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Ground Report: मैनचेस्टर ऑफ यूपी में त्रिकोणीय मुकाबला, 2004 से जिसने जीता कानपुर, केंद्र में उसकी बनी सरकार

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): कानपुर लोकसभा सीट का इतिहास रहा है कि 2004 से जिस पार्टी का कैंडिडेट यहां जीता है। केंद्र में उसी पार्टी की सरकार बनी है। कानपुर बुंदेलखंड की कानपुर लोकसभा सीट सबसे महत्वपूर्ण सीट है।

Lok Sabha Election 2019

Lok Sabha Election 2019 अब चौथे चरण में पहुंच चुका है। इस दौरान उत्तर प्रदेश की कानपुर लोकसभा सीट पर भी चुनाव हो रहा है, जिसे मैनचेस्टर ऑफ यूपी भी कहा जाता है। कानपुर में अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने हैं, लेकिन सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशी आने से यहां मुकाबला त्रिकोणीय है। कानपुर लोकसभा सीट का इतिहास रहा है कि 2004 से जिस पार्टी का कैंडिडेट यहां जीता है। केंद्र में उसी पार्टी की सरकार बनी है। कानपुर बुंदेलखंड की कानपुर लोकसभा सीट सबसे महत्वपूर्ण सीट है। कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय कोयला मंत्री और तीन बार के सांसद श्रीप्रकाश जायसवाल को मैदान में उतारा है, जिनका सीधा मुकाबला बीजेपी की यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री सत्यदेव पचौरी से है। वहीं, सपा ने रामकुमार निषाद को प्रत्याशी घोषित करके मुकाबले को त्रिकोणीय कर दिया है।

उद्योग-धंधों पर होती है सिर्फ राजनीति : मैनचेस्टर ऑफ यूपी के नाम से मशहूर कानपुर अब अपनी यह पहचान खो चुका है। 1989 लोकसभा चुनाव के बाद से कानपुर के उद्योगों को ग्रहण लग गया। 1991 के लोकसभा चुनाव के बाद से कानपुर की लोकसभा सीट या तो कांग्रेस के खाते में गई है या फिर बीजेपी के खाते में। सभी राजनीतिक पार्टियों ने कानपुर के उद्योग-धंधों पर जमकर राजनीति की, लेकिन इनके लिए किसी भी पार्टी के सांसद ने काम नहीं किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर यह मुद्दा सामने है।

बीजेपी की सरकार के बाद चमड़ा उद्योग पर भी ग्रहण : कानपुर को चमड़ा उद्योग का हब भी माना जाता है। यहां की टेनरियों में बनने वाले जूते, बेल्ट, पर्स, हैट और ग्लब्स की सप्लाई विदेशों में भी होती है। कानपुर का चमड़ा सबसे अच्छा माना जाता है, जिसकी डिमांड चीन, जापान, कोरिया और यूरोपीय देशों में है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार बनने के बाद चमड़ा उद्योग भी हाशिए पर चल रहा है। टेनरियों से निकलने वाला प्रदूषित पानी गंगा में जाता है। इसके चलते कुंभ मेले के दौरान प्रदेश सरकार ने टेनरियों को तीन महीने के लिए बंद करने का फरमान सुनाया था। टेनरी मालिक अब कानपुर की टेनरियों को पश्चिम बंगाल शिफ्ट करने की योजना बना रहे हैं। इससे कानपुर के करीब 8 लाख कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे। ऐसे में यह भी प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है।

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यह है कानपुर लोकसभा सीट का गणित : कानपुर लोकसभा सीट में 5 विधानसभा सीटें आती हैं। आर्यनगर विधानसभा, गोविंद नगर विधानसभा, कैंट विधानसभा, किदवई नगर विधानसभा और सीसामऊ विधासभा। आर्य नगर, कैंट और सीसामऊ विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुल्य क्षेत्र हैं। वहीं, किदवई नगर और गोविंद नगर विधानसभा ब्राह्मण बहुल्य क्षेत्र हैं। आर्यनगर विधानसभा से सपा विधायक अमिताभ बाजपेयी हैं और सीसामऊ विधानसभा में सपा के इरफ़ान सोलंकी विधायक हैं। कैंट विधानसभा सीट से कांग्रेस के सुहैल अंसारी विधायक हैं, जबकि किदवई नगर विधानसभा सीट से महेश त्रिवेदी विधायक हैं। गोविंद नगर विधानसभा सीट से बीजेपी के लोकसभा कैंडिडेट सत्यदेव पचौरी विधायक हैं।

ऐसा है जातीय समीकरण : कानपुर ब्राह्मण बहुल्य क्षेत्र है। बीते 29 वर्षों से कानपुर में सामान्य जाति के नेता ही सांसद बने। कांग्रेस और बीजेपी दोनों दलों ने जनरल कैटिगिरी के प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कैंडिडेट श्रीप्रकाश जायसवाल वैश्य समाज से आते हैं। वहीं, बीजेपी के सत्यदेव पचौरी ब्राह्मण हैं। हालांकि, सपा ने इस चुनाव में ओबीसी कार्ड खेला है। दरअसल, सपा-बसपा गठबंधन होने के बाद कानपुर लोकसभा सीट सपा के खाते में गई थी।

