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ब्रिटिश अखबार में पीएम नरेंद्र मोदी की तीखी आलोचना, भारतीय उच्‍चायुक्‍त ने साधी चुप्‍पी

पूर्व में ऐसा देखा गया है कि मोदी सरीखे दिग्गज नेता के बारे में जब भी किसी बड़े अखबार ने तीखी आलोचना की, तो देश के उच्‍चायुक्‍तों ने उसका लिखित में सख्ती से जवाब दिया। हालांकि, इस बार इस प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

Narendra Modi, PM, BJP, NDA Government, India, Critic, British Newspaper, The Guardian, Article, Indian New High Commissioner, London, Ruchi Ghanashyam, National News, Hindi News1950 में विजय लक्ष्मी पंडित के बाद लंदन में रुचि घनश्याम भारतीय उच्चायुक्त के पद पर पहली महिला हैं। (फोटोः टि्वटर/@RuchiGhanashyam)

ब्रिटेन के एक अखबार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीखी आलोचना की है। हाल ही में ‘द गार्जियन’ में छपे लेख में आरोप लगाया गया, “मोदी सरकार नई नौकरियां पैदा करने और अपनी विफलता कबूलने में नाकाम रही। हालिया बजट के जरिए उसने चुनाव से पहले मतदाताओं को साधने का प्रयास किया।” लेख में आगे दावा किया गया कि मोदी काल में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में तकरीबन 28 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जिसमें मुसलमानों की लिंचिंग भी शामिल है।  हैरत की बात है कि लंदन में तैनात नई भारतीय उच्चायुक्त रुचि घनश्याम ने इसी लेख पर चुप्पी साध ली। साल 1950 में विजय लक्ष्मी पंडित के बाद वह इस पद पर पहली महिला हैं।

‘टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट में ब्रिटिश अखबार के लेख का हवाला देते हुए कहा गया, “पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में एक भी पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। आरबीआई और केंद्र के बीच की तनातनी ने भी कई चीजें दर्शाईं, जबकि 2014 से वित्तीय गरीबी आंकड़े भी नहीं अपडेट हुए। ये सारी चीजें संकेत देती हैं कि लोकसभा चुनाव अभियान में वह अपना आर्थिक रिकॉर्ड लेकर उतरेंगे। मगर चिंता की बात यह है कि वह बीजेपी के बहुसंख्यकवाद वाले एजेंडे पर वापस जा सकते हैं, जिसकी वजह से समाज में तनाव की स्थिति पनप सकती है।”

दरअसल, पूर्व में ऐसा देखा गया है कि मोदी सरीखे दिग्गज नेता के बारे में जब भी किसी बड़े अखबार ने तीखी आलोचना की, तो देश के उच्‍चायुक्‍तों ने उसका लिखित में सख्ती से जवाब दिया। हालांकि, इस बार इस प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। टेलीग्राफ को उच्‍चायोग के प्रवक्ता ने बताया, “मुझे नहीं लगता है कि हम इस पर कोई टिप्पणी करेंगे। ढेर सारे अखबार कई प्रकार की चीजें लिख रहे हैं। हम उन पर क्यों प्रतिक्रिया दें?”

अखबार में यह भी कहा गया कि 2014 के चुनाव में मोदी की जीत दो चीजें कमजोर होने से हुई थी। पहला- कांग्रेस में उनके (बीजेपी व मोदी) विपक्षियों की खस्ता छवि, जबकि दूसरा- लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था। मोदी के अभियान के दौरान किए गए वादों में 10 मिलियन या हर महीने आठ लाख चालीस हजार नौकरियां पैदा करने वाली बात सबसे अधिक याद आती है…पर असल में उनकी सरकार इतनी नौकरियों का सृजन कर सकी। लेख में कहा गया, “मोदी सरकार ने अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा मुहैया कराने के लिए भी कुछ नहीं किया। वहीं, केंद्र ने ढेर सारी स्वास्थ्य योजनाएं तो लॉन्च कीं, पर उनके लिए नाकाफी रकम निकाली।”

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