किया। उस वक्त हमारे पास 2 ही विकल्प थे। या तो जहां हमारे पड़ोसी मारे गए, हम वहीं जाकर रहें या कचरे के ढेर को अपना ठिकाना बनाएं। मेरे पिता ने कचरे के ढेर को आशियाना बनना तय किया।

मुस्लिमों के साथ बिताया जीवन : पूजा ने बताया, ‘‘दंगों के वक्त मेरा परिवार भी शहर छोड़कर चला गया था, लेकिन हालात सामान्य होने के बाद नरौदा पाटिया लौट आया। हमारा घर भी जला दिया गया था, लेकिन हमने नए तरीके से शुरुआत की। कुछ मुस्लिम इलाका छोड़कर चले गए थे, लेकिन उनके ही समुदाय के बाकी लोग दोबारा यहां बस गए। मैंने अपना जीवन उनके साथ ही गुजारा है।

हम परियों नहीं, दंगों की कहानी सुनकर बड़े हुए : पूजा बताती हैं, ‘‘2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो मेरी विधवा मां ने जश्न मनाया था। मैं मुस्लिमों के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन मोदी मुझे पसंद हैं। मैं बीजेपी के शासन से संतुष्ट हूं। हम बीजेपी शासित देश में रहते हैं और हमारे साथ कोई बुरा व्यवहार नहीं कर सकता। कोई भी दोबारा दंगा नहीं चाहता। मैंने दंगों के बारे में सुना है। मुझे तब से पता है कि मुस्लिम और हिंदुओं को एक-दूसरे से भिड़ना नहीं चाहिए।’’ इस दौरान रफीक और पूजा दोनों ने कहा कि बच्चे कॉमिक्स और परियों की कहानियां पढ़ते हैं, लेकिन हम दंगों के किस्से सुनकर बड़े हुए हैं।

 

 

 

 

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