कानपुर लोकसभा सीट का समीकरण देखें यहां

कांग्रेस ने श्रीप्रकाश पर क्यों खेला दांव: कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल 1999 से 2014 तक लगातार सांसद रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के कद्दावर नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने उनके विजय अभियान को रोकने का काम किया था। दरअसल श्रीप्रकाश जायसवाल राजीव गांधी के बेहद करीबी माने जाते हैं। इसी वजह से गांधी परिवार को उन पर सबसे ज्यादा भरोसा है।

बीजेपी ने जोशी की जगह पचौरी को टिकट : 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सत्यदेव पचौरी को कैंडिडेट बनाया। संघ ने सत्यदेव पचौरी के नाम पर मोहर लगाई। जब डॉ मुरली मनोहर जोशी का टिकट कटा तो उन्होंने भी सत्यदेव पचौरी को कैंडिडेट घोषित करने की जिद की। सत्यदेव पचौरी कानपुर की गोविन्द नगर विधानसभा से विधायक है और उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी ने भी पचौरी को 2004 के लोकसभा चुनाव में कानपुर से कैंडिडेट बनाया था। उस वक्त वह कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल से लगभग 5638 वोटों से हार गए थे।

सपा को निषाद पर इसलिए भरोसा : सपा-बसपा गठबंधन होने के बाद सपा ने रामकुमार निषाद को प्रत्याशी बनाया। कानपुर में बड़ी संख्या में ओबीसी, अनुसूचित जाति और मुस्लिम वोटर हैं। सपा अब इन्हीं वोटरों पर सेंध लगाना चाहती है। रामकुमार निषाद मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के ख़ास है। उन्नाव की सदर विधानसभा से विधायक रह चुके है। रामकुमार निषाद के पिता मनोहर लाल 1977 में कानपुर लोकसभा सीट से सांसद भी रह चुके है। आपातकाल के वक्त बंद हुए बंदियों की पैरवी कर चुके रामकुमार निषाद अधिवक्ता भी हैं।

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कानपुर में वोटर्स का हाल : कानपुर लोकसभा सीट में 15,97,591 वोटर्स हैं। इनमें पुरुष वोटरों की संख्या 8,74,299 है, जबकि महिला वोटरों की संख्या 7,23,147 है। वहीं, थर्ड जेंडर की संख्या 145 है। कानपुर लोकसभा क्षेत्र ब्राह्मण बहुल्य क्षेत्र है। इनमें सामान्य जाति के वोटरों की संख्या 5,16,594, ओबीसी वोटरों की संख्या 2,90,721, अल्पसंख्यक वोटरों की संख्या 4,07,182 और अनुसूचित जाति के वोटर्स की संख्या 3,80,950 है । खास बात यह है कि मुस्लिम और अनुसूचित जाति का वोट, जिसके खाते में गया, उसकी जीत सुनिश्चित है।

कांग्रेस-बीजेपी को हो सकता है नुकसान : कांग्रेस बीते कई वर्षों से अल्पसंख्यक, ओबीसी और सामान्य जाति का वोट हासिल करने में कामयाब हो रही थी। वहीं, बीजेपी के खाते में भी सामान्य जाति और ओबीसी का वोट जाता था। अनुसूचित जाति का वोटर बसपा को सपोर्ट करता था। सपा-बसपा गठबंधन के बाद यह तस्वीर बदल गई है। कानपुर में मुस्लिम वोटर काफी हैं, जो सपा और कांग्रेस में बंटे हुए हैं। अनुसूचित जाति का वोटर भी सपा-बसपा गठबंधन के साथ खड़ा है। रामकुमार निषाद ओबीसी कैटिगिरी से आते हैं। ऐसे में ओबीसी वोटर उनका सपोर्ट कर सकता है। इस स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस और बीजेपी को होगा।

2014 में यह थी कानपुर लोकसभा सीट की तस्वीर : 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने तीन बार सांसद व पूर्व केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल को 2,22,946 वोटों से हराया था। डॉ. जोशी को 4,74,712 वोट मिले थे और कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल को 2,51,766 वोट हासिल हुए थे। बसपा के सलीम अहमद को 53,218 वोट मिले थे। वहीं, सपा के सुरेन्द्र मोहन अग्रवाल 25,723 वोट हासिल कर पाए थे।

कानपुर लोकसभा सीट का इतिहास

1952 में पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के हरिहर नाथ शास्त्री सांसद बने थे।

1957 में एसएम बनर्जी इंडिपेंडेंट कैंडिडेट थे और लगातार 1971 तक सांसद रहे।

1977 में भारतीय लोक दल के मनोहर लाल सांसद बने थे।

1980 में कांग्रेस के आरिफ मोहम्मद खान सांसद बने।

1984 में कांग्रेस के नरेश चंद्र चतुर्वेदी सांसद बने।

1989 में कम्युनिष्ट पार्टी ऑफ इण्डिया की सुभाषिनी अली सांसद बनीं।

1991 में बीजेपी के जगतवीर सिंह द्रोण सांसद बने थे। बीजेपी ने इस सीट से पहली बार जीत का स्वाद चखा।

1996 में बीजेपी ने दोबारा इस सीट से जगत वीर सिंह द्रोण ने दोबारा जीत हासिल की थी।

1998 में बीजेपी के जगत वीर सिंह द्रोंण ने हैट्रिक मारी थी।

1999 से लेकर 2009 तक श्रीप्रकाश जायसवाल कानपुर से सांसद रहे।

2014 में मोदी लहर में डॉ मुरली मनोहर जोशी सांसद सांसद बने थे।

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