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नीतियों से नाराजगी, समाधान पर ध्यान नहीं

असल में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन ने आदिवासियों को अपनी जमीन की अहमियत का एहसास कराया है। उनका कहना है कि भाजपा एक दफा फिर महाजनी प्रथा लाना चाहती है।

BJP, Lok Sabha Electionबीजेपी दिल्ली में सब सही नहीं चल रहा!

गिरधारी लाल जोशी

विभिन्न समस्याओं से घिरी संथाल परगना की तीन सीटों में से केवल गोड्डा सामान्य सीट है। बाकी राजमहल और दुमका संथाल आदिवासियों के लिए सुरक्षित हंै। इन दोनों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा का कब्जा है। वहीं गोड्डा सीट भाजपा की झोली में है। यहां से निशिकांत दुबे तीसरी दफा चुनाव लड़ रहे हैं। इनके सामने पूर्व सांसद प्रदीप यादव झारखंड विकास पार्टी से है।

दुमका में झामुमो नेता शिबू सोरेन यहां से आठ दफा चुनाव जीत चुके है। फिर नौवीं दफा जीत का सेहरा बांधने चुनावी समर में कूदे हैं। राजमहल में झामुमो के विजय हांसदा निवर्तमानन सांसद हैं। अबकी भी झामुमो ने इन्हें ही मैदान में उतारा है। झारखंड में महागठबंधन मजबूती से खड़ा है। इन इलाकों का दौरा करने पर लगा कि जितने विकास के काम गोड्डा संसदीय इलाके में हुए है, उतने दुमका और राजमहल में नहीं हुए। जबकि दुमका संथाल परगना का डिविजनल मुख्यालय है। गोड्डा में रेलवे लाइन, कृषि कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, देवघर में एम्स, अंतरराष्ट्रय हवाई अड्डे का निर्माण वगैरह बड़ी योजनाओं पर अमलीजामा पहनाया गया।

बावजूद इसके इन तीनों संसदीय क्षेत्रों में आदिवासी मतदाताओं में भाजपा की रघुवर दास की सरकार से बेहद नाराजगी है। छोटानागपुर और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट्स में संशोधन की वजह से नाराजगी है। वैसे अप्रैल 2017 में हुए लिट्टीपाड़ा विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा को झामुमो के साइमन मरांडी ने भाजपा के हेमलाल मुर्मू को 13 हजार मतों से हराकर नाराजगी का संदेश दे चुके है। इतना ही नहीं चुनाव के ठीक तीन रोज पहले खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नितिन गडकरी सभा कर गए थे। ये दो हजार करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले साहेबगंज-मनिहारी गंगा नदी पुल की बुनियाद रखने आए थे।

यह अलग बात है कि पुल दो साल गुजर जाने पर भी कागजों से नीचे नहीं उतर पाया है।साहेबगंज राजमहल लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। मगर यहां के लोग इसे मरता हुआ शहर बोलते है। यहां से रेलवे का लोको मालदा शिफ्ट होने के बाद शहर बैठ सा गया है। लोगों का पलायन तेजी से हुआ। इस शहर का मुआयना करने पर खुद व खुद अंदाज हो जाएगा कि यहां खड़ी पुरानी इमारतें आबादी विहीन है। इस इलाके का सबने राजनैतिक दोहन किया है।

पीने के पानी और प्लस टू स्कूलों की बेहद कमी संथाल परगना में अखरती है। ऊपर से गोड्डा में अडानी के पावर प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण का मुद्दा जबरदस्त है। यह प्रोजेक्ट गोड्डा के मोतिया, माली, गायघाट और इसके आसपास के गांवों में प्रस्तावित है। राज्य सरकार ने मंजूरी दे दी है। इसका भारी विरोध भाजपा को झेलना पड़ रहा है। गांव के सुग्गा हांसदा कहते है कंपनी का फरमान है कि जमीन नहीं दोगे, तो जमीन में गाड़ देंगे। लेकिन संथाल परगना के लोग जान देने को तैयार हैं। मगर जमीन नहीं देंगे। यहां प्रशासनिक स्तर पर भी जोर जबरदस्ती की बात सामने आई है।

असल में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन ने आदिवासियों को अपनी जमीन की अहमियत का एहसास कराया है। उनका कहना है कि भाजपा एक दफा फिर महाजनी प्रथा लाना चाहती है। इसे हम हरगिज नहीं होने देंगे। उनका यह नारा इलाके में असरदार है। गोड्डा संसदीय क्षेत्र में दो शिवलिंग है। बाबा वासुकीनाथ और देवघर में बाबा बैद्यनाथ। यहां सांसद निशिकांत दुबे की मंदिर मामले में दखल यहां के पंडा समाज को ठीक नहीं लगती। इनके खिलाफ आंदोलन पंडा समाज करता रहा है। इसे पूर्व मेयर राजनारायण खवाड़े उर्फ बबलू खवाड़े के बीच बचाव से सुलझाया जाता है।

पंडा समाज का देवघर में 15 से 20 हजार वोटर हंै। गोड्डा में ईस्टर्न कोल फील्ड की ललमटिया कोयला खदान है। यहां कोयले का अकूत भंडार है। यहां के ज्यादातर लोग एलर्जी और अस्थमा के शिकार हैं। दुमका में विकास के नाम पर रेलवे लाइन ही दिखती है। भागलपुर से हावड़ा रेल लाइन बिछ तो गई है। मगर सुपर फास्ट ट्रेनें चलने की यह बाट जोह रहा है। गांवों में संथालियों की हालत वैसी ही है। दुमका के सामाजिक कार्यकर्ता सुमन सिंह कहते हैं कि इस इलाके से तीन मुख्यमंत्री झारखंड को दिए। बाबू लाल मरांडी, शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन। फिर भी संथालियों की दशा नहीं सुधरी। हालांकि 7 मई को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह गोड्डा में भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में सभा कर गए है।

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