Karnataka Election 2018, 2019 Lok Sabha Poll, Rahul Gandhi, Congress President, Narendra Modi, BJP, Regional Parties, Grand Alliance - कर्नाटक चुनाव की इन बातों से उठा सवाल- 2019 में मोदी नहीं तो राहुल भी नहीं बन पाएंगे पीएम? - Jansatta
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कर्नाटक चुनाव की इन बातों से उठा सवाल- 2019 में मोदी नहीं तो राहुल भी नहीं बन पाएंगे पीएम?

क्षेत्रीय क्षत्रपों को सोनिया गांधी द्वारा फोन किया जाना और बीजेपी के खिलाफ एक विकल्प बनाना, इस बात के साफ संकेत देते हैं कि 2019 के आम चुनावों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के सहारे ही आगे बढ़ने की रणनीति पर काम कर रही है।

Author May 21, 2018 5:25 PM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी।

कर्नाटक चुनाव को 2019 के आम चुनावों का लिटमस पेपर टेस्ट माना जा रहा था और कहा जा रहा था कि इसके नतीजे तय करेंगे कि 2019 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार रहेगी या नहीं? कर्नाटक की जनता ने त्रिशंकु विधान सभा का जनादेश देकर यह साफ कर दिया कि कांग्रेस के लिए 2019 की सत्ता इतनी आसान नहीं होने वाली है, जितना कि उसके नेता दावा करते रहे हैं। हां, चुनावी नतीजों के बाद 78 सीट जीतने वाली कांग्रेस ने जिस तत्परता से गठबंधन किया और येदियुरप्पा सरकार को बेदखल करने के लिए मेहनत की, उससे एक बात साबित हो गई है कि कांग्रेस अब क्षेत्रीय क्षत्रपों के दबाव में काम कर रही है। तभी तो 37 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर रहने वाली जेडीएस से गठबंधन करने के लिए भी कांग्रेस को लगभग दर्जनभर विपक्षी नेताओं का सहारा लेना पड़ा और फोन कॉल के जरिए पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा और उनके कुनबे की घेराबंदी करनी पड़ी।

कर्नाटक में चुनाव बाद की गई सियासी चक्रव्यूह रचना में एक खास बात गौर करने वाली यह थी कि जब बेंगलुरु और नई दिल्ली के बीच संवाद चल रहा था, तब बीमार सोनिया गांधी को बेडरूम से निकलकर फ्रंट फुट पर आकर सियासी बैटिंग करनी पड़ी। यानी राहुल गांधी इस चक्रव्यूह रचना में अपेक्षाकृत कम सक्रिय दिखे लेकिन उनके महासचिवों (गुलाम नबी आजाद और अशोक गहलोत) ने मजबूती से किलेबंदी की। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि देवगौड़ा को मनाने के लिए सोनिया गांधी ने सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, केरल के सीएम पी विजयन, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, बसपा सुप्रीमो मायावती, तेलंगाना सीएम केसीआर, आंध्रा सीएम चंद्रबाबू नायडू तक को फोन किया।

क्षेत्रीय क्षत्रपों को सोनिया गांधी द्वारा फोन किया जाना और बीजेपी के खिलाफ एक विकल्प बनाना, इस बात के साफ संकेत देते हैं कि 2019 के आम चुनावों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के सहारे ही आगे बढ़ने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके अलावा सोनिया गांधी की भी भूमिका उसमें अहम रहने वाली है। वैसे भी कई क्षेत्रीय क्षत्रप राहुल के नेतृत्व में 2019 का चुनाव लड़ने से इनकार कर चुके हैं। इनमें ममता बनर्जी और शरद पवार अहम हैं। मौजूदा दौर में कांग्रेस न केवल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है बल्कि अपने नए अध्यक्ष को सर्वस्वीकार्य कराने की भी जद्दोजहद झेल रही है। एक दिन पहले ही राहुल के दोस्त कहलाने वाले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इशारा किया कि 2019 में राहुल पीएम बनेंगे या नहीं, यह समय बताएगा।

यानी संदेश साफ है कि मोदी और बीजेपी विरोध के नाम पर क्षेत्रीय क्षत्रपों की एकजुटता हुई और चुनावों में जीत हासिल हुई तो नरेंद्र मोदी तो पद से हटेंगे ही, राहुल गांधी भी उस पद पर नहीं बैठ सकेंगे। वैसे कांग्रेस भी कभी नहीं चाहेगी कि उसके अध्यक्ष ऐसी गठबंधन सरकार की अगुवाई करें जिसके घटक दलों की एकजुटता और सरकार का भविष्य आशंकित हो। बता दें कि केंद्र में जब भी क्षेत्रीय दलों की अगुवाई वाली सरकारें बनी हैं, हर बार असमय गिरी हैं।

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