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मजबूत दलों पर भारी पड़ सकते हैं बागी

आप में उस हिसाब से बगावत कम है। एक तो उसने टिकट काफी पहले बांट दिया और विरोध होने पर कुछ के टिकट बदल दिए। दूसरा, पंजाब चुनाव हारने के बाद आप से टिकट मांगने वालों की तादाद भी कम हुई है।

Author नई दिल्ली | April 11, 2017 2:29 AM
इस साल दिल्ली नगर निगम चुनाव होने हैं। (प्रतीकात्मक चित्र)

नगर निगमों की सत्ता पाने के दावेदार दलों में रार मचने से चुनाव बहुकोणीय बनता जा रहा है। इससे लगता है कि निर्दलीय, छोटे दलों और बड़े दलों के बागी उम्मीदवार बड़ी तादाद में चुनाव जीतेंगे और अगर नहीं भी जीते तो सत्ता के दावेदार बड़े दलों-भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के समीकरण तो बदल ही देंगे। भारी हंगामे के बाद कांग्रेस और भाजपा के टिकट बंटे। कांग्रेस के तो कई नेता बगावत पर उतारू हुए और विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष अंबरीश गौतम समेत कई नेताओं ने पार्टी छोड़ी। कांग्रेस में अभी करीब पचास बागी उम्मीदवारों के बने रहने की जानकारी मिल रही है। यही हाल भाजपा का भी है। भाजपा ने अपने सभी निगम पार्षदों के टिकट काट दिए। अनेक बागी पार्षद निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं तो कुछ ने जुगाड़ करके अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलवा दिया। आप में उस हिसाब से बगावत कम है। एक तो उसने टिकट काफी पहले बांट दिया और विरोध होने पर कुछ के टिकट बदल दिए। दूसरा, पंजाब चुनाव हारने के बाद आप से टिकट मांगने वालों की तादाद भी कम हुई है।
वैसे भी लोकसभा चुनाव में अन्य के खाते में 10-15 फीसद वोट ही आते हैं। यह संख्या विधानसभा चुनाव में बढ़कर 20-25 फीसद हो जाती है, जबकि निगम चुनाव में यह 30-35 फीसद तक हो जाती है। 2007 में निगम की सीटों की संख्या 13 से बढ़कर 272 होने के बाद से तो अन्य उम्मीदवारों के जीतने का आंकड़ा भी बढ़ गया था। गैर-भाजपा मतों के विभाजन का ही लाभ भाजपा को मिला और उसने करीब 36 फीसद वोट पाकर 2007 और 2012 के निगम चुनाव में जीत हासिल की। 2012 के चुनाव में भाजपा को 138, कांग्रेस को 77 और बसपा को 15 सीटें मिली थीं। 42 सीटें निर्दलीय और छोटे दलों ने जीती थी। नगर निगम में दल-बदल विरोधी कानून लागू न होने से बाद में भाजपा की सीटें बढ़कर 153 हो गई थीं। भाजपा का शासन तीनों नगर निगमों में था जबकि उसको दक्षिणी दिल्ली नगर निगम में बहुमत नहीं मिला था। बहुमत के लिए 53 सीटें चाहिए थीं, लेकिन उसे 44 सीटें ही मिलीं। कांग्रेस 29 सीटें पाने के बावजूद भाजपा का सत्ता का रास्ता नहीं रोक पाई थी।

इस बार कांग्रेस और भाजपा के अलावा आप भी सत्ता की मजबूत दावेदार है और हर सीट पर चुनाव लड़ रही है। आप से निकले और निकाले गए नेताओं की पार्टी स्वराज इंडिया भी चुनाव लड़ रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जद(एकी) भी अनेक सीटों पर मजबूती से जमी हुई है। नीतीश कुमार दो दिन अपने उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार कर भी चुके हैं। इसके अलावा वाम दल, एनसीपी, लोजपा, बसपा, सपा आदि अनेक दल चुनावी मैदान में हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 5 मार्च को रामलीला मैदान में रैली की तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 25 मार्च को। आप के सर्वेसर्वा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 31 मार्च से चुनाव प्रचार शुरू किया इसी बीच दिल्ली सरकार के कामकाज की जांच करने के लिए बनी शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, जिसके आधार पर उपराज्यपाल ने आप के कार्यालय का आबंटन रद्द कर दिया। इसके बाद आप सरकार के सालाना समारोह में तेरह से सोलह हजार प्रति प्लेट खाने का बिल सार्वजनिक हुआ। इन मुद्दों पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हुआ है और निगम चुनाव प्रचार का स्तर गिरने के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। रविवार को राजौरी गार्डन विधानसभा सीट का उपचुनाव हुआ, जिसके नतीजे 13 अप्रैल को आएंगे। यह सीट आप के विधायक जनरैल सिंह के इस्तीफे से खाली हुई। इस चुनाव के नतीजे भी निगम चुनावों पर असर डाल सकते हैं। नाम वापसी के बाद चुनाव प्रचार में तेजी आई है।

 

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