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मप्र चुनाव: मालवा-निमाड़ क्षेत्र में 25 से ज्यादा निगेटिव फीडबैक वाले विधायक भी, कर रहे टिकट की मांग

बीजेपी के सर्वे में मिले फीडबैक के अनुसार राज्य के मालवा-निमाड़ क्षेत्र में 25 से ज्यादा विधायकों की हालत काफी ख़राब है। फिर भी ये विधायक दोबारा टिकट की चाह में अड़े हुए है।

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों की तारीखों का एलान हो चुका है। इस बार चुनावों में सत्ताधारी दल बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद, सभी चुनावी सर्वें जता रहे है। सर्वे में मिले फीडबैक के आधार पर माजूदा सरकार ये जान चुकी है कि, एन्टी इंकम्बेंसी फैक्टर सरकार से ज्यादा उनके विधायकों के खिलाफ हावी है। सर्वे में मिले फीडबैक के अनुसार राज्य के मालवा-निमाड़ क्षेत्र में 25 से ज्यादा विधायकों की हालत काफी ख़राब है। फिर भी ये विधायक दोबारा टिकट की चाहत में अड़े हुए है। पार्टी में बहुत से ऐसे विधायक है जो किसी दूसरी सीट से चुनाव लड़ना चाहते है, तो कोई अपनी वर्तमान सीट से दोबारा लड़ना चाह रहा है।

जबकि पार्टी संगठन टिकट काटकर किसी नए चेहरे को मैदान में उतारना चाहता है। लेकिन कई सालों से सत्ता में बने नेताओं को दोबारा चुनावों में टिकट ना देने की बात कहना, पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। पार्टी जानती है ऐसे नेताओं को टिकट ना मिलने की दशा में, उन्हें बागी होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। अगर वो पार्टी से बगावत नहीं भी करते है तो टिकट मिल चुके उमीदवार को अंदरखाने वोट काट कर, हराने में भी सहयोग कर सकते है। इन सब संभावित चुनौतियों से निपटे के लिए पार्टी ने डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। टिकट वितरण के बाद पार्टी के बड़े नेता असंतुष्ट दावेदारों को मनाएंगे।

इंदौर में 3 नंबर विधानसभा सीट पर पार्टी के अंदर दावेदारी को लेकर काफी उठापटक चल रही है, जिसकी गूंज भोपाल तक सुनाई दी है। कमोबेश राज्य की बदनावर, सुसनेर आदि सीटों पर भी टिकट को लेकर एक से अधिक उम्मीदवार लामबंद हो रहे है। पार्टी ने धार, झाबुआ, खरगोन जिलो में सर्वाधिक मौजूदा विधायकों के टिकट काटने की योजना बनाई है। ये निर्णय पार्टी की आंतरिक सर्वे से मिले फीडबैक के आधार पर किया गया है।

कुछ विधायकों को निगेटिव फीडबैक के बाद भी टिकट देना मजबूरी है क्योंकि उनकी पहचान बड़े नेता के तौर स्थापित है। अपने क्षेत्र के आलावा राज्य के कई हिस्सों में उनकी पहुँच है और उनकी मौजूदगी का असर होता है। मौजूदा समय में मालवा-निमाड़ के 10 से अधिक विधायक ऐसे है जो यहाँ के वर्तमान में निवासी ही नहीं, अपने क्षेत्रों से 50 से 100 किलोमीटर दूर रहते है। जिस वजह से, जनता से उनका जुड़ाव नहीं हो पाता और क्षेत्र की जनता नाराज रहती है। इसके पूर्व कांग्रेस को भी मालवा-निमाड़ क्षेत्र में अपने विधायकों को रिपीट करना काफी महंगा पड़ा था। 2008 के चुनावों में कांग्रेस के 22 विधायक जीते थे, लेकिन 2013 में जब पार्टी ने 22 में से 18 विधायकों को रिपीट किया तो नतीजा ये रहा कि पार्टी 10 से कम सीटों पर सिमट कर रह गयी।

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