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दिल्ली मेरी दिल्ली: समर्थन की दरकार और गठबंधन का डर

लोकसभा चुनाव के लिए नोएडा में हुए मतदान से चंद दिनों पहले महीनों से बदहाल पड़ी सड़कों का कायाकल्प हो गया। नई चमकती सड़कें देखकर शहरवासी हैरान थे। मतदान के कुछ दिन बाद उन्हीं सड़कों की फिर से खुदाई शुरू हो गई।

Author April 22, 2019 1:45 AM
दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

बेदिल

भाजपा को पहले वैश्य बिरादरी की पार्टी माना जाता था और कहा जाता था कि पार्टी के बड़े पद इन्हीं दोनों वर्गों में बंटेंगे। दिल्ली का विस्तार होने पर और अन्य राज्यों के प्रवासियों की संख्या बढ़ने पर भाजपा ने अपना दायरा बढ़ाना शुरू किया। इसमें उसे सफलता मिलती, उससे पहले ही दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी (आप) का पदार्पण हो गया। ‘आप’ ने बिजली हाफ-पानी माफ के नारों से गरीब वर्ग को अपने पक्ष में करके कांग्रेस को कमजोर किया और पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने वैश्य बिरादरी पर डोरे डालने शुरू कर दिए। इसके बाद कहा जाने लगा कि दिल्ली की वैश्य बिरादरी भाजपा के बजाय ‘आप’ के साथ हो गई है। इसमें भले ही सच्चाई न हो, लेकिन जैसे ही भाजपा ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने संकल्प पत्र में छोटे व्यापारियों को पेंशन और आसान कर्ज की बात कही तो दिल्ली भाजपा के वैश्य नेता सक्रिय हो गए। वैश्य बिरादरी का वोट बटोरने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री तक का कार्यक्रम आयोजित करवा दिया और व्यापारियों को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया। हालांकि चुनाव में वैश्य बिरादरी का समर्थन पाने में यह कवायद कितनी मददगार होगी, यह तो वक्त ही बताएगा।

गठबंधन का डर
दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) में गठबंधन की कोशिश महीनों से चल रही है। इसमें सबसे अनोखी रणनीति ‘आप’ की है। पार्टी के नेता गठबंधन की कवायद में भी लगे हुए हैं और महीनों से अपने उम्मीदवार घोषित करके चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं। इसके उलट कांग्रेस के नेता गठबंधन के मुद्दे पर शुरू से ही बंटे हुए हैं। पार्टी में चुनाव प्रचार के बजाय एक-दूसरे की टांग खिंचाई चल रही है। हालात ऐसे हो गए हैं कि कांग्रेस के नेता आपसी गुटबाजी में अपने ही उम्मीदवार की जड़ खोदने लगे हैं। वहीं भाजपा के नेता ‘आप’ और कांग्रेस के संभावित गठबंधन से इस कदर डरे हुए हैं कि महीनों से कोशिश करने के बावजूद आज तक अपने उम्मीदवार तक घोषित नहीं कर पाए। इससे तंग आकर कुछ सांसदों ने तो बिना टिकट मिले ही चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। हालांकि उन्हें डर है कि कहीं उनका टिकट न कट जाए। लेकिन समस्या यह है कि अगर आखिरी दिनों में उम्मीदवार घोषित होते हैं तो वे महीनों से चल रहे ‘आप’ के चुनाव अभियान से आगे कैसे निकल पाएंगे।

नेता की दलील
दिल्ली का लोकसभा चुनाव जिन खास वजहों से याद किया जाएगा, उनमें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबंधन को लेकर करीब तीन महीने तक चली रस्साकशी भी प्रमुख होगी। रोज-रोज बदलते परिदृश्य के बीच जब कांग्रेस की ओर से सभी सात सीटों पर उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया ने जोर पकड़ा तो पश्चिमी दिल्ली सीट से प्रख्यात पहलवान सुशील कुमार का नाम सियासी गलियारों में तैरने लगा। उनका नाम आते ही पश्चिमी दिल्ली से चुनाव लड़ने के इच्छुक कांग्रेसी नेताओं ने उनके खिलाफ कई मुद्दे जुटा लिए। इसके अलावा दिल्ली देहात के भी कुछ नेताओं ने सुशील के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। देहात से ताल्लुक रखने वाले ऐसे ही एक जाट नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शीला दीक्षित के पास पहुंचे और उनसे बोले कि दीदी! ऐसा है कि पहलवानी ऐसी कोई खास बात नहीं है कि उसके दम पर किसी को लोकसभा का टिकट दिया जाए और सुशील कोई सेलिब्रिटी नहीं हैं, वह भी बाकी पहलवानों की तरह ही हैं। उन्होंने कहा कि देहात में हर घर में आपको पहलवान मिल जाएंगे। इसका यह मतलब थोड़े ही है कि हर आदमी स्पोर्ट्स कोटे से टिकट पा जाए। उन्होंने एक दिलचस्प दलील दी कि क्रिकेट, बैडमिंटन, टेबल टेनिस हो तो बात समझ में आती है कि वह कोई खिलाड़ी है, लेकिन पहलवानी के नाम पर किसी को खिलाड़ी का दर्जा देना उचित नहीं है। उनकी दलील सुनकर लोगों ने खूब ठहाके लगाए।

