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Lok Sabha Election 2019: जब मथुरा से जब्त हो गई थी अटल बिहारी वाजपेयी की जमानत

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): लोकसभा चुनाव और मथुरा का ऐतिहासिक संबंध है। बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस सीट पर चुनाव लड़ा था और उनकी जमानत भी जब्त हो गई थी।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी। फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस

Lok Sabha Election 2019 के दूसरे चरण के तहत वोटिंग शुरू हो चुकी है। इस चरण में 12 राज्यों की 95 लोकसभा सीटों पर मतदान हो रही है, जिनमें उत्तर प्रदेश की मथुरा सीट भी शामिल है। यहां से बीजेपी के लिए अभिनेत्री हेमा मालिनी दूसरी बार ताल ठोंक रही हैं। ऐसे यह सीट खास हो गई है, लेकिन चुनाव और मथुरा का पहले भी ऐतिहासिक संबंध रह चुका है। बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस सीट पर चुनाव लड़ा था और उनकी जमानत भी जब्त हो गई थी।

नतीजों ने किया था हैरान : बता 1957 की है, जब देश दूसरे लोकसभा चुनाव से रूबरू हो रहा था। उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के टिकट पर मथुरा व बलरामपुर लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे। तब तक वाजपेयी कद्दावर नेता बन चुके थे। ऐसे में उनकी जीत पक्की मानी जा रही थी, लेकिन नतीजे सबको हैरान करने वाले थे। मथुरा लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी महेंद्र प्रताप सिंह ने बाजी मारी थी। अटल बिहारी वाजपेयी न सिर्फ चुनाव हार गए थे, बल्कि उनकी जमानत तक जब्त हो गई थी।

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यह था उस चुनाव का परिणाम : 1957 के उस लोकसभा चुनाव में मथुरा सीट पर राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जीत दर्ज की थी। दूसरे नंबर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिगंबर सिंह, तीसरे पर निर्दलीय पूरन और चौथे नंबर पर अटल बिहारी वाजपेयी थे। वाजपेयी को महज 10 प्रतिशत वोट मिले थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी। उस चुनाव में कुल 2 लाख 34 हजार 19 वोट डाले गए थे, जिनमें से वाजपेयी को महज 23 हजार 620 वोट मिले थे।

वाजपेयी ने की थी खुद को हराने की अपील : जनसंघ व बीजेपी के नेता और वाजपेयी के सहयोगी बांकेबिहारी माहेश्वरी बताते हैं कि उस चुनाव में मथुरा लोकसभा सीट पर अटल जी ने लोगों से खुद को हराने की अपील की थी। जब वोटिंग में एक-दो दिन का समय रह गया था, उस वक्त वाजपेयी ने मथुरा की जनता से अपील की थी। उन्होंने कहा था कि लोग मुझे वोट न दें, राजा महेंद्र प्रताप को जिताएं। बताया जाता है कि वाजपेयी कांग्रेस को किसी भी कीमत पर हराना चाहते थे। वहीं, राजा महेंद्र प्रताप को एक समर्पित व्यक्ति के रूप में देखते थे। ऐसे में वाजपेयी का विचार था कि सांसद वही व्यक्ति बने, जो मथुरा के लोगों का भला कर सके।

अजब है मथुरा सीट का इतिहास : चुनावी इतिहास की बात करें तो मथुरा सीट का परिणाम हमेशा चौंकाने वाला रहा है। 1957 के लोकसभा चुनाव में राजा महेंद्र प्रताप को सिर-आंखों पर सजाने वाली मथुरा की जनता ने 1962 के चुनाव में नकार दिया। 1962 के चुनाव में चौधरी दिगंबर सिंह ने जीत दर्ज की। वहीं, राजा महेंद्र प्रताप दूसरे नंबर पर रहे। मथुरा के सादाबाद क्षेत्र स्थित कुरसण्डा निवासी चौधरी दिगंबर सिंह उन प्रतिनिधियों में से एक हैं, जो मथुरा सीट से 3 बार लोकसभा पहुंचने में कामयाब हुए। 1962 के बाद उन्होंने चौथी लोकसभा के दौरान 1970 में हुआ उपचुनाव जीता। वहीं, 1980 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी (सेकुलर) के टिकट पर वे तीसरी बार मथुरा के सांसद बने। हालांकि, पहली लोकसभा के दौरान चौधरी दिगंबर सिंह ने एटा-मैनपुरी-मथुरा सीट से जीत दर्ज की थी। उनके बाद बीजेपी के चौधरी तेजवीर सिंह ने 1996, 1998 व 1999 में लगातार जीत दर्ज करके तिकड़ी बनाई थी। वहीं, कांग्रेस के कुंवर मानवेंद्र सिंह ने भी इस सीट से 3 बार सांसद चुने जाने का गौरव हासिल किया। वे 1984 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और 1989 में जनता दल के टिकट पर जीते थे। वहीं, 2004 में एक बार फिर कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में सांसद चुने गए।

