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2019 चुनाव से पहले फिर गुटबाजी के शिकार होते दिख रहे शाहनवाज हुसैन

भागलपुर में 2014 की तरह ही बीजेपी में गुटबाजी अभी से परवान चढ़ने लगी है। साथ ही साथ स्थानीय राजनीतिक समीकरण बीजेपी के मिशन 2019 को नया एंगल देने में जुट गए हैं।

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन।(फाइल फोटो)

2014 में भागलपुर से लोकसभा चुनाव हारने के बाद से ही अटल सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे शाहनवाज हुसैन के सितारे गर्दिश में हैं। आलम यह है कि भागलपुर बीजेपी इकाई में भी उनको तवज्जो नहीं मिल रही। यहां तक कि जिला स्तरीय कार्यक्रमों में भी उन्हें रुसवा किया जाने लगा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वाणिज्य मंच का दीपावली मिलन समारोह है। इस समारोह में उन्हें आमंत्रित भी नहीं किया गया। दीपावली के मौके पर छपे निमंत्रण-पत्र में भी शाहनवाज हुसैन को जगह नहीं दी गयी। ऐसे में माना जा रहा है कि भागलपुर में 2014 की तरह ही गुटबाजी अभी से परवान चढ़ने लगी है। साथ ही साथ स्थानीय राजनीतिक समीकरण बीजेपी के मिशन 2019 को नया एंगल देने में जुट गए हैं।

दरअसल, बीते शुक्रवार (9 नवंबर) को बीजेपी वाणिज्य मंच की तरफ से भागलपुर में दीपावली मिलन समारोह हुआ। कार्यक्रम के लिए वाणिज्य मंच के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य संजीव कुमार शर्मा उर्फ लालू शर्मा ने निमंत्रण-पत्र छपवाए। निमंत्रण-पत्र में बीजेपी के शीर्ष नेता पीएम नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के अलावा प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय, सुशील मोदी, अश्विनी चौबे और निशिकांत दुबे सरीखे बड़े नेताओं की फोटो छपी। यहां तक कि अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित चौबे को भी पोस्टर में जगह मिली। लेकिन, अटल सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे और वर्तमान में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन की तस्वीर नदारद थी।

बिहार के भागलपुर में दीपावली मिलन समारोह के निमंत्रण-पत्र से गायब हुए शाहनवाज हुसैन

आमंत्रण छपवाने वाले लालू शर्मा ने शाहनवाज हुसैन को तवज्जो नहीं देने के पीछे अपना तर्क दिया है। उनका कहना है कि शाहनवाज हुसैन ने भागलपुर के लिए कुछ भी नहीं किया। लिहाजा, इस दफा लोगों की मांग है कि बीजेपी किसी स्थानीय नेता को टिकट दे। हालांकि, स्थानीय राजनीति के जानकार इस पहल को 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान हुई गुटबाजी की ही पुनारावृत्ति करार दे रहे हैं।

शाहनवाज हुसैन के लिए 2019 में राह आसान नहीं होने वाली है। पहले ही 2014 में मोदी लहर के बावजूद वह गुटबाजी की भेंट चढ़ चुके हैं और एक बार फिर राजनीतिक परिस्थितियां पुराने ढर्रे पर लौट रही हैं।

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