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Lok Sabha Election 2019: आसान नहीं चिराग का बंगला रौशन होना, इन 30% वोटों पर महागठबंधन का है अकेले कब्जा

Lok Sabha General Election 2019 India: बिहार के जमुई में इस बार लोजपा सांसद चिराग पासवान का बंगला (लोजपा का चुनाव चिह्न) रौशन होने में कई अड़चनें हैं।

बिहार के जमुई से लोजपा सांसद चिराग पासवान

बिहार के जमुई में इस बार लोजपा सांसद चिराग पासवान का बंगला (लोजपा का चुनाव चिह्न) रौशन होने में कई अड़चनें हैं। वैसे तो यह संसदीय सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है लेकिन एनडीए की तरफ से लोजपा के चिराग पासवान की सीधी टक्कर महगठबंधन की तरफ से रालोसपा के प्रत्याशी भूदेव चौधरी से है। एनडीए के लिए यह प्रतिष्ठा की सीट मानी जा रही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में चुनावी अभियान का आगाज जमुई से ही किया। चिराग केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के बेटे हैं। सीएम नीतीश कुमार ने भी उनके समर्थन में गुरुवार को तारापुर और चकाई जाकर चुनावी सभाएं की है। 17 लाख से ज्यादा मतदाता यहां 11 अप्रैल को अपना वोट डालेंगे।

स्थानीय लोगों का मानना है कि इस बार मुकाबला बराबरी का है। रालोसपा के भूदेव चौधरी 2009 में एनडीए उम्मीदवार थे और जदयू के टिकट पर 1,78,560 वोट हासिल किए थे। उनके खिलाफ राजद से श्याम रजक मैदान में थे जिन्हें 1,48,763 वोट मिले थे। कांग्रेस के अशोक चौधरी को 71,267 मत मिले थे। 2014 में जब मोदी लहर थी तब यहां से चिराग पासवान की जीत हुई थी। उन्हें कुल 2,85,354 वोट मिले थे। इनके सामने राजद के सुधांशु भास्कर 1,99,407 वोट लाकर दूसरे स्थान पर रहे। जदयू के उदय नारायण चौधरी 1,98,599 मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे। यानी 2009 और 2014 में दोनों बार टक्कर राजद से ही हुई थी। फर्क यह था कि 2009 में कांग्रेस और राजद ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था तो 2014 में भाजपा-लोजपा साथ थी मगर जदयू अलग थी। इस बार इधर भाजपा-लोजपा-जदयू साथ है तो उधर राजद-कांग्रेस-रालोसपा एकसाथ है।

दरअसल जमुई संसदीय क्षेत्र 1971 के बाद विलुप्त हो गया और इसके इलाके अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों में जोड़ दिए गए। 1971 में यहां से सीपीआई के भोला मांझी जीते थे। 2008 में हुए परिसीमन में यह संसदीय सीट फिर से वजूद में आया और 2009 के लोकसभा चुनाव के नक्शे में जमुई सामने दिखा। तब से यह सीट एनडीए के पाले में है। हालांकि, इस बार जातीय समीकरण का हिसाब चिराग पासवान के लिए कांटे की टक्कर है। जमुई लोकसभा क्षेत्र में यादव वोटरों की आबादी करीब साढ़े तीन लाख, मुस्लिम मतदाताओं की करीब ढाई लाख, दलित व महादलित की आबादी तीन लाख, सवर्णों की आबादी ढाई लाख और अन्य पिछड़ी जातियों के मतदाताओं की आबादी करीब चार लाख है। इस सीट पर पचास हजार नए मतदाता बने है। वोटों के जातिगत हिसाब से सवर्ण मतदाता का झुकाव एनडीए की तरफ नजर आता है लेकिन राजद का माई (MY) समीकरण भी मजबूती से एकसाथ खड़ा है।

राजद के मतादाताओं में लालू यादव के प्रति सहानुभूति भी है। यादव मतदाता कहते हैं कि लालू को जेल भेजकर नरेंद्र मोदी ने गलत किया है। मसौढ़ी चौक जमुई की अफसाना सुल्ताना कहती हैं जो हिंदू मुसलमान के झगड़े दंगा-फसाद रोकेगा वोट उसी को देंगे। चिराग का बंगला रौशन होने में अड़चनों की पड़ताल करने पर जातीय समीकरण के साथ भितरघात भी है। कुछ दिनों पहले भाजपा में शामिल होने वाले सम्राट चौधरी खेमा के भितरघात की चर्चा भी जोरों पर है। दरअसल, इन्हें भाजपा ने खगड़िया से टिकट का भरोसा दिला पार्टी की सदस्यता दिलवाई थी मगर लोजपा ने इन्हें अपनी पार्टी से टिकट देने से इनकार कर दिया। खगड़िया से वर्तमान लोजपा सांसद महबूब अली कैसर फिर से चुनाव लड़ रहे हैं। सम्राट चौधरी को उपेंद्र कुशवाहा की काट करने और कोइरी मतों को साधने के लिए भाजपा में लाया गया था। ये परबत्ता से विधायक और राजद सरकार में मंत्री रह चुके हैं। इनके पिता शकुनी चौधरी हैं जो तारापुर से कई दफा विधायक और मंत्री रहे हैं। इनकी माता पार्वती देवी भी विधायक रही हैं।

तारापुर विधानसभा क्षेत्र जमुई संसदीय क्षेत्र का ही हिस्सा है। यहां कोइरी और पिछड़ी जाति की तादाद काफी है। इस क्षेत्र में सम्राट चौधरी का दबदबा भी है। ऐसे में खगड़िया से टिकट न मिलने के मलाल का बदला ये भितरघात कर ले सकते हैं। हालांकि, लोजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष संगीता तिवारी इसे सिरे से खारिज करती हैं। जमुई संसदीय क्षेत्र में तारापुर के अलावा शेखपुरा, जमुई, झाझा, चकाई और सिकंदरा (सु) विधानसभा सीटें है। लोजपा उम्मीदवार अपनी जीत का दावा करते हुए अपना काम गिनाते हैं और कहते हैं कि मोदी सरकार के दौरान यहां केंद्रीय विद्यालय बना। मेडिकल कॉलेज की मंजूरी मिली। कृषि विज्ञान केंद्र फिर से जिंदा हुआ। पॉलिटेक्निक कॉलेज खुला। 2800 करोड़ रुपए की विभिन्न योजनाएं चल रही है। उधर, महगठबंधन के भूदेव चौधरी भी अपना प्रचार को गति दिए हुए हैं। तेजस्वी यादव भी सभाएं कर रहे है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली जैसी भीड़ नहीं दिख रही।

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