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यूपी आंवलाः पिछड़ा इलाका, विकास मुद्दा नहीं

आंवला संसदीय क्षेत्र के चुनाव में भाजपा के निवर्तमान सांसद और उम्मीदवार धर्मेंद्र कश्यप इस बार कड़े त्रिकोणीय मुकाबले में फंसे हैं।

आंवला संसदीय क्षेत्र के चुनाव में भाजपा के निवर्तमान सांसद और उम्मीदवार धर्मेंद्र कश्यप

शंकर दास
आंवला संसदीय क्षेत्र के चुनाव में भाजपा के निवर्तमान सांसद और उम्मीदवार धर्मेंद्र कश्यप इस बार कड़े त्रिकोणीय मुकाबले में फंसे हैं। सपा-बसपा गठबंधन की ओर से बिजनौर की रुचि वीरा और कांग्रेस की ओर से पूर्व सांसद कुंवर सर्वराज सिंह चुनाव मैदान में उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं। भाजपा यहां हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को आगे रखकर लड़ रही है।
पांच विधानसभा सीटों का क्षेत्र
आंवला सीट का गठन 1962 में हुआ था। यह संसदीय क्षेत्र बरेली के तीन आंवला, फरीदपुर, बिथरीचैनपुर और बदायूं के दो शेखूपुरा और दातागंज विधानसभा क्षेत्रों से मिलकर बना है। इस क्षेत्र में ज्यादातर छोटे नगर और गांव ही शामिल हैं। क्षेत्र की समस्याएं भी काफी विकराल हैं।
औद्योगिक पिछड़ापन
आंवला के उर्वरक उद्योग इफ्को और फरीदपुर की चीनी मिल को छोड़ दें तो यह क्षेत्र औद्योगिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है। क्षेत्र के ज्यादातर किसान गन्ने की खेती करते है। यहां एक ही चीनी मिल होने से उन्हें अपना गन्ना खपाने के लिए दूरदराज की चीनी मिलों में जाना पड़ता है। लेकिन इस क्षेत्र में विकास कभी मुद्दा नहीं रहा है।

जातीय समीकरण हावी
जातीय समीकरणों के आधार पर ही मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनते रहे हैं। इस क्षेत्र में मुसलिम मतदाताओं की संख्या लगभग साढ़े तीन लाख होने के बावजूद यहां से कभी कोई मुसलिम उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। इस सीट पर यहां की सबसे बड़ी सवर्ण जाति क्षत्रियों का ही दबदबा रहा है। यहां अबतक हुए कुल 14 चुनावों में नौ बार क्षत्रिय उम्मीदवार जीते हैं। यहां के जातीय आंकड़ों में क्षत्रिय लगभग तीन लाख और ब्राह्मण, वैश्य लगभग एक-एक लाख मतदाता हंै। यहां की पिछड़ी जातियों में यादव मतदाता सबसे ज्यादा यानी दो लाख है। इसके अलावा कश्यप सवा लाख और लगभग इतने ही मौर्य-शाक्य मतदाता हैं। इसके अलावा लगभग तीन लाख दलित मतदाता हैं, जिनमें जाटवों की तादाद सवा लाख बताई जा रही है। इन आंकड़ों पर गौर करें तो यहां के समीकरण सपा और बसपा के काफी अनुकूल नजर आते हैं।

किस दल का कैसा रिकॉर्ड
यहां बसपा का उम्मीदवार कभी जीत नहीं सका है। अलबत्ता सपा के टिकट पर यहां से दो बार 1996 और 1999 के चुनाव में कुंवर सर्वराज सिंह जीते थे। इसके बाद 2004 में वे जद (एकी) के टिकट पर जीते थे। भाजपा के उम्मीदवार भी यहां से पांच बार जीते हैं। भाजपा के राजवीर सिंह ने यहां से 1989, 91 और 1998 के तीन चुनाव जीते थे। मेनका गांधी यहां से 2009 में जीती थीं। इसके अगले चुनाव में मोदी लहर में यहां से भाजपा के धर्मेंद्र कश्यप ने जीत दर्ज की थी। इस संसदीय क्षेत्र के 1962 में हुए पहले चुनाव में यहां से हिंदू महासभा के ब्रजलाल सिंह जीते थे।

किसकी क्या रणनीति
चुनाव में भाजपा की रणनीति यहां हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर केंद्रित है जबकि दोनों दलों की जातगित समीकरणों पर टिकी हुई है। भाजपा का बूथ स्तर तक का चुनाव प्रबंधन भी अन्य दलों के मुकाबले बेहतर नजर आ रहा है। कांग्रेस ने यहां सपा छोड़कर आए पूर्व सांसद कुवंर सर्वराज सिंह को उम्मीदवार बनाया है। वे इस क्षेत्र के जमीनी नेता माने जाते हैं। गठबंधन की ओर से बसपा की उम्मीदवार रुचि वीरा बिजनौर से यहां चुनाव लड़ने के लिए भेजी गई हैं। उनके चुनाव संचालन के लिए बिजनौर से भी कई लोग आए हैं। वे सपा और बसपा के जनाधार की पिछड़ी और दलित जातियों गोलबंदी पर केंद्रित हैं।

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