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Lok Sabha Election 2019: आगरा में सफल होगा बीजेपी का ‘प्रयोग’? या वोटर्स पहली बार रचेंगे इतिहास

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): उत्तर प्रदेश के अहम शहरों में से एक आगरा लोकसभा सीट पर 18 अप्रैल को मतदान होना है। ऐसे में Jansatta.com की टीम ने इस लोकसभा सीट का दौरा किया और जानने की कोशिश कि इस बार चुनाव में मतदाताओं का क्या रुख है?

Author Updated: April 15, 2019 8:47 AM
आगरा लोकसभा सीट पर 18 अप्रैल को मतदान होगा। फोटो सोर्स : स्थानीय

Lok Sabha Election 2019 के दूसरे चरण के तहत 18 अप्रैल को मतदान डाले जाएंगे। उत्तर प्रदेश के अहम शहरों में से एक आगरा लोकसभा सीट पर भी इसी दिन मतदान होना है। ऐसे में Jansatta.com की टीम ने इस लोकसभा सीट का दौरा किया और जानने की कोशिश कि इस बार चुनाव में मतदाताओं का क्या रुख है? इस बार मतदाता किन मुद्दों पर वोट देने का मन बना रहे हैं और किसके हाथ बाजी लगने की ज्यादा संभावना है? ग्राउंड रिपोर्ट में आपको इस सीट के हर बिंदुओं से आपको अवगत कराने की कोशिश करेंगे।

पार्टी-प्रत्याशी और रणनीति : 2014 में यहां से बीजेपी प्रत्याशी रामशंकर कठेरिया ने जीत दर्ज की थी। बीजेपी ने 2019 में आगरा से यूपी सरकार में मंत्री एसपी सिंह बघेल को मैदान में उतारा है। वर्तमान सांसद प्रो. राम शंकर कठेरिया को पार्टी ने इटावा भेज दिया है। बघेल को टिकट देने के पीछे बीजेपी बड़ा ‘प्रयोग’ बता रही है। इस रिजर्व सीट पर बघेल को उतारकर बीजेपी बड़े वर्ग का वोट एक बार फिर अपनी ओर करने की कोशिश कर रही है, बता दें कि बीजेपी को 2014 में इस सीट पर करीब 55 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। बघेल का मुख्य मुकाबला बसपा प्रत्याशी मनोज सोनी और कांग्रेस उम्मीदवार प्रीता हरित से है। अगर कांग्रेस प्रत्याशी यहां से जीत जाती हैं तो इस सीट से इतिहास रचा जाएगा क्योंकि यहां से कभी भी कोई महिला उम्मीदवार अभी तक संसद नहीं पहुंची है। अगर बीजेपी की रणनीति की बात करें तो यहां से कठेरिया का टिकट काटना पार्टी के ही एक वर्ग को नहीं सुहा रहा है। दबी जुबान भीतरघात की भी खबरें आईं जिसे पार्टी का राज्य नेतृत्व सिरे से खारिज कर रहा है। हालांकि, बीजेपी इस प्रयोग के पीछे यह भी सोच रखती है कि दो बार जीत के बावजूद कठेरिया को लेकर लोगों में बड़े पैमाने पर नाराजगी पनप रही थी जिसे दूर करने के लिए यह बदलाव जरूरी था। 2018 में जो दलितों का विरोध देशभर में हुआ था उसमें आगरा से खूब आवाज उठी थी, जो कि बीजेपी नेतृत्व के लिए कहीं न कहीं चिंता का सबब बनी थी।

