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दिल्ली मेरी दिल्ली: प्रत्याशी की कमियां

एक-दो बार जब उन से शिक्षा से जुड़े सवाल किए गए तो उन्होंने जवाब दिया कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं और कानून की पढ़ाई भी की हुई।

सांकेतिक तस्वीर।(Source: Express Photo by Prem Nath Pandey)

बेदिल-

चुनाव के दौर में हर दल के उम्मीदवार अपने प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी की कमियों को खोजते रहते हैं और उसे मुद्दा बनाने का हर संभव प्रयास भी करते हैं। एक ऐसा ही वाकया इन दिनों दक्षिणी दिल्ली संसदीय क्षेत्र में देखने को मिला, जब एक उम्मीदवार ने वर्तमान सांसद और भाजपा के प्रत्याशी की शिक्षा और उनकी कार्यशैली को लेकर सवाल खड़े किए तो सांसद ने जवाब देने का बड़ा ही नायाब तरीका खोज निकाला। उन्होंने अपने प्रचार के लिए जो पोस्टर छपवाए उस पर अपने नाम के आगे एडवोकेट लिख दिया, जिससे पता चल जाए कि उनका पेशा क्या है। हालांकि, एक-दो बार जब उन से शिक्षा से जुड़े सवाल किए गए तो उन्होंने जवाब दिया कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं और कानून की पढ़ाई भी की हुई।

हक की लड़ाई
सफाई कर्मचारियों के हकों की लड़ाई लड़ने वाले एक नेता इस बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। ताज्जुब तो यह भी है कि वे निगम की नौकरी छोड़कर चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं। उनकी पार्टी भी ऐसी है जिसे दिल्ली में जीतना संभव नहीं लग रहा। दिल्ली नगर निगम का यह कर्मचारी इन दिनों बहुजन समाज पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस, भाजपा और ‘आप’ के बीच उन्हें कितना वोट मिलेगा और वे संघर्ष में कहां खड़े हैं इस बात का उन्हें मलाल नहीं है। उन्हें बस इस बात का संतोष है कि वे सफाई कर्मचारियों के हकों की लड़ाई लड़ते-लड़ते आखिरकार लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत तो जुटा पाए। आगे जो होगा देखा जाएगा।

छूट गई विचारधारा
मिले सुर मेरा-तुम्हारा तो सुर बने हमारा। चुनावी मौसम में यह बात चरितार्थ होती दिख रही है। खासकर दल बदलने वालों पर। सालों एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे धुर विरोधी संगठन व दल भी निहित स्वार्थ के लिए एक मंच पर बीते दिनों आए। विचारधारा पीछे छूट गई। यहां तक कि किसी भी राष्ट्रीय दल को भी इससे परहेज नहीं है। वोट लाने वाला कोई हो, पार्टी में आना चाहिए। बीते दिनों प्रदेश कांग्रेस के एक कार्यक्रम में कई भाजपाई शामिल हुए तो लोग चर्चा करते रहे-विचारधारा की बात चुनाव बात होगी। पहले अलग-अलग सुर को एक होने दीजिए। कम से कम 12 मई तक तो मिलने दीजिए। दूसरे ने दबी जुबान से इसे अवसरवादी राजनीति बताया। कहा-अगर वोटर ने नकारा तो 12 मई नहीं तो 23 मई तक के बाद हर हालत में अभी बना ‘हमारा सुर’, हो सकता है फिर ‘मेरा सुर’ में बदल जाएगा।

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