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इस दफा के चुनाव में बिहार की 40 सीटों में से 13 सीटों पर नोटा तीसरे स्थान पर रहा

" नोटा " यानी इनमें से कोई नहीं एक दफा फिर नाराज मतदाताओं का ताकतवर हथियार बना। बिहार की 13 संसदीय सीटें ऐसी है जहां नोटा तीसरे स्थान पर रहा। यह अलग बात है कि अबकी जीत- हार का अंतर एक- दो सीटों को छोड़ बाकी पर काफी ज्यादा होने की वजह से किसी उम्मीदवार की जीत में रोड़ा नहीं बन पाया। मगर हारने वाले उम्मीदवार का अंतर जरूर बढ़ा दिया।

Author भागलपुर | May 24, 2019 6:45 PM
इस दफा बिहार में सबसे ज्यादा नोटा का बटन गोपालगंज के मतदाताओं ने दबाया है। मसलन 51565 मत नोटा में पड़े है।

” नोटा ” यानी इनमें से कोई नहीं एक दफा फिर नाराज मतदाताओं का ताकतवर हथियार बना। बिहार की 13 संसदीय सीटें ऐसी है जहां नोटा तीसरे स्थान पर रहा। यह अलग बात है कि अबकी जीत- हार का अंतर एक- दो सीटों को छोड़ बाकी पर काफी ज्यादा होने की वजह से किसी उम्मीदवार की जीत में रोड़ा नहीं बन पाया। मगर हारने वाले उम्मीदवार का अंतर जरूर बढ़ा दिया। यह माना जाता है कि नोटा बटन ज्यादातर शहरी इलाके के पढ़े लिखे प्रबुद्ध मतदाता ने ही दबाया है। यह सिर्फ अपनी नाराजगी जाहिर करने के अलावे ये मत किसी काम के नहीं है। वरीय अधिवक्तता कौशल किशोर पांडे और हरिप्रसाद शर्मा कहते है कि इससे समस्या का निदान तो निकलने वाला नहीं है। बल्कि अपना वोट बर्बाद करना है। पुलिस के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि राजनैतिक दल आगे से सबक लेंगे। और ऐरे गैरे को उम्मीदवार बनाने में सोचेंगे।

खैर अपनी – अपनी पसंद और अपना-अपना राग। यही खूबसूरती है लोकतंत्र की। इस दफा बिहार में सबसे ज्यादा नोटा का बटन गोपालगंज के मतदाताओं ने दबाया है। मसलन 51565 मत नोटा में पड़े है। दूसरा स्थान पूर्वी चंपारण का जहां 45699 मतदाताओं ने नोटा में मत दिए। वाल्मीकिनगर के 39935 वोटरों ने नोटा बटन दबा तीसरा स्थान हासिल किया है। जमुई के मतदाता भी पीछे नहीं रहे। 39496 मत वहां नोटा में पड़े।

इसके बाद 35417 मत हासिल कर समस्तीपुर में नोटा पांचवें स्थान पर रहा। नवादा में 35044, गया में 29915, भागलपुर में 31567 मत नोटा में पड़े। 2014 के मुकाबले भागलपुर में यह तिगुने के करीब है। बीते चुनाव में 11875 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। और भाजपा के शाहनबाज हुसैन 9485 मतों से चुनाव हारे थे। इस बार नोटा दबाने वालों की तादाद जरूर बढ़ी। मगर जीत – हार पर इसका पिछले चुनाव के मुकाबले वैसा असर नहीं पड़ा। इसकी वजह यह है कि जीत-हार का अंतर लाखों में है।

इसके अलावे सारण में 28277, पूरबी चंपारण में 22620, आरा में 21763, अररिया में 20618, कटिहार में 20584 , दरभंगा में 20468 मतदाताओं ने नोटा पसंद किया। जबकि इन जगहों पर इस दफा की तुलना में नोटा पसंद करने वाले मतदाताओं की संख्या काफी कम थी। अबकी भारी इजाफा आंका गया है।

असल में राजनैतिक दल जनता से बगैर रायशुमारी किए या हवाई नेता को चुनाव में उतार जातपात, बाहुबल या धनबल पर लोगों से वोट हासिल करने की कोशिश करते है। इसी को झटका देने का औजार वोटरों को दिया गया है। जो अब मजबूत रूप लेता दिख रहा है। तभी बिहार की 40 सीटों में से 13 सीटों पर यह तीसरे स्थान पर रहा। जो कुछ राजनैतिक दलों को होशियार होने का संकेत है।

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