सियासत से दूर
राजधानी में इन दिनों चुनावी बयार बह रही है। समाज के हर वर्ग में चुनाव की हलचल दिखाई देने लगी है, लेकिन एक तबका ऐसा भी है चुनावी चर्चा में जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है और वह तबका है घरेलू सहायिकाओं का। यह तबका चुनावी चकल्लस पर ध्यान देने के बजाय दिन-रात अपनी जीविका के जुगाड़ में लगा है। इसकी एक बानगी बेदिल को भी देखने को मिली। एक घरेलू सहायिका से जब चुनाव पर बात की गई और पूछा गया कि इस बार किसके जीतने के आसार हैं या कौन सी पार्टी जीतनी चाहिए तो उसने तपाक से कहा, ‘कोउ नृप होई हमै का हानी, चेरी छांड़ि कि होइब रानी’। इसका मतलब समझाते हुए वह बोली, ‘कोई भी जीते-हारे हमारी हालत थोड़ी न बदलने वाली है। हमें तो ऐसे ही खटना है।’

हैरान परेशान जनता
लोकसभा चुनाव के लिए नोएडा में हुए मतदान से चंद दिनों पहले महीनों से बदहाल पड़ी सड़कों का कायाकल्प हो गया। नई चमकती सड़कें देखकर शहरवासी हैरान थे। मतदान के कुछ दिन बाद उन्हीं सड़कों की फिर से खुदाई शुरू हो गई। शहरवासी फिर हैरान थे कि अगर खुदाई करनी थी, तो सड़क बनाई ही क्यों। जनता को इन सवालों को कोई जवाब नहीं मिल रहा है। शहर के ज्यादातर निवासी असमंजस में हैं कि करीब डेढ़ साल से खस्ताहाल पड़ी और गड्ढों से भरी सड़कों की सुध चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद ही क्यों ली गई। अब उद्योग मार्ग के समानांतर सेक्टर-1 स्थित टकसाल से वसुंधरा एन्क्लेव जाने वाले व्यस्त मार्ग के किनारों पर दर्जनों मजदूर लगाकर बड़े-बड़े गड्ढे खोदे जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि ये गड्ढे बिजली की भूमिगत लाइन डालने के लिए खोदे जा रहे हैं।

तसल्ली वाली कुर्सी
कुर्सी वैसे तो बड़े काम की चीज है, लेकिन नेताओं के लिए यह बहुत अजीज भी है। कुर्सी छिन जाए तो नेताजी के साथ-साथ उनके सहयोगी भी परेशान हो जाते हैं। ऐसा ही एक नजारा बीते दिनों तालकटोरा स्टेडियम में दिखा। यहां प्रधानमंत्री की सभा हो रही थी। कार्यक्रम के आयोजक व्यापारी थे, लिहाजा मंच पर उन्ही लोगों बोलबाला था। मंच के आगे 100 से ज्यादा वीवीआइपी कुर्सियां लगी थीं, जिन पर भी ज्यादातर व्यापारी नेता ही विराजमान थे। प्रधानमंत्री के आगमन से थोड़ा पहले पहुंचे एक भाजपा सांसद व उनके सहयोगी खाली कुर्सी की खोज में थे, लेकिन सारी कुर्सियां भरी थीं और कोई भी उठने को तैयार नहीं था। काफी जद्दोजहद के बाद सांसद महोदय को सातवीं कतार में एक कुर्सी मिली, लेकिन उनके साथियों को यह बात अच्छी नहीं लगी और कुछ लोग स्थिति बेहतर करने में जुट गए। किसी तरह इधर-उधर तिकड़म भिड़ाने के बाद सांसद महोदय को पहली कतार में जगह मिल गई। इसी बीच किसी ने कहा कि अब सांसदजी को तसल्ली मिल गई होगी क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री के ठीक सामने वाली कुर्सी जो मिल गई है।

गिनती के दिन
दिल्ली नगर निगम में सीना तानकर चलने वाले मेयरों का समय बीत रहा है। 29 अप्रैल को उनकी विदाई तय है। बदले में दूसरे मेयर शपथ लेने को उतावले हो रहे हैं। बेदिल को ऐसे ही मेयरों के बारे में एक पार्षद ने बताया कि उन्हें लगता था कि वे स्थायी तौर पर मेयर के पद पर चुनकर आए हैं, लेकिन जैसे ही एक साल बीतने को आया और चुनाव की घोषणा हुई, सीना तानकर चलने वाले मेयर झुक गए। अब उन्हें अहसास हो रहा है कि अपने कार्यकाल में किसी का भला कर जाते तो ज्यादा याद किए जाते। अब तो गिनती के दिन ही बचे हैं।

नाकामी का किस्सा
राजधानी के पॉश इलाके में जब भी कोई वारदात होती है तो पुलिस नाकाम साबित होती है। मामला जब हाईप्रोफाइल हो तो पुलिस असली कड़ियों को जोड़कर आगे की जांच नहीं कर पाती। यही वजह है कि हर बार ऐसे मामले अपराध शाखा को सौंप दिए जाते हैं। अपराध शाखा के अधिकारी भी जांच के नाम पर कई दिनों तक अंधेरे में ही हाथ-पैर मारते रहते हैं। ऐसे में कभी-कभी लंबा समय बीत जाने के बाद जांच रोक दी जाती है और मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। ऐसी कई घटनाएं दक्षिणी दिल्ली के पॉश इलाकों में घटीं, जो आज तक अनसुलझी हैं। ऐसा ही एक ताजा मामला सामने आया है, जोकि एक पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे की मौत से जुड़ा है। इसकी जांच भी दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा कर रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अपराध शाखा के काबिल अधिकारी इस मामले को सुलझा पाते हैं या फिर दूसरे मामलों की तरह इसे भी फाइलों में दबा दिया जाता है।

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