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ऐसे चुने गए छत्तीसगढ़ के सीएम: खड़गे के घर मुंह मीठा करने को तैयार ही नहीं थे नेता, बघेल ने दे दी थी इस्तीफे की धमकी

राहुल गांधी ने राज्य के प्रभारी महासचिव पीएल पुनिया से पूरी स्थिति पर बात की और अंदरूनी तौर पर यह फैसला लिया गया कि बघेल और सिंहदेव दोनों ढ़ाई-ढ़ाई साल के लिए मुख्यमंत्री रहेंगे।

Author December 18, 2018 12:29 PM
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल, मंत्री टीएस सिंहदेव, तमारध्वज साहू (Photo: PTI)

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वापसी की। राजस्थान में अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया तो मध्य प्रदेश में कमलनाथ को और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को। 11 दिसंबर को नतीजे आने के बाद यह साफ हो गया था कि कांग्रेस तीनों राज्यों में सरकार बनाएगी। लेकिन असली माथापच्ची मुख्यमंत्री उम्मीदवार को चुनने को लेकर हुई। राजस्थान में जहां अशोक गहलोत और सचिन पायलट दावेदार थे तो मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य। वहीं, छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री बनने को लेकर पार्टी के कई नेताओं ने दावेदारी की। यहां तक की सीएम न बनाने पर इस्तीफा देने की बात तक होने लगी। भूपेश बघेल का नाम सीएम के तौर पर घोषित करने से पहले राहुल गांधी और सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने पहले ओबीसी नेता ताम्रध्वज साहू के नाम पर सहमति बना ली थी। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ।

15 दिसंबर की बात है। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर मुंह मीठा करने के लिए लड्डू का डिब्बा रखा हुआ था, लेकिन भूपेश बघेल, टी एस सिंहदेव और चरण दास महंत कोई भी इसे खाने को तैयार नहीं थे। मुंख्यमंत्री के तौर पर साहू के नाम पर लगभग मुहर लग चुकी थी, लेकिन ये तीनों नेता इस फैसले से बिल्कुल ही सहमत नहीं थे। कांग्रेस के एक सूत्र ने बताया, “बघेल और सिंहदेव का मानना था कि पार्टी की जीत में साहू की भूमिका काफी कम थी और उनका जनाधार भी कम है। सिंहदेव भी अपनी असहमति बता चुके थे और कहा कि वे कार्यकर्ताओं से मुलाकात करना चाहते हैं।” बघेल ने तो इस्तीफे तक की धमकी दे दी थी।

स्थिति ऐसी बनी कि सभी को राहुल गांधी के आवास पर बुलाया गया। यहां बघेल और सिंहदेव ने अपने समर्थकों के माध्यम से एक दूसरे से बात की। दोनों के मुख्यमंत्री बनने पर सहमति बनी। सिंहदेव ने कहा कि वे पहले दो साल के लिए मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं और अगले तीन साल तक बघेल सीएम रहेंगे। हालांकि, बघेल ने पहले खुद को सीएम बनाने का तर्क दिया। सूत्र ने बताया, “कांग्रेस अध्यक्ष बदलाव देखना चाहते थे। उन्हें यह पता चला कि जब सिंहदेव और बघेल एक दूसरे के लिए राजी नहीं हुए तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सीएम पद के लिए साहू को चुना।”

राहुल गांधी ने राज्य के प्रभारी महासचिव पीएल पुनिया से पूरी स्थिति पर बात की और अंदरूनी तौर पर यह फैसला लिया गया कि बघेल और सिंहदेव दोनों ढ़ाई-ढ़ाई साल के लिए मुख्यमंत्री रहेंगे। अचानक से साहू सीएम पद के चेहरे से गायब हो गए। इसके बाद वे अपने घर चले गए। बघेल, सिंहदेव और महंत तीनों साहू को समझाने पहुंचे। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने बताया, “महंत को जल्द की स्पीकर बनाए जाने की संभावना है।”

