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इंदिरा गांधी और इस नेता की दादी में पटी नहीं, पर हैं राहुल के पक्के दोस्त; 12 साल में जबरन भेजे गए थे दून स्कूल

Lok Sabha Election 2019: ज्योतिरादित्य को नीले रंग और भिंडी की सब्जी काफी पसंद है। वो पिता के साथ गुजरे लम्हों को याद कर कहते हैं कि उनके पिता उन्हें निडर बनाना चाहते थे।

Author नई दिल्ली | May 24, 2019 7:22 AM
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया। (एक्सप्रेस फोटो-रेणुका पुरी)

Lok Sabha Election 2019 से ऐन पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को न केवल पार्टी का महासचिव बनाया बल्कि पश्चिमी यूपी की कमान भी उनके कंधों पर सौंपी गई थी। यह इलाका जाट, गुर्जरों और मुस्लिम बहुल है। सिंधिया को कांग्रेस की तरफ फिर से इस सीट की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। हालांकि इस बार अपनी इस पारंपरिक सीट पर चौंकाने वाला नतीजा आया है और सिंधिया अपनी इस पारंपरिक सीट पर मौजूदा आम चुनावों में हार गए हैं। भाजपा के केपी यादव ने इस बार सिंधिया को गुना सीट पर हरा दिया है। केपी सिंह को जहां 6,10,855 वोट मिले, वहीं सिंधिया मुकाबले में 4,86,105 वोट ही पा सके। इससे पहले मध्य प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव में भी पार्टी ने उन्हें चुनाव प्रचार कमेटी का प्रमुख बनाया था लेकिन सीएम बनने के सवाल पर कमलनाथ बाजी मार गए। एक वक्त ऐसा आया जब लगा कि सिंधिया पार्टी आलाकमान से नाराज हो जाएंगे लेकिन दून स्कूल में साथ-साथ लम्हें गुजार चुके राहुल गांधी ने स्कूली दोस्त को आखिरकार मना लिया।
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ज्योतिरादित्य सिंधिया भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया के बेटे हैं। सिंधिया और गांधी परिवार की दोस्ती भी आठ दशक से ज्यादा पुरानी है। माधव राव सिंधिया और भूतपूर्व पीएम राजीव गांधी भी गहरे दोस्त थे। इससे पहले उनकी दादी भूतपूर्व पीएम इंदिरा गांधी और माधव राव सिंधिया की मां विजया राजे सिंधिया में भी गहरी दोस्ती थी लेकिन बाद में चलकर इन दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा बन गया। राजमाता विजया राजे सिंधिया ने 1957 से 1991 तक आठ बार ग्वालियर और गुना से संसद में प्रतिनिधित्व किया। 1957 में वो पहली बार कांग्रेस के टिकट पर ही जीती थीं लेकिन सीएम पद पर विवाद की वजह से दोनों में टकराव पैदा हो गया और विजयाराजे सिंधिया ने इंदिरा गांधी को चुनौती देते हुए कांग्रेस छोड़ दी। बाद में विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस पार्टी तोड़ दी थी और 35 विधायकों को जनसंघ में शामिल करवा लिया था। इससे एमपी में कांग्रेस की सरकार गिर गई थी।

हालांकि, ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस के साथ जाने का रास्ता चुना। वो राजीव गांधी की सरकार में मंत्री थे। बाद में नरसिम्हा राव की सरकार में भी मंत्री रहे। कांग्रेस के साथ तीसरी पीढ़ी के नेता के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया जुड़े हुए हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि जब वो 12 साल के थे, तभी उनके पिता ने उन्हें जबरन दून स्कूल में डाल दिया था। ज्योतिरादित्य को नीले रंग और भिंडी की सब्जी काफी पसंद है। वो पिता के साथ गुजरे लम्हों को याद कर कहते हैं कि उनके पिता उन्हें निडर बनाना चाहते थे। बतौर ज्योतिरादित्य उनके लिए पिता ने सख्त नियम बना रखे थे, जबकि तीन साल बड़ी बहन चित्रंगदा पर वो नियम लागू नहीं होते थे। हालांकि, सिंधिया कहते हैं कि जब वो पढ़ाई-लिखाई या खेल-कूद में बेहतर परफॉर्म करते तो उनके पिता माधवराव सिंधिया बहुत आनंदित होते थे।

1 जनवरी 1971 को मुंबई में जन्में सिंधिया का लालन-पालन मुंबई में ननिहाल में हुआ लेकिन जब उनके नाम रखने की बारी आई तो घर में बड़ा विवाद हो गया था। कहा जाता है कि उनकी दादी चाहती थीं कि बच्चे का नाम देवता ज्योतिबा के नाम पर रखा जाए लेकिन माधवराव सिंधिया और उनकी पत्नी माधवीराजे ने बच्चे का नाम विक्रमादित्य रखने की सोच रखी थी। बाद में दोनों नामों को मिलाकर ज्योतिरादित्य सिंधिया नाम रखा गया।

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