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Elections 2019: आखिर जाए तो जाए कहां मुसलमान मतदाता

सोलहवें लोकसभा के चुनाव में जिस बसपा ने सपा के इस पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की थी, वो इस बार सपा के साथ खड़ी है। राष्ट्रीय लोकदल भी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गबंधन का हिस्सा है।

Author Updated: April 2, 2019 8:20 AM
उत्तर प्रदेश का मुसलमान मतदाता एक बार फिर दुविधा में है। वो सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भी यह तय नहीं कर पा रहा है कि आखिर किस राजनीतिक दल के साथ जाकर खड़ा हो।

अंशुमान शुक्ल
उत्तर प्रदेश का मुसलमान मतदाता एक बार फिर दुविधा में है। वो सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भी यह तय नहीं कर पा रहा है कि आखिर किस राजनीतिक दल के साथ जाकर खड़ा हो। समाजादी पार्टी का पारंपरिक मतदाता मानी जाने वाली इस बिरादरी के सामने पसंद के लिए सपा-बसपा और रालोद का गठबंधन है। साथ ही कांग्रेस भी उसको अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश में है। ऐसे में वह अब तक यह तय नहीं कर पाया है कि वो खड़ा किस राजनीतिक दल के साथ हो। सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से किसी एक पर भी मुसलिम उम्मीदवार ने जीत दर्ज नहीं की थी। जबकि पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में उत्तर प्रदेश से सात नुमाइंदे संसद में चुनकर पहुंचे थे। ऐसे में इस बार के लोकसभा चुनाव में जाएं तो जाएं कहां? का सवाल हर मुसलमान को गहरे तक साल रहा है।

सोलहवें लोकसभा के चुनाव में जिस बसपा ने सपा के इस पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की थी, वो इस बार सपा के साथ खड़ी है। राष्ट्रीय लोकदल भी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गबंधन का हिस्सा है। बसपा के प्रति मुसलमान मतदाताओं के अनमनस्क भाव की बड़ी वजह सिर्फ एक है। भाजपा का बहुजन समाज पार्टी का कभी रहा साथ। जिसके बल पर मायावती ने उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी।

उत्तर प्रदेश के लगभग 20 फीसद मुसलमान सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में अपनी भूमिका पर बेहद गंभीर हैं। उसकी बड़ी वजह सोहवीं लोकसभा का वह चुनाव परिणाम है जिसमें उत्तर प्रदेश से एक भी मुसलमान सांसद नहीं बन सका था। अब तक समाजवादी पार्टी के पाले में खड़ी मतदाताओं की इस बिरादरी को कांग्रेस लुभाने की कोशिश में है। कांग्रेस ने नेता इस बात को बखूबी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश की 35 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान हार-जीत का फासला तय करने की कुव्वत रखता है। इन सीटों पर मुसलमान मतदाताओं का फीसद बीस या उससे अधिक है। जाहिर है यह फीसद किसी पार्टी की तरफ मुड़ कर उसकी सीटों पर बड़ा फर्क पैदा कर सकता है।

मुसलमानों को एक और बात साल रही है। देश में हुए पहले लोकसभा चुनाव से अब तक उत्तर प्रदेश की सीटों की संख्या में मुसलमान सांसदों की संख्या में गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ। वर्ष 1952 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से सात, 1957 में छह, 1962 में पांच, 1967 में पांच, 1971 में छह, 1977 में दस, 1980 में 18, 1984 में 12, 1989 में आठ, 1991 में सिर्फ तीन, 1996 में छह, 1998 में छह, 1999 में आठ और 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से चुनकार जाने वाले मुसलमान सांसदों की संख्या सिर्फ 11 थी। जबकि वर्ष 2009 के लोकसभ चुनाव में सात सांसद उत्तर प्रदेश से जीते थे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी भागीदारी शून्य रह गई थी और उनका एक भी नुमाइंदा नहीं जीत पाया था।

यदि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो उत्तर प्रदेश में अब तक के इतिहास के सबसे कम 23 विधायक ही जीत पाने में कामयाब हो सके। जबकि उत्तर प्रदेश की 147 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान मतदाता किसी भी दल के प्रत्याशी की हार-जीत का फैसला करने की हैसियत रखता है। वो लोकसभा क्षेत्र जहां मुसलमान मतदाता सर्वाधिक हैं उनमें मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, सहारनपुर, मेरठ, बलरामपुर, बरेली, मुजफ्फरनगर, डुमरियागंज, लखनऊ, बहराइच व कैराना में मुसलमान मतदाता 23 फीसद हैं। इनके अलावा शाहजहांपुर, बुलंदशहर, सीतापुर, अलीगढ़, आगरा, गोंडा, अकबरपुर, बागपत और लखीमपुर में मुसलिम मतदाता कम से कम 17 फीसद है।

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