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Election Results 2019: बंगाल में BJP के इन 5 प्रत्याशियों के खिलाफ TMC ने झोंक दी थी पूरी ताकत, फिर भी नहीं रोक पाई

Lok Sabha Chunav/Election Results 2019: पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी को 22 सीटों पर समेटते हुए बीजेपी के 18 प्रत्याशी संसद पहुचने में कामयाब रहे। हालांकि, बंगाल में बीजेपी के लिए यह राजनीतिक लड़ाई इतनी आसान भी नहीं रही।

Author कोलकाता | May 26, 2019 4:24 PM
Election Results 2019 : पश्चिम बंगाल में बीजेपी के 5 एमपी, जिन्होंने संघर्ष के बाद हासिल की जीत। फोटो सोर्स: जनसत्ता

Election Results 2019: लोकसभा चुनाव समाप्त हो गया है। परिणाम के तहत पूरे देश में बीजेपी और पीएम मोदी की जय-जयकार रही। बंगाल भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां सत्तारूढ़ टीएमसी को 22 सीटों पर समेटते हुए बीजेपी के 18 प्रत्याशी संसद पहुचने में कामयाब रहे। हालांकि, बंगाल में बीजेपी के लिए यह राजनीतिक लड़ाई इतनी आसान भी नहीं रही। पार्टी के प्रत्याशियों को संसद पहुंचने से रोकने और अपना गढ़ बचाने कि लिए टीएमसी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। टीएमसी किसी भी सूरत में ‘42 में 42’ के अपने नारे को कामयाब बनाना चाहती थी। इसके लिए सारे हथकंडे अपनाए गए। वैसे तो बीजेपी के लगभग सभी प्रत्याशियों को टीएमसी के कड़े रुख का सामना करना पड़ा, लेकिन इनमें 5 प्रत्याशियों को कुछ ज्यादा ही लड़ाई लड़नी पड़ी।

दिलीप घोष (मिदनापुर) : बीजेपी ने बंगाल में अपने प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष को भी चुनावी मैदान में उतारा था। वे निवर्तमान विधायक हैं, लेकिन पार्टी का मानना था कि इनके चुनाव में उतरने से अन्य उम्मीदवारों का मनोबल बढ़ेगा। दिलीप घोष को मिदनापुर सीट से पार्टी ने टिकट थमाया गया। उनका विधानसभा क्षेत्र खड़गपुर भी मिदनापुर लोकसभा के अंतर्गत आता है। टीएमसी ने दिलीप के खिलाफ बंगाल की राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी और राज्यसभा सांसद मानस रंजन भुइयां को प्रत्याशी बनाया। भुइयां भी लंबे समय तक विधायक रह चुके हैं। ममता बनर्जी की पहली सरकार में मंत्री भी थे। वहीं, कांग्रेस में रहने के दौरान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी बन चुके हैं। ये दोनों प्रत्याशी इसी जिले के रहने वाले हैं।

दिलीप घोष भले ही बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। विधायक भी हैं, लेकिन पश्चिम मिदनापुर जिले में बीजेपी का सांगठनिक ढांचा टीएमसी की तुलना में कहीं नहीं ठहरता। साथ ही, प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने का फायदा टीएमसी प्रत्याशी को प्रचार के दौरान स्वाभाविक रूप से मिला। एक तरह से कहा जाए कि बिल्कुल विपरीत परिस्थिति में बीजेपी प्रत्याशी को चुनाव प्रचार करना पड़ा। चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने कई बार टीएमसी पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का आरोप भी लगाया था। कायर्कर्ताओं को डराने-धमकाने, चुनाव प्रचार में बाधा डालने की शिकायतें तो आम थीं। इसके बावजूद दिलीप घोष मैदान में डटे रहे। अंत में इसका लाभ मिला। वह विजयी हुए।

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सौमित्र (विष्णुपुर): विष्णुपुर सीट का लोकसभा चुनाव इस बार कई मायनों में काफी रोचक रहा। यहां अदालती मामलों के चलते बीजेपी उम्मीदवार प्रचार करने नहीं जा पाए। उनकी पत्नी ने चुनाव प्रचार का पूरा जिम्मा अपने कंधे पर उठा लिया। यह भी कहा जा सकता है कि पत्नी ने चुनाव प्रचार कर पति को लोकसभा पहुंचा दिया। सौमित्र 2014 के चुनाव में विष्णुपुर लोकसभा सीट से जीते थे। कुछ समय तो सबकुछ ठीकठाक रहा। टीएमसी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले ममता बनर्जी के भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी से सौमित्र की काफी छनती थी। अचानक किसी कारणवश दोस्ती में दरार आ गई। सौमित्र अभिषेक के खिलाफ सोशल नेटवर्किंग साइट पर मुखर होने लगे। आखिरकार वही हुआ, जिसका अंदेशा था। सौमित्र को मजबूरन अपने राजनीतिक गुरु मुकुल राय का हाथ पकड़कर बीजेपी की शरण में जाना पड़ा। उसके बाद शुरू हुआ असली खेल। टीएमसी छोड़ते ही सौमित्र पर कई मामले दर्ज हो गए। अदालती पेच के चलते उनका अपने ही लोकसभा क्षेत्र में जाना ही बंद कर दिया गया। कलकत्ता हाई कोर्ट ने बांकुड़ा जिले में सौमित्र के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी।

