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असली चुनाव से कितनी मिलती है इन फिल्मों की चुनावी कहानी?

फिल्मों की कहानियां अक्सर समाज से प्रेरित रहती हैं या फिर फिल्मों से काफी हद तक समाज भी प्रेरित रहता है। भारतीय सिनेमा में चुनावी राजनीति को भी बाखूबी पर्दे पर उतारा गया है।

Author Published on: March 16, 2019 11:31 AM
फिल्मों के जरिए भारतीय राजनीति और व्यवस्था को पर्दे पर काफी बार दिखाया गया है. (फाइल फोटो)

कहा जाता है कि फिल्में जिदंगी का हिस्सा होती हैं और आइना भी। जो समाज में घटित होता है उसकी छाप सिनेमा पर देखने को मिल जाती है। समाज और किसी राष्ट्र का सिस्टम किस दिशा में बढ़ने वाला है, कभी-कभी तो सिनेमा उसकी भविष्यवाणी काफी पहले ही कर देता है। भारतीय फिल्मों की भी छाप कभी समाज पर तो कभी समाज की छाप फिल्मों में देखने को मिलती रही है। चूंकि, इस दौरान देश की आबो-हवा में चुनावी सरगर्मियां अपने चरम पर हैं। भारतीय सिनेमा भी राजनीति और इसके पैंतरेबाजी को रूपहले पर्दे पर उतारने में कोई कमी नहीं रखता। किसी ना किसी वक्त में फिल्म में भारतीय राजनीति की मानसिकता और चुनावी दांवपेंच को पर्दे पर फिल्माया जाता रहा है।

चुनाव से संबंधित कई ऐसी फिल्में हैं, जिन्होंने सिस्टम में राजनीति की विशेषता और उसमें व्याप्त नेता-विशेष के घांघपन को उजागर किया हैं। असली चुनाव के मुकाबले फिल्मों में दिखाए जाने वाला चुनाव कोई अतिश्योक्ति नहीं रहा है। चुनाव और राजनीति की परतों को खोलती कुछ फिल्मों का जिक्र आपको सामने हैं…

रईस

राहुल ढोलकिया के निर्देशन में बनी रईस फिल्म में मतदान के तौर-तरीकों और उसके लूप-होल्स को उजागर किया गया। शाहरुख खान इस फिल्म में एक गैंग्स्टर होते हैं, जो जेल में रहते हुए भी चुनाव लड़ते और जीत जाते हैं। वोटरों को मदद (लुभाने) से लेकर समाज को बांटने का दृश्य भारतीय पोल-पॉलिटिक्स के स्याह पहलू को दर्शाता है। इस फिल्म में चुनाव के जरिए यह दर्शाया गया है कि जिसकी ताकत है, वह चुनावी खेल करने में ज्यादा सक्षम हो पाएगा।

पीपली लाइव

अनूषा रिजवी के निर्देशन में अगस्त 2010 में पीपली लाइव पर्दे पर आई। इस फिल्म में गरीब मतदाताओं का शोषण किस तरह से किया जाता है और कैसे अपने निजी स्वार्थ के लिए उनका किसी वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है, चुनाव के इस चरित्र को काफी कटाक्ष भरे अंदाज में दिखाया गया। राजनेताओं की कथित संवेदनशीलता की भी इस फिल्म ने कलई खोलकर रख दी। फिल्म की कहानी मध्य प्रदेश के पिछड़े ग्रामीण इलाके की है। इस फिल्म में गरीबों के हालात का फायदा राजनेता किस तरह से उठाते हैं और जातिगत वोटबैंक पॉलिटिक्स का रंग कैसे चढ़ता है, वह इसमें देखने को मिलता है।

राजनीति

प्रकाश झा की अधिकांश फिल्मों में राजनीति और चुनाव में चलने वाले दांव-पेंच तथा धांधलियां प्रमुख रूप से दिखाई देती रही हैं। उनके निर्देशन में बनी राजनीति फिल्म में कई सारे स्टार मौजूद थे। सत्ता के संघर्ष में पूरी कहानी का तानाबाना महाभारत से प्रेरित होता है। राजनीति में पावर का खुमार क्या होता है और इसे हासिल करने के लिए कोई व्यक्ति किस हद तक जा सकता है, यह फिल्म उसका सबसे बेहतर उदाहरण है। फिल्म में झूठ, साजिश, प्लान्ड मर्डर किस तरह से सियासत को प्रभावित करते हैं, इसे झा ने पर्दे पर उतारा है।

न्यूटन

न्यूटन मूवी को क्रिटिक ने भी काफी पसंद किया। लोकतंत्र और चुनाव की दशा पर यह फिल्म लोगों को आइना दिखाती है। नक्सल-प्रभावित इलाकों में किस तरह से वोटिंग प्रक्रिया अमल में लाई जाती है और चुनाव अधिकारियों की मानसिकता भी कैसी होती है, इसे फिल्म के जरिए बताने की कोशिश की गई है। फिल्म में राजकुमार राव (चुनाव अधिकारी) और पंकज त्रिपाठी (सुरक्षा अधिकारी) के बीच का द्वंद सिस्टम में बेहतरी और सिस्टम की लाचारी की कहानी है।

गैंग्स ऑफ वासेपुर-2

अनुराग कश्यप ने अपनी कई फिल्मों में राजनीति और चुनाव की डार्क थियरी को पर्दे पर लाने की कोशिश की है। फिल्म गुलाल में उन्होंने छात्र राजनीति और इसमें शामिल साजिशों को काफी अच्छे ढंग से फिल्माया है। वहीं, गैंग्स ऑफ वासेयपुर में उन्होंने चुनावी राजनीति के सबसे घिनौने पहलू को भी पेश किया है। बूथ कैप्चरिंग, लोगों की हत्या और ताकत का खूंखार इस्तेमाल किस हद तक होता है, इसकी बानगी उन्होंने पूरी तरह से फिल्म में पेश की है।

आंधी

70 के दशक में आई फिल्म ‘आंधी’ फिल्म इतिहास की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। राजनेता की निजी जिदंगी पर बनी यह फिल्म उसके सामाजिक एवं राजनीतिक प्रोटोकॉल को काफी मार्मिक ढंग से पर्दे पर उतारती है। फिल्म में सुचित्रा सेन का किरदार जो कि राजनेता की भूमिका में है, वह अपनी निजी जिदंगी की कई बेशकीमती खुशियों को सियासत की आग में झोंकती जाती है। लेकिन, चुनाव में उनकी निजी जिदंगी को उनके खिलाफ इस्तेमाल करने की साजिशें भी खूब होती हैं।

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