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Bihar Elections 2020: बिहार धीमी गति का समाचार, यहां हर आदमी इंतजार को तैयार, चुनावी रिपोर्टिंग नहीं रही मजेदार- रवीश कुमार की राय, लोग भी दे रहे विचार

Bihar Elections 2020: बकौल रवीश, "इंतज़ार एक ऐसी चीज़ है जिससे बिहारी मानस कभी नहीं उकताता है। बिहार के कितने ही हिस्से में लोग घंटों जाम में बिता देते हैं।"

टेलीविजन पत्रकार रवीश कुमार। (फाइल फोटोः FB)

Bihar Elections 2020 से पहले टेलीविजन पत्रकार रवीश कुमार ने बिहार को लेकर सोमवार को एक Facebook पोस्ट लिखा है। ‘धीमी गति का समाचार- बिहार’ शीर्षक वाले इस लेख में उन्होंने सूबे के मौजूदा हालात पर टिप्पणियां कीं। कहा कि बिहार धीमी गति का समाचार है, जहां हर आदमी इंतजार के लिए तैयार है, जबकि चुनावी रिपोर्टिंग भी अब सूबे में मजेदार नहीं रही है। पत्रकार का यह पोस्ट तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जबकि लोगों ने भी उनकी राय पर अपने विचार दिए।

उन्होंने लिखा, “क्या बिहार को रुकतापुर कहा जा सकता है? सब्र करने और कई दिनों तक इंतज़ार करने में बिहार के लोगों के धीरज का औसत दुनिया में सबसे अधिक होगा। यहां एक छात्र सिर्फ बीए पास करने के लिए तीन साल की जगह पांच से छह साल इंतज़ार करता है। अस्पताल में डाक्टर साहब के आने का घंटों इंतज़ार कर सकता है। किसी दरवाज़े सुबह से शाम से बैठा रह सकता है कि कुछ बोलेंगे। फिर उसके बाद वह कई घंटे कई दिन तक इंतज़ार करता है कि कुछ करेंगे। इस बीच पूजा पाठ भी कर आता है। मन्नत-वन्नत भी मांग आता है।”

बकौल रवीश, “इंतज़ार एक ऐसी चीज़ है जिससे बिहारी मानस कभी नहीं उकताता है। बिहार के कितने ही हिस्से में लोग घंटों जाम में बिता देते हैं। बिहार के लिए इंतज़ार करना सब्र करने की उस विराट योजना का हिस्सा है जिसे हमारे धर्मशास्त्रों में दिए गए मुक्ति आख्यानों के तहत लागू किया गया है। दरअसल बिहार धीमी गति का समाचार है।”

टीवी पत्रकार ने आगे यह भी लिखा- अब चुनाव के बारे में लिखने का मन नहीं करता है। तीस दिनों की चुनावी यात्राओं में की जाने वाली ख़बरें बेमानी हो चुकी हैं। उनकी न तो उस दौरान चर्चा होती है और न उससे कुछ होता है। बिहार पर किसी चुनावी लेख को पढ़ने का उत्साह कम हो गया है। आख़िर कितनी बार जाति समीकरण की कहानी पढूंगा। अगर इसके बारे में कुछ जानने लायक बचा भी है तो भी नहीं जानना चाहता। चुनावी रिपोर्टिंग पूरक रिपोर्टिंग की तरह बची हुई है। कुछ लोग कर रहे हैं। जो मतदाता समस्या भी बताता है वह भी उसी को वोट करता है जिसके कारण समस्या है।

उनके मुताबिक, “बिहार में जनता एक व्यक्ति को खोज रही है ताकि उसे कुर्सी पर बिठाए। इस खोज में जो भी मिल जाता है उसे कई साल बिठाए रखती है। वहां की जनता नीतियों की खोज में नहीं है।वह चुनावों में इसलिए भागीदारी नहीं करती कि नीतियों का विस्तार हो। कार्यसंस्कृति का विस्तार हो। जनता राजनीति में भी रुकी हुई है। वह कई साल तक रुकी रहेगी। जिस राज्य में राजनीतिक गतिशीलता बिहार के बाढ़ की तरह हुआ करती थी वो अब पठार की तरह हो गई है। धीरे धीरे घिसने के लिए।”

खबर लिखे जाने तक रवीश के इस फेसबुक पोस्ट को 530 बार शेयर किया जा चुका था, जबकि 500 के आसपास कमेंट्स किए जा चुके थे। लोगों ने रवीश के लेख पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दीं। संजय कौशिक ने लिखा- सर, आपकी जिजीविषा भी गजब की है। वरना आपकी जगह अगर कोई “सिंथैटिक” – पत्रकार होता, तो कब का भाग गया होता, मैदान छोड़कर, या फिर पाला बदल कर सबके जैसा हो जाता और नैश्नल सिलेबस का पाठ पढ़ाता हमें! हम आपके ऋणी रहेंगे!!! ईश्वर आपको और अधिक साहस व सहनशीलता प्रदान करें ; आप स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों !!!

अविनाश मिश्र बोले, “जनता को इन सब चीज़ों से न पहले मतलब था न अब मतलब है। विकास शब्द भारत मे सिर्फ एक मुखौटा की तरह है जिसके पीछे स्वहित भ्रष्टाचार आदि चीज़े छिपी रहती है।” सकिल खान ने कहा- सर, बिहार में एक तबका ऐसा भी है जो इस सबका इंतजार नहीं करता है। गिरते पड़ते मैट्रिक कर लेता। है और, प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, मेशन, का, काम सीख लेता। है और अपने बच्चों को छोड़कर। जाता है काम करने और वहाँ से पैसा भेजता है। इंडिया में।

कुमार संजय ने लिखा- आपकी विश्वसनीयता बची कहां है, जो आप चुनावों पर कुछ लिखेंगे? पढ़ने से पहले ही पता चल जाता है कि इसके अंदर आपकी पक्षपाती नजरिया का पुलिंदा होगा। अब इसी प्रकार उन पुस्तकों का प्रमोशन करते रहिए जिसमें वामपंथ को थोड़ा खाद पानी मिल जाए।

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