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बिहार चुनाव में भागलपुर का हाल: मुस्लिमों की राय- 1989 दंगों के लिए कांग्रेस को किया माफ; LJP से भाजपा परेशान

भाजपा ने 1990 के बाद भागलपुर सीट को अपना मजबूत किला बनाया और 2010 तक पांच चुनाव जीते, हालांकि 2015 में कांग्रेस ने एक बार फिर इस सीट को हासिल किया।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र भागलपुर | Updated: October 31, 2020 9:50 AM
Bihar Election 2020, Bhagalpurभागलपुर से चार बार के विधायक अश्विनी कुमार चौबे के लोकसभा जाने के बाद भाजपा ने 2015 में यह सीट कांग्रेस को गंवा दी थी।

बिहार चुनाव में पहले चरण के मतदान के बाद अब सभी पार्टियों की निगाहें दूसरे चरण पर लगी हैं। जहां पहले चरण में एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला, वहीं दूसरे फेज में यह दिलचस्प मुकाबला एनडीए और लोजपा के बीच देखने को मिल सकता है। खासकर भाजपा का मजबूत किला माने जाने वाले भागलपुर में। दरअसल, लोजपा प्रमुख चिराग पासवान ने कहा था कि वे राज्य में भाजपा के खिलाफ प्रत्याशी नहीं खड़ा करेंगे, पर दूसरे चरण में कुल पांच ऐसी सीटें हैं, जहां से लोजपा ने भाजपा के खिलाफ प्रत्याशी उतारे हैं। इन्हीं में एक सीट भागलपुर की भी है, जहां चिराग की पार्टी भाजपा का खेल बिगाड़ सकती है।

भागलपुर में ब्राह्मण, बनिया, मारवाड़ी और मुस्लिमों का जोर: भागलपुर विधानसभा सीट के तहत आने वाला ज्यादातर क्षेत्र मुख्य तौर पर शहरी है। यहां पर बनिया, ब्राह्मण, मारवाड़ी और मुस्लिमों का जोर रहा है। इन्हीं समीकरणों को देखते हुए इस बार भाजपा ने जिलाध्यक्ष रोहित पांडे को टिकट दिया है, जो कि ब्राह्मण हैं। वहीं, कांग्रेस ने मौजूदा विधायक अजीत शर्मा को उम्मीदवार बनाया है, वे भूमिहार हैं। लोजपा ने भी इसके जवाब में भागलपुर के डिप्टी मेयर राजेश वर्मा को टिकट दिया है, जो कि मारवाड़ी हैं।

1989 के हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद से ही भागलपुर में टक्कर से बाहर रही कांग्रेस: कांग्रेस सरकार के शासन के दौरान ही 1989 में भागलपुर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए थे, जिसमें हजार से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। इस घटना के बाद कांग्रेस के लिए तो जैसे भागलपुर के दरवाजे बंद हो गए। वहीं, भाजपा ने इस सीट को अपना मजबूत किला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और राम मंदिर आंदोलन और ध्रुवीकरण की बदौलत 1990 से पांच लगातार चुनाव जीते। इनमें से चार बार तो इस सीट पर भाजपा के अश्विनी कुमार चौबे जीते, जो कि ब्राह्मण हैं। 2015 में उन्होंने लोकसभा चुनाव जीतकर यह सीट बेटे के लिए छोड़ दी थी।

हालांकि, कांग्रेस को इसका फायदा मिला और 2015 में पार्टी ने यह सीट भाजपा से छीन ली। कांग्रेस प्रत्याशी शर्मा ने चौबे के बेटे अरिजित शाश्वत को करीब 10 हजार वोटों से हरा दिया था। इस चुनाव में भाजपा के एक बागी नेता को भी 15 हजार 212 वोट हासिल हुए थे, जिससे कांग्रेस को फायदा हुआ। इसके अलावा राजद और जदयू के मुस्लिम वोट हासिल करने की वजह से कांग्रेस की जीत सुनिश्चित हो गई।

कांग्रेस पा जाएंगी 30% मुस्लिम-यादव वोट, बाकी पर लोजपा लगाएगी सेंध: भाजपा के स्थानीय नेताओं का मानना है कि भागलपुर में कांग्रेस 30 फीसदी मुस्लिम-यादव वोटों पर आसानी से कब्जा जमा लेगी। लेकिन बाकी बचे 70 फीसदी वोटों पर लोजपा भी सेंध लगाने आ गई है। वैसे तो 1989 दंगों के लिए जिले का मुस्लिम समुदाय कांग्रेस से नाराज माना जाता है, पर भागलपुर में मुस्लिम अल्पसंख्यक कॉलेज के प्रधानाचार्य सलुद्दीन अहसान का कहना है कि मुस्लिम समुदाय ने 1989 के दंगों के लिए कांग्रेस को माफ कर दिया है।

अहसान ने बताया कि समुदाय की नाराजगी का बड़ा कारण यह था कि दंगों के बाद सीएम सत्येंद्र नारायण सिंह भागलपुर नहीं आए थे। लेकिन राजद के साथ गठबंधन के बाद कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, कई बार यह पार्टी अपीजमेंट पॉलिटिक्स के आरोपों में घिरने के डर से कुछ मुद्दों पर चुप ही रह जाती है।

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