विष्णुपुर लोकसभा क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा बांकुड़ा जिले में पड़ता है। अदालत को बताया गया था कि वह कई मामलों के गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में समय बीतता गया और लोकसभा चुनाव आ गया। भाजपा ने सौमित्र को विष्णुपुर से ही प्रत्याशी घोषित कर दिया। परिस्थिति यह उत्पन्न हो गयी कि नामांकन दाखिल करने के लिए सौमित्र को अदालत जाना पड़ा। कोर्ट ने नामांकन के लिए उस क्षेत्र जाने की अनुमति दी। उसके बाद पूरे प्रचार के दौरान वह सिर्फ सोशल मीडिया पर ही एक्टिव रहे। मतदाताओं से सीधा संवाद नहीं हो पाया। इस विकट परिस्थिति में सौमित्र की पत्नी सुजाता आगे आईं। सांसद की पत्नी होने के बावजूद सुजाता को प्रत्यक्ष राजनीतिक का कोई अनुभव नहीं था। इसके बावजूद प्रचार का पूरा जिम्मा उन्होंने अपने कंधों पर लिया। मतदाताओं से सीधे मिलीं। अपना पक्ष रखा। हालांकि बीजेपी की ओर से प्रचार में पूरा सहयोग मिला। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौमित्र के लिए रैली की थी। पार्टी के अन्य नेताओं का भी समर्थन मिला, लेकिन चुनाव प्रचार की बागडोर सुजाता के हाथों में ही थी। 23 मई को जब मतगणना हुई तो सौमित्र की जिद और सुजाता की मेहनत सफल हो गइ। तृणमूल के प्रत्याशी श्यामल सांतरा को सौमित्र ने बड़े अंतर से मात दे दी।

अर्जुन सिंह (बैरकपुर): बैरकपुर इस बार लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की सर्वाधिक चर्चित सीट रही। लोकसभा चुनाव की घोषणा से लेकर मतगणना तक इस सीट पर बंगाल को लोगों की निगाहें टिकी रहीं। बैरकपुर को उत्तर 24 परगना जिले का शिल्पांचल कहा जाता है। 2009 से पहले इस सीट पर लगातार वाम मोर्चा का कब्जा था। 2009 में पहली बार इस सीट पर टीएमसी का परचम लहराया। पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी यहां से तब विजयी हुए थे और 2014 में भी उन्हें विजयश्री मिली। 2009 तथा 2014 में टीएमसी को इस सीट पर जीत दिलाने में शिल्पांचल में धाकड़ नेता अर्जुन सिंह का अहम रोल था। वाममोर्चा की सरकार के दौरान भी सिंह इस इलाके में टीएमसी के एकमात्र नेता थे, जो भाटपाड़ा विधानसभा सीट से लगातार जीतते रहे। 2019 के लोकसभा चुनाव की जब घोषणा की गयी, तब सभी दल अपने प्रत्याशियों के चयन में जुट गए।

तृणमूल में भी चर्चा हुई। पार्टी ने तीसरी बार त्रिवेदी को बैरकपुर से उतारने की घोषणा कर दी। अर्जुन सिंह ने उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया। सिंह के मुताबिक, उन्होंने पार्टी को बताया कि त्रिवेदी से इलाके के लोग खुश नहीं हैं। अपने लोकसभा क्षेत्र में उनका आना-जाना न के बराबर है। तृणमूल को यह नागवार गुजरा। अर्जुन सिंह की राह जुदा हो गई और वह बीजेपी में शामिल हो गए। बीजेपी ने उन्हें बैरकपुर से टिकट भी दे दिया। अब टीएमसी के लिए यह सीट ‘नाक का सवाल’ बन गई। टीएमसी ने उसी वक्त अर्जुन सिंह को 2 लाख से अधिक मतों से हराने की चुनौती भी दे दी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी ने अपने उम्मीदवार के पक्ष में रोड शो और रैलियां कीं। अर्जुन सिंह का कहना है कि उनके खिलाफ राज्य सरकार चुनाव लड़ रही थी। पूरा प्रशासन उन्हें परेशान करने में जुटा था। बीजेपी में शामिल होने से लेकर चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने तक अर्जुन सिंह के खिलाफ कई दर्जन मामले विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज करा दिए गए। वहीं, अर्जुन सिंह ने तो यहां तक आरोप लगाया था कि मतगणना से पहले ही राज्य सरकार उन्हें गिरफ्तार कराना चाहती है। वह अपनी अर्जी लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट से उन्हें 28 मई तक गिरफ्तारी से राहत मिल गई। मतगणना में अर्जुन सिंह ने जीत दर्ज की।

