Bihar Elections 2020 में SSR Case न बन सका मुद्दा, BJP ही भूल गई अपना नारा ‘न भूले हैं, न भूलने देंगे!’

काफी चर्चा और आरोप प्रत्यारोप के बीच सीबीआई को जांच सौंपी गई, पर एम्स से फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट आने के बाद मामला राजनीतिक दलों ने ठंडे बस्ते में डाल दिया।

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Bihar Elections 2020 में अब तक के चुनावी प्रचार में सुशांत का मुद्दा गायब है। ऐसा इसलिए, क्योंकि बेरोजगारी, 10 लाख नौकरी और 19 लाख रोजगार की जबरदस्त चर्चा है। (फोटोः एजेंसी)

Bihar Elections 2020 नजदीक आने के साथ नेताओं के तूफानी दौरे ने सियासी पारा बढ़ा दिया है। पर चुनाव के पहले उठा सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मुद्दा चुनाव आते-आते दूध के उफान जैसे शांत हो गया। यहां तक कि BJP भी अपने नारे “न भूले हैं न भूलने देंगे!” को भूल गई। तीन चरण (पहला- 28 अक्तूबर, दूसरा- तीन नवंबर और तीसरा- सात नवंबर, जबकि 10 को परिणाम) में होने वाले चुनाव में अब तक के चुनावी प्रचार में सुशांत का मुद्दा गायब है। ऐसा इसलिए, क्योंकि बेरोजगारी, 10 लाख नौकरी और 19 लाख रोजगार की जबरदस्त चर्चा है। महागठबंधन का उछाला मुद्दा युवकों को लुभा रहा है। तेजस्वी की सभा में उमड़ती भीड़ से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। जात-पात में बंटे नेता और दल के बीच बेरोजगारी मुद्दा बनेगा, यह अंदाजा किसी को नहीं था।

हालांकि, सुशांत की मौत को संदिग्ध बताकर राजपूत वोटों को एक तरफा बंटोरने की कोशिशें नाकयाब हो गईं। अब रघुवंश बाबू भी कोई मुद्दा नहीं रह गए। वैसे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार की पहली सभा में रामविलास पासवान के साथ रघुवंश प्रसाद सिंह को भी श्रद्धांजलि जरूर दी, मगर चुनाव में यह काफूर है।

तत्कालीन पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडे ने इस्तीफा देकर जदयू का दामन थामा था। वह इसी मुद्दे को भुनाने के मुगालते में आ गए। पर गच्चा खा गए। ध्यान रहे सुशांत की मौत मुंबई में 14 जून को हुई थी। 25 जुलाई को पटना के राजीवनगर थाने में एफआईआर दर्ज की गई। इसमें फ़िल्म कलाकार रिया चक्रवर्ती समेत छह लोगों को आरोपी बनाया गया। तत्कालीन डीजीपी पांडे ने जांच के वास्ते पुलिस टीम मुंबई भेजी, जिन्हें कोविड-19 के तहत महाराष्ट्र पुलिस ने एकांतवास में डाल दिया था। बाद में बिहार सरकार ने मामले को सीबीआई को सौंपने की सिफारिश की थी।

काफी चर्चा और आरोप प्रत्यारोप के बीच सीबीआई को जांच सौंपी गई, पर एम्स से फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट आने के बाद मामला राजनीतिक दलों ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। दिलचस्प बात कि भाजपा ने ‘ना भूले हैं, ना भूलने देंगे!’ का बाकायदा चुनाव में इस्तेमाल के लिए हजारों पोस्टर बनवाए थे। जानकर बताते हैं कि वे भी पार्टी दफ्तर में बोरे से बाहर नहीं आ सके।

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, इसी मुद्दे को जोरशोर से भुनाने के लिए महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस को बिहार का चुनाव प्रभारी बनाया, ताकि एक तीर से दो निशाने साधे जा सके। महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार पर हमला बिहार से किया जा सके। बिहार में राजपूतों का वोट भाजपा के पक्ष में कराया जा सके, पर मगर यह योजना मात खा गई। फडणवीस भी कोरोना संक्रमण का शिकार हो इलाजरत हैं।

हालांकि, एफआईआर और सीबीआई जांच की सिफारिश को भुनाने की कोशिशें जदयू के नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी वर्चुअल रैली के दौरान चर्चा की थी। मगर पार्टी प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने एक ख़बरनीस से इस बात से इन्कार किया है। इनका कहना है कि नीतीश कुमार की मंशा थी कि पीड़ित परिवार को न्याय मिले।

हैरत की बात कि सुशांत के चचेरे भाई व भाजपा के निवर्तमान विधायक नीरज कुमार सिंह बबलू के लिए भी यह मुद्दा चुनाव का मुद्दा नहीं रहा। वे अब मतदाताओं से अपने लिए वोट मांगने के दौरान इसकी चर्चा तक नहीं करते। ये सुपौल ज़िले की छातापुर विधानसभा सीट से कमल फूल निशान से खड़े हैं।

यह अलग बात है कि राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी विधानसभा के सत्र के दौरान इस मुद्दे को पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाने के लिए उठाया था। मगर राजनीतिक तौर पर इसे भंजाने की कोशिश नहीं की। ऐसा पार्टी के महासचिव तिरुपति यादव कहते है।

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