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गोरखपुरः क्या अपना गढ़ बचा पाएंगे योगी आदित्यनाथ? जानिए क्या है इस सीट पर जमीनी हालात

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): गोरखपुर लोकसभा सीट पर बीजेपी ने भोजपुरी सिनेमा के एक्टर रवि किशन को मैदान में उतारा है तो वहीं महागठबंधन से सपा ने अपने खाते में से राम भुआल निषाद को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने यहां से मधुसूदन तिवारी को टिकट दिया है।

Author May 16, 2019 8:05 AM
Lok Sabha Election 2019: गोरखपुर लोकसभा सीट की ग्राउंड रिपोर्ट।

Lok Sabha Election 2019: उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल के बड़े शहर के तौर पर देखे जाने वाले गोरखुर में हाल के कुछ सालों में बड़ी करवट ली है। खासकर राजनीतिक दृष्टि से पिछले दो साल इस क्षेत्र के लोगों के लिए अहम रहे हैं। एक तो लंबे समय बाद इस क्षेत्र से किसी नेता ने लखनऊ में मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली तो दूसरी यह शहर भी खुद को विकास की दौड़ में शामिल करने में कामयाब रहा। योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर में कई परियोजनाओं को लाने की कोशिश की। लेकिन इसी बीच 2018 में उपचुनाव के दौरान तीन दशकों से गढ़ समझे जाने वाले गोरखपुर में बीजेपी को इतना बड़ा झटका लगा कि यूपी में सपा-बसपा ने महागठबंधन का फॉर्मूला निकाल लिया। गोरखपुर में आखिरी चरण यानी 19 मई को लोकसभा चुनाव के लिए मतदान होने जा रहा है। इससे पहले जनसत्ता की टीम ने गोरखपुर में चुनावी हाल जाना। वोटर्स से बातचीते अलावा, विकास, जातीय समीकरण आदि पर लोगों से राय पूछी गई। बता दें कि बीजेपी ने भोजपुरी सिनेमा के एक्टर रवि किशन को मैदान में उतारा है तो वहीं महागठबंधन से सपा ने अपने खाते में से राम भुआल निषाद को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने यहां से मधुसूदन तिवारी को टिकट दिया है।

प्रत्याशी रवि किशन पर नाम चल रहा है योगी का : गोरखपुर सीट का योगी आदित्यनाथ 1998 से लगातार प्रतिनिधित्व कर रहे थे। 2014 में भी वे सांसद बने थे और 2017 में यूपी का सीएम बनने के बाद उन्होंने यह सीट छोड़ दी थी। इसके बाद 2018 में हुए उपचुनाव में बीजेपी को यहां लंबे वक्त बाद हार का सामना करना पड़ा। उस वक्त जनता में एक मैसेज गया था कि कैंडिडेट को लेकर मतभेद था। हालांकि, इस हार के कारण योगी की राजनीतिक विरासत पर सवाल उठने लगा था। ऐसे में 2019 की लड़ाई बीजेपी से ज्यादा योगी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है, खासकर गोरखपुर सीट पर। इस बार गोरखपुर सीट पर रवि किशन एक ‘बाहरी’ ही हैं जिन्हें योगी के नाम का सहारा है। प्रत्याशी से ज्यादा फोकस योगी आदित्यनाथ के प्रचार और मंदिर के मैसेज पर है। विशेषकर शहरी मतदाआओं में मंदिर का प्रभाव बड़े पैमाने पर है जो कि उपचुनाव के दौरान काफी हद तक खामोश रहे थे। इसलिए इस बार बीजेपी के लिए इस सीट पर वोटिंग प्रतिशत भी बढ़ाना एक चुनौती है।

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रवि किशन पर कितना भरोसा : हालांकि, शुद्ध रूप से राजनीतिक सीट पर रवि किशन को उतारने के लोग मायने भी नहीं समझ पा रहे हैं। इसी कारण लोगों का सारा भरोसा और विचार का केंद्र योगी आदित्यनाथ हैं। कई रोड शो, जनसभाओं में रवि किशन कह चुके हैं कि चुनाव बाद भी वे फिल्मों में काम करना जारी रखेंगे। ऐसे में लोग उन्हें योगी के प्रतिनिधि से ज्यादा नहीं देख रहे हैं। एक्टर से नेता बने रवि किशन का भी ज्यादा से ज्यादा रूझान यही है कि इस सीट पर लोग उन्हें योगी का प्रतिनिधि ही समझें। रवि किशन ने गोरखपुर में आते ही खुद को मामखोर का शुक्ला बता दिया। वे अपने पूर्वजों के गांव यानी मामखोर का दौरा भी कर चुके हैं। उनकी पत्नी भी गोरखपुर में लगातार प्रचार कर रही हैं।