शनिवार की रात तक दिल्ली और रायपुर के पार्टी दफ्तरों में बहस होती रही। रविवार को बघेल का नाम छत्तीसगढ़ के सीएम के तौर पर घोषित किया गया। इससे पहले उन्होंने शपथ नहीं लेने और इस्तीफा तक देने की धमकी दे दी थी। हालांकि, साहू मुख्यमंत्री नहीं बने लेकिन उनके नाम पर लगभग अधिकारिक घोषणा हो चुकी थी। सिंहदेव के पास पद की शेयरिंग के लिए बढि़या विचार था, लेकिन बदलाव के लिए सहमत होना पड़ा।

छत्तीसगढ़ के पर्यवेक्षक के तौर पर चुने गए खड़गे 12 दिसंबर की शाम 5 बजे रायपुर पहुंचे। यहां होटल बेबीलोन इन में उन्होंने सभी 68 विधायकों से एक-एक कर मुलाकात की। रात 2 बजे तक यह मुलाकात जारी रही। पार्टी ने शक्ति एप के माध्यम से करीब 3 लाख कांग्रेस कार्यकर्ताओं के पास उनका विचार जानने के लिए मैसेज भी भेजे। दिल्ली के रहने वाले एक कांग्रेस नेता ने बताया, “13 दिसबंर को खड़गे जब दिल्ली के लिए रवाना हुए, उस समय ऐसा स्पष्ट हो रहा था कि ज्यादातर विधायक सिंहदेव को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते थे। सिंहदेव ने ही पार्टी का घोषणापत्र लिखा था। शक्ति एप से मिले डेटा में भी उन्हें समर्थन मिल रहा था।” अगले दिन चारो दावेदार राहुल गांधी से मिले और करीब 15 मिनट तक प्रत्येक से अलग-अलग बात की गई। एक कांग्रेस नेता जो मुख्यमंत्री दावेदार के साथ ने बताया, “उनसे यह पूछा गया कि छत्तीसगढ़ के लिए लिए आपको पास क्या विजन है। साथ ही इसके फायदे और नुकसान क्या है?”

एक कांग्रेस नेता ने बताया, “पुनिया और दूसरे कांग्रेस महासचिवों ने छत्तीसगढ़ के ओबीसी फैक्टर के बारे में चर्चा की और कहा कि यह एक ओबीसी आबादी वाला राज्य है। ओबीसी वोट की वजह से चुनाव में बदलाव होता है। अगले पांच महीनों में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख राज्य में ओबीसी नेता को आगे करना चाहिए।” महासचिवों की राय पर सिंहदेव को छोड़ बघेल, साहू और महंत तीनों उपयुक्त थे। हालांकि, पूर्व सीएम रमन सिंह को दुबारा सत्ता हासिल होने पर तर्क देते हुए सिंहदेव के समर्थकों ने बताया कि अन्य हिंदी प्रदेशों की तरह यहां जातिय आधारित पहचान की जड़ें गहरी नहीं है।

कांग्रेस नेतृत्व पांच साल के दौरान पद को विभाजित करने पर बनी सहमति के बारे में पब्लिक को निश्चित तौर पर अभी जानकारी नहीं देगी। एक वरिष्ठ नेता ने बताया, “इससे एक गलत संदेश जाएगा, लेकिन जिस तरीके से चीजें बदली, उसमें यही एक विकल्प था। वहां काफी ज्यादा हिचकिचाहट थी और कुछ भी साफ नहीं था। यह राजनीति है और कोई भी मुख्यमंत्री आधा कार्यकाल नहीं चाहता है। 30 महीना लंबा समय होता है और यह तय करेगा कि सरकार कैसी चल रही है? सरकार अपने वादे पर कितना खरा उतर रही है और विधायकों को कैसा महसूस हो रहा है?”

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