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दिल्ली मेरी दिल्ली: हार का ठीकरा

दो साल पहले प्रचंड बहुमत से दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई आप सही मायने में दूसरे दलों से अलग है।

Author April 17, 2017 3:34 AM
अरविंद केजरीवाल ।

हार का ठीकरा
दो साल पहले प्रचंड बहुमत से दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई आप सही मायने में दूसरे दलों से अलग है। शासन चलाने का अनुभव न होने पर भी उसने किसी अनुभवी व्यक्ति को सलाहकार नहीं बनाया, बल्कि सरकार की ही नई परिभाषा गढ़ दी। इसी कारण दो साल में दिल्ली विधानसभा से पास कराए गए ज्यादातर बिल अटके पड़े हैं और उनके कई फैसलों में मनमानी और भ्रष्टाचार के किस्से शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक होते ही आम जनों तक पहुंच गए। हाल ही में हुए राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में आप उम्मीदवार की जमानत क्या जब्त हुई, आप नेताओं ने जनता के फैसले को स्वीकारने के बजाए हार का ठीकरा जरनैल सिंह के सिर फोड़ दिया, जिन्होंने पार्टी के कहने पर ही इस सीट से इस्तीफा दिया था। उन्हें पंजाब में उपमुख्यमंत्री बनाने की बात कहकर वहां चुनाव लड़वाया गया, अब हार की जवाबदेही उन पर ही थोपी जा रही है। ऐसी घटिया राजनीति तो अब तक किसी दल में नहीं दिखी।
बागियों का डर
भाजपा ने नगर निगम चुनाव में अपने सभी निगम पार्षदों का टिकट काट कर भारी बवाल मोल ले लिया। प्रधानमंत्री मोदी के खौफ से भाजपा का कोई बड़ा नेता उनके पक्ष में खुलकर नहीं बोला, अन्यथा पार्षदों ने अपनी सीट बचाने के लिए हर भाजपा नेता के दरबार में हाजिरी लगाई। जो चालाक थे उन्होंने दाएं-बाएं से अपने रिश्तेदार या करीबी को टिकट दिला दी। कुछ नाराज हो गए तो कुछ बगावत करके निर्दलीय चुनाव लड़ने लगे। इसी बीच राजौरी गार्डन उपचुनाव के नतीजे क्या आए सारा माहौल ही बदल गया। भाजपा को इस सीट को जीत का भरोसा तो था, लेकिन इतने कम मतदान में इतने बड़े अंतर से जीतने की उम्मीद नहीं थी। अब तो बागी नेता भी डरे हुए हैं कि कहीं निगम चुनाव में भी भाजपा जीत गई तो उनका और उनकी बगावत का क्या होगा।
बात में नहीं दम
नगर निगम चुनाव करवाने वाले राज्य निर्वाचन आयोग के मुख्य चुनाव अधिकारी संजय कुमार श्रीवास्तव की गिनती मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के करीबी अधिकारियों में होती है। 2013 में उन्हें मुख्य सचिव बनवाने के लिए केजरीवाल केंद्र सरकार से भिड़ गए थे। संयोग से वह सरकार 49 दिन ही चल पाई थी। बाद में वे केंद्र्र में भाजपा की सरकार बनने पर भाजपा नेताओं के यहां हाथ-पांव मारते दिखे, लेकिन भाजपा ने उन्हें भाव नहीं दिया। दोबारा केजरीवाल की सरकार बनने के समय उन्हें राज्य चुनाव आयोग का मुख्य सचिव बनवा दिया। पंजाब विधानसभा चुनाव हारने के बाद से केजरीवाल ईवीएम के पीछे पड़े हैं और चाहते हैं कि निगम चुनाव बैलेट पेपर से हों। इसके लिए वे चुनाव टालने की मांग भी कर रहे हैं। विरोधी तो यह प्रचार कर रहे हैं कि संभावित हार को देखकर वे पैंतरा बदल रहे हैं, अगर उनकी बातों में दम होता तो उनके करीबी श्रीवास्तव उनकी बात क्यों नहीं मानते क्योंकि निगम चुनाव तो अभी भी कई जगह बैलेट पेपर से हो रहे हैं।
वीआइपी होने का मर्ज
राजधानी के तमाम अस्पतालों में मरीजों का जमावड़ा देखते ही बनता है। मरीजों की संख्या व डॉक्टरों के अनुपात में भारी अंतर है, जिसे देखकर दहशत होती है कि बीमारियों का बोझ कैसे संभाला जाए। इस बीमारियों से भी ज्यादा उन नेताओं को कैसे संभाला जाए, जिनको वीआइपी कहलाने की बीमारी है। ऐसा ही एक मामला देश के एक नामी संस्थान में देखने को मिला, जहां एक पूर्व महिला सांसद ने फोन पर फरमान जारी किया कि उनको अस्पताल आना है इसलिए त्वचा रोग, पेट के मर्ज और कुछ अन्य विभागों के डॉक्टरों को वीआइपी रूम में भेजा जाए। किसी तरह काम निपटा कर डॉक्टर वहां पहुंचे तो पता चला मैडम उस दिन नहीं आने वाली। अगली बार फिर फरमान आया तो डॉक्टर ने ओपीडी में आकर दिखाने को कहा, पर मैडम तैयार नहीं हुर्इं। पता चला उनकी बहन को दिखाना है वह भी वीआइपी रूम में। मरीज को देखने के लिए ओपीडी व मशीनों की दरकार होगी, इतनी छोटी सी बात भी उनके पल्ले नहीं पड़ रही।
किसका होगा भला
निगम चुनाव में इस बार कई सीटों पर बड़े दलों के बागी उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। पहले चुनाव में बागी उम्मीदवार खड़े होते थे, तो वरिष्ठ नेताओं की टीम उन्हें मनाने में जुट जाती थी और काफी हद तक सफल भी होती थी, लेकिन इस बार सारी कमान युवा नेताओं के हाथों में है। वरिष्ठ नेताओं को एक तरफ कर दिया गया है। लिहाजा रूठों को मनाने की कोई सकारात्मक कोशिश भी नहीं हो रही है। भाजपा से के कई पुराने नेता इन चुनावों में निदर्लीय खड़े होकर भाजपा के ही खिलाफ जहर ज्यादा उगल रहे हैं। देखते हैं कि इससे उनका भला होता है या फिर भाजपा का।
-बेदिल

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