लॉकेट चटर्जी (हुगली): पश्चिम बंगाल में टीएमसी की राजनीतिक जमीन को मजबूती देने में सिंगूर में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन का सबसे अहम योगदान माना जाता है। सिंगूर आंदोलन के बाद से हुगली जिले ने किसी चुनाव में टीएमसी को निराश नहीं किया, लेकिन इस बार बाजी उलट गई। सिंगुर, हुगली लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है। जिस सिंगूर और हुगली ने टीएमसी को राजनीतिक जमीन दी, उसी हुगली ने इस बार टीएमसी को बैरंग लौटा दिया। इस लोकसभा चुनाव में भाजपा ने टीएमसी के लिए सबसे “सेफ” मानी वाली हुगली सीट पर अपना कब्जा जमा लिया। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ममता बनर्जी ने सिंगूर में टाटा की नैनो कार परियोजना के लिए जबरन जमीन अधिग्रहण का आरोप लगाते हुए आंदोलन किया था। बनर्जी ने लगातार धरना-आंदोलन किया था। इस आंदोलन ने तब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं। इसके चलते टाटा जैसे समूह को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा था। मामला कोर्ट पहुंचा था, ममता के पक्ष में कोर्ट का फैसला आया था। आज, उसी सिंगूर के लोग उस जमीन पर उद्योग स्थापित करने की मांग कर रहे हैं। जिस दिन लोकसभा चुनाव का परिणाम आया, सिंगूर के लोगों ने जुलूस निकालकर केंद्र सरकार से सिंगूर में उद्योग स्थापित करने की मांग की। नवनिर्वाचित सांसद लॉकेट चटर्जी ने लोगों को आश्वासन भी दिया है कि इस बारे में अपनी ओर से पूरी कोशिश करेंगी। अपने चुनाव प्रचार के दौरान भी चटर्जी ने सिंगूर के किसानों की बदहाली और उद्योग को ही मुद्दा बनाया था। बीजेपी उम्मीदवार की प्रतिद्वंद्वी टीएमसी की रत्ना डे नाग इलाके में काफी लोकप्रिय हैं। वह राजनीतिक घराने से संबंध रखती हैं। संगठनिक रूप से टीएमसी बंगाल के अन्य इलाकों की तरह यहां काफी मजबूत है। साथ ही, सत्तारूढ़ दल होने का फायदा भी मिल रहा था। इन विषम परिस्थियों के बावजूद बीजेपी प्रत्याशी लॉकेट का जीतना कसिी चमत्कार से कम नहीं है।

बाबुल सुप्रियो (आसनसोल) : केंद्रीय मंत्री रहे मशहूर सिंगर बाबुल सुप्रियो भले ही आसनसोल से बीजेपी के टिकट पर 2014 में चुनाव जीत चुके थे, लेकिन इस बार आसनसोल में उनकी राह काफी पथरीली थी। कोयला खदानों के लिए देश भर में मशहूर इस सीट पर तृणमूल किसी भी कीमत पर कब्जा जमाना चाहती थी। चुनाव प्रचार में तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी भी कहती थीं कि इस बार बीजेपी बंगाल में शून्य पर सिमट जाएगी। दार्जिलिंग तो जीतेंगे ही, आसनसोल से भी बीजेपी को उखाड़ देंगे।

आसनसोल लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली 7 विधानसभा सीटों में से 5 पर टीएमसी का ही कब्जा है। 2 वाममोर्चा के पास हैं। आसनसोल नगर निगम भी टीएमसी के कब्जे में हैं। टीएमसी ने अपनी पार्टी के विधायकों और खास तौर पर आसनसोल के मेयर को निर्देश दिया था कि यह सीट हमें चाहिए। बाबुल के खिलाफ टीएमसी ने गुजरे जमाने की मशहूर अभिनेत्री मुनमुन सेन को उतारा था। मुनमुन ने पिछला चुनाव बांकुड़ा से जीता था। इस बार स्टार को स्टार से टक्कर देने के लिए मुनमुन सेन को आसनसोल लाया गया। चुनाव प्रचार में भी टीएमसी ने पूरी ताकत झोंक दी थी। हालांकि, बाबुल के लिए बीजेपी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। मतदान के दिन अन्य सीटों की तरह यहां पर भी जमकर हिंसा हुई थी। इसके बावजूद बाबुल ने लगभग 2 लाख मतों के अंतर से टीएमसी उम्मीदवार को मात दे दी। (कोलकाता से पूनम चौधरी की रिपोर्ट)

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