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कैसरगंज संसदीय सीट: तस्वीर बदले तो बदले कैसे…हमेशा नेता जीतते रहे, मतदाता हारते रहे

2009 के संसदीय चुनाव में पाला बदलकर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और साइकिल की सवारी करते हुए कैसरगंज से दिल्ली पहुंचे। 2014 के चुनाव में मोदी लहर को देखते हुए एक बार फिर पाला बदला और कमल निशान पर दिल्ली तक की यात्रा पूरी की।

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आजादी के 70 वर्षों बाद भी कैसरगंज की तस्वीर नहीं बदली। वर्ष 1978 में शुरू की गई सरयू नहर परियोजना अब भी अधूरी है, जिससे किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा। हमेशा जातपात, धर्म, संप्रदाय, मंदिर-मस्जिद के नाम पर लोगों को ठगा गया। उनकी बदहाली जस की तस बनी रही। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यहां से हमेशा नेता जीतते रहे और मतदाता हारते रहे। कैसरगंज संसदीय सीट के अंतर्गत पांच विधानसभा क्षेत्र (गोण्डा जिले के तरबगंज, कर्नलगंज, कटरा बाजार तथा बहराइच जिले के पयागपुर, कैसरगंज) आते हैं। आजादी के बाद यह सीट ‘गोण्डा पश्चिमी’ के नाम से जानी जाती थी।

1952 में हुए पहले संसदीय चुनाव में जनसंघ के टिकट पर शकुंतला नायर यहां से चुनी गईं। 1957 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भगवान दीन मिश्र तथा 1962 में स्वतंत्र पार्टी से बसंत कुमारी निर्वाचित हुईं। 1967 और 1971 में एक बार फिर शकुंतला नायर को कामयाबी मिली। 1977 व 1989 में जनता पार्टी के रुद्रसेन चौधरी तथा 1980 व 1984 में इंदिरा कांग्रेस के रानाबीर सिंह निर्वाचित हुए। 1991 में राम लहर के दौरान भाजपा के लक्ष्मी नारायण मणि त्रिपाठी ने इस क्षेत्र से चुनकर लोकसभा पहुंचे। इसके बाद 1996 से लगातार चार बार बेनी प्रसाद वर्मा समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीतते रहे। 2009 के परिसीमन में कैसरगंज सीट का बाराबंकी जिले वाला हिस्सा कट गया और इसमें गोण्डा जिले के इलाके शामिल हो गए। यही वजह रही कि 2008 में परमाणु सौदा के मुद्दे पर भाजपा छोड़कर सपा में आने वाले बृजभूषण शरण सिंह ने 2009 के लोकसभा चुनाव में बलरामपुर सीट छोड़कर यहां से ताल ठोकी और बेनी प्रसाद वर्मा कांग्रेस के टिकट पर गोण्डा से चुनाव लड़कर दिल्ली पहुंचे।

2014 का चुनाव आते-आते बृजभूषण सिंह एक बार फिर भगवा खेमे में लौट आए। मोदी लहर में उन्होंने अपने चिर परिचित प्रतिद्वंदी विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह को पराजित किया। पिछले चार संसदीय चुनाव तीन अलग-अलग सीटों से जीतकर उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल को साबित किया। इस बार भाजपा ने उन्हें कैसरगंज से दुबारा मैदान में उतारा है। सपा-बसपा गठबंधन से चन्द्र देव राम यादव तथा कांग्रेस से पूर्व सांसद विनय कुमार पाण्डेय समेत कुल 12 प्रत्याशी इस सीट से चुनाव मैदान में हैं। 62 वर्षीय बृजभूषण शरण सिंह एक अनुभवी राजनेता व कुशल प्रबंधक हैं। वर्तमान में वे भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष भी हैं। पांच बार लोकसभा सदस्य रहे बृजभूषण शरण सिंह की संसद में उपस्थिति राष्ट्रीय औसत से थोड़ी ज्यादा है। वर्ष 1991 में राम लहर में भाजपा के टिकट पर गोण्डा से पहली बार निर्वाचित होने वाले बृजभूषण शरण सिंह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1998 को छोड़कर वे स्वयं अथवा उनकी पत्नी गोण्डा संसदीय सीट से लोकसभा सदस्य चुने जाते रहे हैं। यह बात अवश्य है कि हवा का रुख भांपकर वे दल और सीट बदलते रहे। 2004 के लोकसभा चुनाव में वे बलरामपुर (अब श्रावस्ती) सीट से लड़े और जीते।

बृजभूषण शरण सिंह, चन्द्र देव राम यादव और विनय कुमार पाण्डेय

2009 के संसदीय चुनाव में पाला बदलकर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और साइकिल की सवारी करते हुए कैसरगंज से दिल्ली पहुंचे। 2014 के चुनाव में मोदी लहर को देखते हुए एक बार फिर पाला बदला और कमल निशान पर दिल्ली तक की यात्रा पूरी की। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह को मात्र 78 हजार मतों से हराया था। इस चुनाव में बसपा के कृष्ण कुमार ओझा को एक लाख 46 हजार मत मिले थे। इस बार कैसरगंज से उनका तीसरा चुनाव है। पिछले चुनाव में भाजपा के बृज भूषण शरण सिंह को 3,81,500 (40.4 फीसद) मत मिले थे, जबकि सपा के विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह को 303,282 (32.1 फीसद) और बसपा के कृष्ण कुमार ओझा को 1,46,726 (15.6 फीसदी) मत मिले थे। कांग्रेस के मुकेश श्रीवास्तव को केवल 57401 (मात्र छह फीसद) मत मिले थे। इस बार यदि पुराने मतों के आधार पर आकलन किया जाय तो सपा-बसपा गठबंधन को मिले 4,50,000 मत भाजपा प्रत्याशी को मिले कुल मतों से करीब 69 हजार अधिक हैं। सपा बसपा गठबंधन के प्रत्याशी चंद्रदेव राम यादव मूल रूप से आजमगढ़ के हैं। उन्हें बसपा ने अपना उम्मीदवार बनाया है। वे क्षेत्र के पिछड़ेपन, सरयू और घाघरा नदियों की विभीषिका तथा सामंती जुल्म के विरोध में मतदाताओं को एकजुट करने में जुटे हैं। आगामी छह मई को 1791950 मतदाता इन प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे। इनमें 73 थर्ड जेंडर के मतदाता भी शामिल हैं।

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