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Election Result 2018: अम‍ित शाह को बदलना पड़ सकता है ये प्‍लान, तीन मायनस तो केवल 12 राज्‍यों में रह जाएंगे भाजपाई सीएम

Rajasthan, MP, Chhattisgarh Election Result 2018: इन चुनावों के नतीजों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के न केवल विजय अभियान पर बड़ा ब्रेक लगाया है बल्कि उनकी रणनीति को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।

Author December 11, 2018 6:37 PM
भाजपा सांसद और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह। Express photo by Partha Paul.

Rajasthan, MP, Chhattisgarh Election Result 2018: पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के रूझानों और नतीजों ने साफ कर दिया है कि तीन राज्यों (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान) से भाजपा सरकार की विदाई हो रही है। इस तरह अब मात्र 12 राज्यों में ही भाजपा के मुख्यमंत्री रह जाएंगे जबकि सहयोगी दलों के साथ कुल 16 राज्यों में भाजपा की सरकार बचेगी। इन चुनावों के नतीजों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के न केवल विजय अभियान पर बड़ा ब्रेक लगाया है बल्कि उनकी रणनीति को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। बता दें कि अमित शाह को भाजपा का चाणक्य कहा जाता रहा है और उनके नेतृत्व में पार्टी लगातार जीतती आ रही है लेकिन यह पहला चुनाव है, जब हाथ से तीन राज्यों की सत्ता एकसाथ निकली है। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि तीनों ही राज्यों में अमित शाह की रणनीति जीत दिलाने में असफल रही है। इससे पहले शाह की चुनावी रणनीति को जिताऊ फर्मूला बताया जाता रहा है। हालांकि, उनके फार्मूले पर ग्रहण पिछले साल दिसंबर में हुए गुजरात चुनावों के समय से ही लगना शुरू हो गया था जो एक साल बाद और ज्यादा निष्क्रिय होता नजर आया।

मुस्लिमों से किनारा, बाहरी लोगों पर भरोसा: भारतीय जनता पार्टी ने तीन बड़े राज्यों में मुस्लिमों से खुद को दूर रखा। पहले से ही माइनस मुस्लिम फर्मूले पर चल रही भाजपा ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में मात्र एक-एक मुस्लिम उम्मीदवार को खड़ा किया जबकि कांग्रेस ने दोनों राज्यों में कुल 18 उम्मीदवार खड़े किए। इस वजह से मुस्लिम वोटरों का झुकाव कांग्रेस की तरफ रहा, जो कांग्रेस का न केवल वोट फीसदी बढ़ाने में सहयोगी रहा बल्कि उसकी सीटें भी बढ़ सकीं। इसके अलावा अमित शाह ने बाहरी लोगों पर ज्यादा भरोसा किया। जो लोग दूसरे दलों से आए थे उन्हें पार्टी के पुराने वफादारों के मुताबिक ज्यादा तवज्जो दी गई, उन्हें टिकट भी दिया गया लेकिन शाह का ये फार्मूला कारगर नहीं साबित हो सका।

पुराने चेहरों को दरकिनार करना: भाजपा ने तीनों ही राज्यों में करीब 20-30 फीसदी सीटिंग विधायकों का टिकट काटा। इनमें तो कई मौजूदा मंत्री थे। इनकी जगह पार्टी ने नए और युवा चेहरों को अहमियत दी। इस वजह से भाजपा को बागियों का अधिक सामना करना पड़ा। कई सीटों पर तो बागियों ने ही भाजपा का खेल बिगाड़ा है जबकि कई सीटों पर भितरघात से फभाजपा की हार हुई है। अमित शाह का चुनावी टिकट वितरण का यह गुजरात मॉडल इस बार फुस्स नजर आया।

Election Result 2018 LIVE: Rajasthan | Telangana | Mizoram | Madhya Pradesh | Chhattisgarh Election Result 2018

बूथ स्तरीय और पन्ना प्रमुखों की तैनाती: अमित शाह लंबे समय से हरेक राज्य में बूथ स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन करते रहे हैं और पन्ना प्रमुखों के सहारे मतदाताओं को प्रभावित करने की लंबी और दूरगामी रणनीति बनाते रहे हैं। शाह कई सभाओं में कह चुके हैं कि उनके पास सोशल वॉरियर्स की लंबी फौज है जो भाजपा को जीत दिलाने वाले सैनिक हैं। भाजपा इनके सहारे सोशल मीडिया पर कांग्रेस के खिलाफ हमलावर रही है लेकिन इन चुनावों में उनकी यह रणनीति ने ऐसी कामयाबी हासिल नहीं कि पार्टी जीत सके।

हिन्दुत्व और राम मंदिर का दांव: हर बार के चुनावों की तरह इस बार भी भाजपा ने चुनावों से ऐन पहले न केवल हिन्दुत्व का झंडा बुलंद किया बल्कि राम मंदिर का भी राग छेड़ा। अमित शाह के अलावा पीएम नरेंद्र मोदी ने मंदिर निर्माण में रोड़े अटकाने का आरोप कांग्रेस पर मढ़ा। यह भी कहा कि कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में मामले को अटकाती है, लटकाती है। संघ और साधु-संतों ने भी चुनावों से ऐन पहले राम मंदिर का मुद्दा गर्माने की कोशिश की लेकिन इन सबका वोटों में रूपांतरण पहले की अपेक्षा कम होता दिखा। अलबत्ता हिन्दुओं में राम मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा के खिलाफ ही जनाक्रोश उमड़ पड़ा।

एससी/एसटी एक्ट पर अध्यादेश: पांच राज्यों के चुनावों से ऐन पहले केंद्र की भाजपा सरकार ने एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अध्यादेश लाकर दलित मतदाताओं को पक्ष में लामबंद करने की रणनीति बनाई थी लेकिन इस स्ट्रेटजी पर पार्टी को मुंह की खानी पड़ी। उल्टे सवर्ण मतदाता जो भाजपा का कोर वोटर है, वह भी एससी-एसटी एक्ट पर अध्यादेश से खफा हो उठा।

इनके अलावा इन चुनावों में भाजपा ने विकास से जुड़े मुद्दों को कम तरजीह दी और उसके स्टार प्रचारकों ने कांग्रेस के पिछले 60 साल के शासन, नेहरू-गांधी परिवार पर हमला, राहुल गांधी के नाना-नानी पर हमला, कांग्रेस की विधवा पर आक्रोशित करने वाले बयान दिए, जबकि उधर राहुल गांधी ने लगातार राफेल का मुद्दा उठाया। नोटबंदी, जीएसटी से अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की बात कही। किसानों के दर्द और किसान कर्ज माफी की बात कही। इसका फायदा उसे चुनावों में मिलता नजर आ रहा है।

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