बसपा-सपा कार्यकर्ताओं में नहीं दिख रहा समन्वय : इस सीट पर प्रवीण निषाद ने उपचुनाव में उपेंद्र शुक्ल को हराकर यूपी में सपा-बसपा को साथ लाने की नींव रखी थी। लेकिन वे आज खुद महागठबंधन में नहीं हैं। प्रवीण निषाद और उनके पिता संजय निषाद बीजेपी का दामन थाम चुके हैं। बीजेपी ने उन्हें संतकबीर नगर से उम्मीदवार बनाया है, जहां उनकी लड़ाई बसपा प्रत्याशी कुशल तिवारी से है। इस बार महागठंबधन के प्रत्याशी राम भुआल निषाद भी उसी जाति से आते हैं जहां से प्रवीण निषाद हैं। सपा ने पुराने कद्दावर नेता राम भुआल पर दांव खेला है लेकिन जमीन स्तर पर यहां बसपा-सपा के कार्यकर्ताओं में तालमेल की कमी देखी जा रही है। मंच पर खुलेआम विवाद की घटनाएं भी देखने को मिल रही हैं। लेकिन अगर राम भुआल को निषाद के अलावा बसपा का कोर वोटबैंक मिल जाता है तो बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। यही कारण है कि बीजेपी ने प्रवीण निषाद को भी प्रचार में उतार दिया है ताकि निषादों का वोट बंट नहीं पाए।

योगी के विकास से खुश हैं गोरखपुर के लोग? : गोरखपुर में विकास की बात करें तो पिछले 2 साल में कई प्रोजेक्ट्स पर कामकाज दिख रहा है। शहर और आसपास हिस्सों को जोड़ने वाली सड़कें चौड़ी हो रही हैं। प्रहलाद कहते हैं- योगी बाबा के आने के बाद गोरखपुर में एम्स खुला, फर्टिलाइजर फिर से खुला। शहर में गैस पाइपलाइन पर तेजी से काम हो रहा है। गांव और शहरी दोनों इलाकों में बिजली की समस्या दूर हुई है। योगी सीएम रह गए तो गोरखपुर के लोगों के लिए बहुत अच्छा काम करेंगे। सहजनवां क्षेत्र के प्रवीण शुक्ला कहते हैं- गोरखपुर की तस्वीर बदल रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और शहरी सौंदर्यीकरण के लिहाज से हमारा शहर काफी तेजी से आगे जा रहा है। मुद्दों की बात करें तो इस बार गोरखपुर में विकास और जातीय समीकरण ही दो बड़े मुद्दे हैं। यहां कई विधानसभा क्षेत्रों में विकास के आगे जातीय समीकरण पर चर्चा काफी ज्यादा दिख रही है।

निषाद वोटर फिर बनेंगे किंग मेकर : समीकरणों के अलावा इस सीट पर सबसे बड़ा फैक्टर निषाद समुदाय का है। पिछले उपचुनाव में यह साबित भी हो चुका है कि करीब 3.5-4 लाख निषाद मतदाता किसी भी प्रत्याशी की तकदीर बदल सकते हैं। यानी इस बार भी निषाद वोटर ही यहां किंगमेकर दिख रहे हैं। यही कारण है कि बीजेपी ने न सिर्फ निषाद पार्टी को अपने साथ किया बल्कि महागठबंधन ने भी इसी समुदाय से अपना कैंडिडेट चुना है। संतकबीर नगर का चुनाव खत्म होने के बाद प्रवीण निषाद और उनके पिता प्रचार में गोरखपुर में बीजेपी के लिए वोट मांग रहे हैं। हालांकि, इस बार निषाद समुदाय का वोट बंट सकता है, जिसका फायदा भी बीजेपी खुद ही उठाने की कोशिश करेगी।

कांग्रेस प्रत्याशी कर पाएंगे बड़ा नुकसान? : कांग्रेस ने मधुसूदन तिवारी को टिकट दिया है, जिनका शहरी इलाकों में ठीकठाक दबदबा है, पर इसका ज्यादा फायदा नहीं होता दिख रहा है। जहां से मधुसूदन तिवारी बार काउंसिल के मेंबर हैं वहीं सारे वकील उनके पक्ष में नहीं दिख रहे है। हालांकि, गोरखपुर में ब्राह्म्ण और ठाकुरवाद में सवर्ण का जो वोट बंटेगा वो कांग्रेस प्रत्याशी के खाते में जा सकता है। पिछली बार उपचुनाव में बीजेपी से प्रत्याशी ब्राह्मण की हार को लोग अभी तक ‘पचा’ नहीं पाए हैं। वहीं, शरद त्रिपाठी और राकेश सिंह बघेल के बीच हुआ जूताकांड यहां भी चर्चा का विषय है जो ब्राह्म्ण और ठाकुर के बीच मनमुटाव ही पैदा कर रहा है।

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