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बाहरी बनाम स्थानीय : बघेल आगरा के ही रहने वाले हैं जबकि बाकी दो मुख्य विरोधी प्रत्याशियों का इस शहर से खास जुड़ाव नहीं देखा जा रहा है। लोहा मंडी निवासी रमेश जैन का कहना है- बघेल तो हमारे ही शहर के हैं, इसलिए हमें उनसे काफी उम्मीदें हैं। बता दें कि मायावती ने बसपा-सपा गठबंधन से मनोज कुमार सोनी को टिकट दिया है जो मुख्य रूप से नोएडा के रहने वाले बताए जाते हैं। इसलिए बीजेपी जमकर बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर रही है। लोग बात इन्हीं तीम बड़े उम्मीदवारों की ही कर रहे हैं जबकि दो निर्दलीय और आदर्श समाज पार्टी, पीस पार्टी के प्रत्याशी की चर्चा न के बराबर है।

क्या कह रिया है चुनाव? : आगरा के एक होटल में काम करने वाले बाबू सिंह पूछते हैं- इस दफा चुनाव क्या कह रिया है? फिर खुद ही जवाब देते हैं- इस बार भी चुनाव मोदी-मोदी कह रिया है। नोटबंदी और जीएसटी के कारण यहां के छोटे उद्योग परेशान दिख रहे हैं, लेकिन उनकी बेचैनी बीजेपी या मोदी विरोध में बाहर नहीं दिख रही। यहां लोहे-कपड़े-सिलाई-बुनाई-मिठाई का बड़ा कारोबार है। खासकर आगरा, आसपास, और राजस्थान के सटे इलाकों में ये कारोबार और इनका असर फैला हुआ है। जीएसटी कि दिक्कतों को लेकर आगरा के राजा मंडी के दुकानदार किशन बाबू गर्ग और वासदेव ललवानी कहते हैं- व्यापारी वर्ग जो नाराज था वह अब सेट हो गया है। एक साल इस्तेमाल करने के बाद समझ चुका है कि जीएसटी क्या होता है।

मुद्दे, लोकल नाराजगी पर मोदी हावी : आगरा में मोदी के पांच साल के कामकाज पर या फिर मुद्दों के फायदे-नुकसान पर बात करने वाले कम ही मिले। अगर नाराजगी है तो वो सांसद थे। खासकर एयरपोर्ट और गंगाजल सप्लाई, यमुना की सफाई जैसे मुद्दे को लेकर, लेकिन बात करते-करते आखिरी में मोदी खुद बतौर मुद्दा उभर जाते हैं। फिर वोटर कहता है- मोदी की बात ही अलग है। आगरा में मुद्दा राष्ट्रवाद का ही हावी दिख रहा है। इस बेल्ट से अधिकांश घरों के लड़के फौज में हैं और बीजेपी उस सेंटिमेंट को बाखूबी भुना पाने में सफल दिख रही है। खासकर पुलवामा में आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद तो राष्ट्रवाद पर हर गली-नुक्कड़ पर चर्चा लाजमी है।

क्या है आगरा का समीकरण? : ताज नगरी आगरा को दलितों की राजधानी या भीम नगरी भी कहा जाता है। दलितों का वोट करीब 35 प्रतिशत है। दस साल से यह सीट बीजेपी के कब्जे में है, 2009 और 2019 में यहां से बीजेपी के कठेरिया ने चुनाव जीता। यहां की पांच विधानसभाओं में बीजेपी का कब्जा है। भले ही आज यहां कांग्रेस को ‘तीन नंबर’ के तौर पर देखा जा रहा हो लेकिन एक वक्त था जब यह सीट कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में से एक थी। पहले चुनाव से लेकर 1971 तक यह सीट कांग्रेस के पास थी। बीजेपी ने पहली बार 1991 में यहां एंट्री मारी और 1996 और 1998 का चुनाव जीता। सपा के खाते में भी यह सीट दो बार (1999-2004) रह चुकी है जिस वक्त राज बब्बर सांसद बने थे। दलितों का बड़ा वर्ग यहां होने के बाद भी कभी भी बसपा प्रत्याशी को यहां कामयाबी नहीं मिली है। लेकिन इस बार सपा-बसपा के साथ आने के बाद मनोज सोनी को उम्मीद है कि वे परीक्षा पास कर जाएंगे।

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