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बिहार चुनावः राज्य में 46 फीसदी से घट कर 20 फीसदी पर पहुंची ब्राह्मण, राजपूत व कायस्थों की भागीदारी, पिछड़े वर्ग का ऐसे बढ़ा दबदबा

साल 1952 के विधानसभा चुनाव में बिहार में पिछड़ी जातियों की राजनैतिक हिस्सेदारी 9.3 फीसदी थी। वहीं अगड़ी जातियों की 46 फीसदी।

bihar election 2020, caste politics, obc vote bank, nitish kumarबिहार की राजनीति में जातीय समीकरण काफी अहम होते हैं। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरणों की अहम भूमिका है या कहें कि बिहार के चुनाव अधिकांशतः जातीय समीकरणों पर आधारित होते हैं तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। बिहार में अगड़ी जातियों का खासा दबदबा रहा है लेकिन अब उनकी जगह पिछड़ी जातियों ने हथिया ली है। बता दें कि पिछले साढ़े छह दशकों में बिहार में पिछड़ी जातियों की राजनैतिक भागीदारी में क्रांतिकारी बढ़ोत्तरी हुई है और आज प्रदेश में पिछ़ड़ी जातियों की हिस्सेदारी बढ़कर 46 फीसदी हो गई है।

दरअसल एक किताब है रेज ऑफ प्लेबिएंस। इसके लेखक क्रिस्टोफर जैफ्रिएट और संजय कुमार हैं। बिहार की राजनीति में बीते 6 दशकों में आए जातीय बदलावों का इस किताब में बखूबी विवरण किया गया है। इस किताब के मुताबिक बीते 6 दशकों में बिहार में अगड़ी जातियों की राजनैतिक हिस्सेदारी 46 फीसदी से घटकर 20 फीसदी रह गई है और अब बिहार की राजनीति के केन्द्र में पिछड़ी जातियां हैं, जिनका राजनैतिक शेयर 9 फीसदी से बढ़कर 46 फीसदी हो गया है।

इस किताब के अनुसार, साल 1952 के विधानसभा चुनाव में बिहार में पिछड़ी जातियों की राजनैतिक हिस्सेदारी 9.3 फीसदी थी। वहीं अगड़ी जातियों की 46 फीसदी। अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 13.9 फीसदी थी। लेकिन उसके बाद से बिहार में अगड़ी जातियों की राजनैतिक हिस्सेदारी में लगातार कमी आयी है और इसके बरक्स पिछड़ी जातियों की हिस्सेदारी हर साल बढ़ी है।

किताब में दी गई जानकारी के अनुसार, अनुसूचित जातियों की बिहार की राजनीति में हिस्सेदारी में खास बदलाव नहीं आया है। साल 1952 में जहां बिहार में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 13.9 फीसदी थी, वो 2015 में मामूली सी बढ़कर 15.6 फीसदी हो गई है।

ओबीसी यानि कि अन्य पिछड़ी जातियों में यादव, कुर्मी, कोरी, कमार, बढ़ई, कानू, गोधी, गंगोता, कहार अहम जातियां हैं, जिनका बिहार की राजनीति में दबदबा बढ़ा है। बिहार की राजनीति में ओबीसी वर्ग के उभार में मंडल राजनीति को जिम्मेदार माना जाता है। इसके बाद लालू यादव के शासनकाल में जिस तरह से पिछड़ी जातियों की सत्ता में भागीदारी रही और फिर नीतीश कुमार के शासन में भी पिछड़ी जातियों का नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग में खासा अहम योगदान रहा। जिसके चलते बिहार में अब अन्य पिछड़ा वर्ग एक बड़ी ताकत बन चुका है और आज बिहार की राजनीति के केन्द्र में है।

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