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Bihar: कांग्रेस प्रत्याशी नहीं होने से आसान हुई औरंगाबाद की लड़ाई, अब मांझी-BJP के बीच होगा मुकाबला

औरंगाबाद में इस बार की लड़ाई कुछ ज्यादा आसान मानी जा रही, क्योंकि मुकाबले में कांग्रेस के निखिल के कुमार नहीं। महागठबंधन की ओर से यह सीट हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के खाते में चली गई है। जबकि राजग की ओर से भाजपा के सुशील कुमार सिंह दोबारा मैदान में हैं।

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Lok Sabha Election 2019: असली चित्तौडग़ढ़ (राजस्थान) में कई बार शासन कर चुकी भाजपा इस मिनी चित्तौडग़ढ़ (औरंगाबाद) पर कब्जे की कई कोशिशों में धड़ाम हुई थी। मोदी लहर में अंतत: पिछली बार फतह पा गई। यह बात दीगर कि विजयश्री आयातित प्रत्याशी के बूते मिली। राजपूताना शान वाली यह इतनी सख्त जमीन है। पहले चुनाव से लेकर अभी तक इलाके पर एक खास बिरादरी का ही कब्जा रहा है। जाति की जंजीर इतनी तगड़ी है। कई बार तीसरा-चौथा कोण भी बना, लेकिन जीत का सेहरा बिरादरी के सिर बंधा। संसदीय क्षेत्र के दायरे में विधानसभा की छह सीटें आती हैं, जिनमें से तीन गया जिला की। जाहिर तौर पर औरंगाबाद की हार-जीत में पड़ोसी गया के मिजाज का भी कुछ न कुछ दखल है।

घरानों के बीच घमासान: कभी यह इलाका छोटे साहब (सत्येंद्र नारायण सिन्हा) और उनके परिवार की संसदीय राजनीति का पर्याय था। पिछले 16 चुनावों में आठ बार यह सीट इसी परिवार के पास रही। अकेले छोटे साहब छह बार जीते। वे कांग्रेस की अंतरिम सरकार के दौर में भी सांसद रहे। उनकी पुत्रवधू श्यामा सिंह और पुत्र निखिल कुमार भी संसद पहुंचे। सियासी समीकरण की वजह से एक दौर के बाद घराने का वजूद दरकिनार हो गया। बाद में रामनरेश सिंह उर्फ लूटन सिंह और उनके पुत्र सुशील कुमार सिंह की पैठ हुई, लेकिन राजद को तो औरंगाबाद ने कभी तवज्जो ही नहीं दी। रामनरेश सिंह एक बार और सुशील कुमार सिंह तीन बार विजयी रहे। गिनती में छोटे साहब के परिवार से आधे मर्तबा की जीत। दिलचस्प यह कि रामनरेश सिंह को छोटे साहब ही राजनीति में आगे बढ़ाए थे।

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वजूद और विजय: पार्टी चाहे कोई भी हो, जीते छोटे साहब ही। एक बहस अक्सर चलती है कि यह रिकार्ड उनके व्यक्तित्व का चमत्कार रहा या लगातार बदली गई पार्टियों के बूते वे संसद पहुंचते रहे। दोनों बातें आधी सही हैं। आधी गलत इसलिए कि प्रभुत्व एक दौर के बाद दम तोड़ गया। अलबत्ता सर्वाधिक मत पाने और और सबसे अधिक मतों से जीतने का रिकार्ड भी छोटे साहब के नाम है। 1957 में उन्हें 63.3 प्रतिशत मत मिले। 1980 में उन्होंने जनता पार्टी (एस) के सिद्धनाथ सिंह को 38.8 प्रतिशत मतों के अंतर से पराजित किया। 2004 के चुनाव में उनके पुत्र और कांग्रेस प्रत्याशी निखिल कुमार महज 7,460 मतों से जीते। उससे नौ गुना अधिक मतों से निखिल कुमार की पत्नी श्यामा सिंह 1999 के चुनाव में विजयी रही थीं।

कांग्रेस का असर: छोटे साहब के दौर से ही औरंगाबाद में कांग्रेस की दुर्गति शुरू हो गई, फिर भी पार्टी मुकाबला करती रही। राजद के सहयोग से पिछली बार उप विजेता की हैसियत रही। 2009 में राजद को दूसरा स्थान मिला था। 1998 में समता पार्टी के सुशील कुमार सिंह विजयी रहे। राजद के वीरेंद्र कुमार सिंह दूसरे नंबर पर। कांग्रेस को महज 24,177 मतों से संतोष करना पड़ा। एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए इससे शर्मनाक स्थिति क्या होगी! जनता दल को 74,972 और भाकपा को 44,605 मत मिले थे। कांग्रेस के मतों से काफी अधिक।

विरोध के वोट बनाम विजय: 1957 में तमाम वोट सिर्फ दो उम्मीदवारों के बीच बंट गए। 1996 में जनता दल के वीरेंद्र कुमार सिंह महज 34.5 प्रतिशत मत पाकर सांसद बन गए, जबकि सीधे मुकाबले से अलग रहे प्रत्याशियों को 35.3 फीसद मत मिले थे। 1967 में विजय दर्ज कराने वाले मुद्रिका सिंह को 39.8 प्रतिशत मिले। उसी चुनाव में अन्य प्रत्याशी 42.2 प्रतिशत मत पाकर दरकिनार हो गए। 1962, 1967, 1989, 1991, 1996, 1998 और 1999 में अन्य प्रत्याशियों को क्रमश: 27.5, 44.2, 14.7, 25.5, 35.3, 26.7 और 16.3 फीसद वोट मिले। उन चुनावों में हार-जीत का फैसला क्रमश: 5.9, 23.8, 10.1, 10.9, 4.3, 12.5 और 10.5 प्रतिशत मतों के अंतर से हुआ।

पिछला परिदृश्य: कुल 13 प्रत्याशियों में तीन महिलाएं थीं। जदयू छोड़कर भाजपा में आए सुशील कुमार सिंह लगातार दूसरी बार विजयी रहे। कांग्रेस के निखिल कुमार को लगातार दूसरी मात मिली। जदयू के बागी प्रसाद वर्मा तीसरा कोण बनाने की कोशिश करते रहे गए।

पहला चुनाव: पहले आम चुनाव में यह क्षेत्र सारण (उत्तर) था। सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने निर्दलीय प्रत्याशी को 40.3 प्रतिशत मतों के अंतर से शिकस्त दी। 18.3 प्रतिशत वोट पाकर सोशलिस्ट पार्टी तीसरे नंबर पर रही।

अब तक के सांसद:

1952: सत्येंद्र नारायण सिन्हा (कांग्रेस)

1957: सत्येंद्र नारायण सिन्हा (कांग्रेस)

1962: ललिता राजलक्ष्मी (एसडब्ल्यूए)

1967: मुद्रिका सिंह (कांग्रेस)

1971: सत्येंद्र नारायण सिन्हा (कांग्रेस ओ)

1977: सत्येंद्र नारायण सिन्हा(लोकदल)

1980: सत्येंद्र नारायण सिन्हा(जनता पार्टी)

1984: सत्येंद्र नारायण सिन्हा (कांग्रेस)

1989/91: रामनरेश सिंह (जनता दल)

1996: वीरेंद्र कुमार सिंह (जनता दल)

1998: सुशील कुमार सिंह (समता पार्टी)

1999: श्यामा सिंह (कांग्रेस)

2004: निखिल कुमार (कांग्रेस)

2009: सुशील कुमार सिंह (जदयू)

2014: सुशील कुमार सिंह (भाजपा)

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