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बिहार चुनावः 49 फीसदी लोग करते हैं खेती, रोजगार पर शोर लेकिन पीछे छूट गए अन्नदाता

बिहार चुनाव में रोजगार का तो खूब जिक्र हो रहा है लेकिन किसानों का कोई भी मुद्दा ऊपर नहीं है। अन्य राज्यों की तरह यहां पर कर्जमाफी के भी वादे नहीं किए गए जबकि राज्य का 49 फीसदी वर्कफोर्स खेती के ही काम में लगा हुआ है।

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बिहार चुनाव में पार्टियां वादे पर वादे कर रही हैं। इस बार रोजगार के मामले में मौजूदा सत्ताधारी दल की विपक्षी पार्टियां बिसात बिछाने का काम कर रही हैं। तेजस्वी यादव ने जनता से 10 लाख रोजगार देने का वादा कर दिया है। हर एक रैली में यही स्वर सुनाई देता है, रोजगार, रोजगार। इस शोर में खेती-किसानी और किसान न जाने कहां गायब हो गया है जबकि राज्य का 49 फीसदी वर्कफोर्स खेती में ही लगा हुआ है। एक सर्वे के मुताबिक छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के बाद यह पांचवां ऐसा राज्य है जिसमें सबसे ज्यादा लोग खेती पर ही निर्भर हैं। बिहार में खेती की दुर्दशा ही यहां के लोगों की कम आय के लिए जिम्मेदार है। बीजेपी और आरजेडी समेत लगभग सभी पार्टियों ने रोजगार को तो अपने मैनिफेस्टो में प्रमुखता दी है लेकिन किसानों को खास जगह नहीं मिली। मध्य प्रदेश, यूपी और महाराष्ट्र की तरह कर्जमाफी भी यहां चुनावी मुद्दा नहीं बन पाता है।

नैशनल स्टेटिस्टिकल ऑफिस के सर्वे के मुताबिक ग्रामीण बिहार में लोगों के पास औसतन 0.242 हेक्टेयर जमीन है जो कि 29 राज्यों में चौथा सबसे कम है। गोवा, केरल और पश्चिम बंगाल में लोगों के पास औसत जमीन की और भी कमी है। आंकड़ों के मुताबिक जीने एक खास वर्ग के पास ही है और बाकी पिछड़ी जातियों के पास खेती योग्य जमीन की बेहद कमी है। एससी, एसटी औबीसी के पास राज्य की कुल भूमि का लगभग 17 फीसदी ही है।

बिहार में मक्का किसानों की भी स्थिति अच्छी नहीं है। किसान अपनी फसल की अच्छी कीमत के लिए परेशान रहते हैं। देश में मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपये तय किया गया है लेकिन राज्य सरकार यहां कीमतों का निर्धारण नहीं करती हैं। भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा मक्का उत्पादक देश है। वहीं 80 फीसदी मक्का बिहार में पैदा होता है। ऐसे में बिना सही कीमत दिलाए किसानों की आय दोगुनी करना संभव ही नहीं है। मौसम की वजह से भी इस बार मक्का किसान परेशान है और वह मक्के की खेती छोड़ने पर विचार करने लगा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक 1951 से 1990 तक बिहार में कृषि से संबंधित क्षेत्र में केंद्र सरकार ने 172 रुपये प्रति व्यक्ति खर्च किए थे। इसी समय में पंजाब ने 594 रुपये खर्च किए। कृषि एक ऐसा स्रोत है जो कि किसी राज्य का आंतरिक स्रोत कहा जा सकता है। 1999-2000 में बिहार सरकार आंतरिक स्रोत से कुल 1982 करोड़ रुपये ही जुटा सकी। वहीं आंध्र प्रदेश की आमदनी 6 हजार करोड़ हुआ करती थी। ऐसे में कहा जा सकता है कि कृषि को नजरअंदाज किया गया और इसके परिणाम सामने हैं।

युवाओँ का बदलता रुख
बिहार की चुनावी जनसभाओं में सरकारी नौकरी मिलने के नाम पर युवा ताली पीटते नजर आते हैं। युवाओं की मनःस्थिति को देखकर ही नेता रोजगार को लेकर वादे कर रहे हैं। दरअसल खेती की खराब हालत की वजह से युवा इस क्षेत्र में जाना ही नहीं चाहता है। मजबूरी में ही लोग कृषि के क्षेत्र मे में काम करते हैं। इस बदलते रुख की वजह से किसानी का मुद्दा बिहार चुनाव से गायब है।

चुनाव में कर्जमाफी का भी जिक्र नहीं
बिहार में नहरों की कमी भी है। 2010-11 के डेटा के मुताबिक यहां 64.8 प्रतिशत खेतों की सिंचाई ट्यूबवेल से होती है जबकि राष्ट्रीय औसत केवल 45 फीसदी का है। इस वजह से भूमिगत जल की कमी हो रही है और जमीनें भी खराब हो रही हैं। बिहार में खेती कम होने की वजह से किसान कर्ज भी कम लेते हैं। ऐसे में कर्जमाफी भी चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाता है।

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