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पिछड़ा हुआ इलाका, पर विकास मुद्दा नहीं

बदायूं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक पिछड़ा हुआ जिला है। मुख्य रेल लाइन पर न होने से इस शहर का विकास नहीं हो सका है। उद्योग यहां लगभग नग्ण्य है। यहां के ज्यादातर लोग खेती किसानी और छोटे-मोटे उद्योग धंधों पर ही अपना गुजर बसर करते हैं।

Author April 22, 2019 2:57 AM
बसपा प्रमुख मायावती के साथ सपा सांसद धर्मेंद्र यादव

शंकर दास

प्रदेश में मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में दो दशक से ज्यादा समय से बदायूं संसदीय सीट सपा का मजबूत किला मानी जाती है। यहां के निवर्तमान सपा सांसद धर्मेंद्र यादव इसबार सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं। भाजपा ने उन्हें कड़ी टक्कर देने के लिए यहां प्रदेश सरकार के श्रम मंत्री और बदायूं के प्रभारी मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी डॉ संघमित्रा मौर्य को चुनाव मैदान में उतारा है। कांग्रेस की ओर से पूर्व सांसद सलीम इकबाल शेरवानी के यहां दमदारी से चुनाव लड़ने से मुकाबला तिकोना हो गया है।

बदायूं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक पिछड़ा हुआ जिला है। मुख्य रेल लाइन पर न होने से इस शहर का विकास नहीं हो सका है। उद्योग यहां लगभग नग्ण्य है। यहां के ज्यादातर लोग खेती किसानी और छोटे-मोटे उद्योग धंधों पर ही अपना गुजर बसर करते हैं। पिछड़ा होने के बावजूद फिल्म गीतकार शकील बदायूंवी के कारण इसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर रही है। राष्ट्रीय राजनीति के दिग्गज नेता शरद यादव 1989 में यहां से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़कर संसद में पहुंचे थे। लेकिन 1991 के चुनाव में राम लहर के कारण इस सीट पर भाजपा के स्वामी चिन्मयानन्द ने चुनाव जीता था। इसके बाद 1996 से अबतक हुए छह चुनावों में लगातार सपा के उम्मीदवारों ने यहां जीत दर्ज की है।

इससे पहले 1962 और 1967 के दो चुनावो में यहां से लगातार भारतीय जनसंघ के ओमकार सिंह चुनाव जीते थे। इससे संकेत मिल रहे हैं कि इस सीट पर कभी जातिवाद तो कभी हिंदुत्व हावी रहा है। पिछले दो बार के 2009 और 2014 के चुनाव जीते धर्मेंद्र यादव इसबार फिर गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं। उन्हें इसबार सपा के अलावा बसपा के जनाधार की जातियों के मतदाताआें से भी दम मिल रहा है। भाजपा की उम्मीदवार डॉ संघमित्रा मौर्य यहां राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही हैं। इस संसदीय क्षेत्र के चार विधानसभा क्षेत्रों गुन्नौर, बिसौली, बिल्सी और बदायंू शहर पर भाजपा का कब्जा है। सिर्फ एक सीट सहसवान पर सपा का विधायक है। चार विधानसभा सीटों पर कब्जा होने के कारण भाजपा यहां काफी मजबूती से लड़ रही है।

कांग्रेस के सलीम शेरवानी अल्पसंख्यक व सवर्ण जातियों के वोटों को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उनके प्रचार के लिए राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य ंिसंधिया भी क्षेत्र मे रैलियां और सभाएं कर चुके हैं। यहां मुसलिम मतों की संख्या साढ़े तीन लाख बताई जा रही है। पिछड़ी जातियों में सबसे बड़ी यादव जाति है जिसके मतदाता लगभग चार लाख हैं। मौर्य मतदाताओं की संख्या भी यहां ढाई लाख है। दूसरी पिछड़ी जातियों में कोरी, कश्यप, धोबी और गडरिया के लगभग डेढ़ लाख मतदाता हैं।

अनुसूचित जातियो में जाटवों के मत लगभग डेढ़ लाख हैं और लगभग इतने ही दूसरी दलित जातियों के मत हैं। सवर्ण जातियों में क्षत्रियों के डेढ़ लाख, वैश्य डेढ़ लाख और ब्राह्मण सवा लाख मतदाता बताए जा रहे हैै। गठबंधन के उम्मीदवार की कोशिश भी अपने वोट बैंक को साधने की है। कांग्रेस यहां सत्ता विरोधी मतों को लामबंद करने की कोशिश में जुटी है। भाजपा राष्ट्रवाद के मुद्दे को आगे कर विरोधियों के जातीय समीकरणों को ध्वस्त कर चुनाव जीतने का प्रयास कर रही है।

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