मथुरा सीट जीतने वालों के किस्से भी खास : मथुरा लोकसभा सीट पर जीत हासिल करने वालों के किस्से भी खासे मशहूर हैं। सिंडीकेट बैंक के पिग्मी खाता एजेंट 80 वर्षीय रामबाबू तिवारी मूलत: मांट के रहने वाले हैं। वे बताते हैं कि 1967 में मथुरा से सांसद बने भरतपुर राजपरिवार के सदस्य राजा बच्चू सिंह ने तो क्षेत्र में पैर रखे बिना ही जीत हासिल कर ली थी। उस समय गिरिराज शरण सिंह उर्फ राजा बच्चू सिंह ने ऐलान कर दिया था कि वे मथुरा में पैर तक नहीं रखेंगे और चुनाव जीतकर दिखाएंगे। उन्होंने प्रचार के नाम पर अपनी तरफ से एक अपील छपवाकर हेलिकॉप्टर द्वारा पूरे मथुरा जिले में पैम्फलेट बरसवाए थे। इसके बाद वे भारी मतों से जीते गए। 1971 में कांग्रेस के ठाकुर चकलेश्वर सिंह ने जीत दर्ज की। 1977 में बाहरी प्रत्याशी मनीराम बागड़ी ने तो भारतीय लोकदल के टिकट पर ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जिसके आसपास आज तक कोई दल या कोई प्रत्याशी नहीं पहुंच पाया है। उन्होंने उस समय पड़े 3 लाख 92 हजार 137 मतों में से रिकॉर्ड 76.79 प्रतिशत (2 लाख 96 हजार 518) वोट हासिल करके ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया, जो 42 साल बाद भी बरकरार है।

जब प्रत्याशियों ने खुलेआम मांगे नोट : मथुरा के वोटर्स को उनकी सबसे बड़ी जो याद है, वह यह है कि आपातकाल लागू करने वाली कांग्रेस के राज से मुक्ति पाने के लिए प्रत्याशियों ने चुनावी सभाओं में वोट के साथ-साथ खुलेआम नोट की भी मांग की थी। बाकायदा उस समय की करंसी के सबसे छोटे सिक्के (एक पैसा, दो पैसा) तक झोली फैलाकर लिए गए। दूसरे, उस बार जीतने वाले प्रत्याशी ने फिर कभी मथुरा की ओर मुड़कर भी नहीं देखा। यही वजह है कि मथुरा के वोटर्स बाहरी प्रत्याशियों से जल्दी तालमेल नहीं बना पाते। हालांकि, जब वे अपने यहां अच्छे नेता की कमी महसूस करते हैं तो बाहरियों पर ही दांव खेलने को मजबूर हो जाते हैं। 1991 में बीजेपी ने साधु समाज के सच्चिदानन्द हरि साक्षी को सांसद बनने का मौका दिया। 5 साल के कार्यकाल में वे ऐसा प्रभाव नहीं छोड़ सके, जिससे पार्टी उन्हें दोबारा यहां से लड़ा पाती।

इस बार ये दावेदार हैं मैदान में : 2009 में कांग्रेस सर्मिथत राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार जयंत चैधरी ने जाट मतदाता बहुल सीट पर कब्जा कर लिया। वहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की आंधी में वह अपनी सीट नहीं बचा सके। बीजेपी उम्मीदवार हेमामालिनी 3 लाख 30 हजार से अधिक मतों से विजयी रहीं। भाजपा ने एक बार फिर उन्हीं पर दांव लगाया है। वहीं, सपा-बसपा-रालोद गठबंधन ने पूर्व सांसद कुंवर मानवेंद्र सिंह के छोटे भाई नरेंद्र सिंह को उतरने का मौका दिया। इनके बीच कांग्रेस के महेश पाठक निश्चित रूप से विपक्ष के मतों का बंटवारा कर उन्हें कमजोर करने का प्रयास करेंगे।

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