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तुष्‍टि‍करण की राह पर मोदी सरकार? इस रास्‍ते चल कर तीन पीएम गंवा चुके हैं कुर्स‍ियां

सवर्ण समाज को साधने के अलावा मोदी सरकार ने पिछले साल एससी/एसटी एक्ट में संशोधन कर अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय के बड़े हिस्से को भी तुष्ट करने की पहल की थी।

Author Updated: January 9, 2019 3:47 PM
2019 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले गरीब सवर्णों को शिक्षा और नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने के मुद्दे को भाजपा से जुड़े लोग जहां मास्टरसट्रोक बता रहे हैं वहीं विपक्षी इसे चुनावी लॉलीपॉप बता रहे हैं। (एक्सप्रेस फोटो)

2019 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले गरीब सवर्णों को शिक्षा और नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने के मुद्दे को भाजपा से जुड़े लोग जहां मास्टरसट्रोक बता रहे हैं वहीं विपक्षी इसे चुनावी लॉलीपॉप बता रहे हैं। कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष के नेता इस प्रावधान वाले संविधान संशोधन बिल की टाइमिंग पर सवाल उठा रहे हैं। साथ ही इसे मोदी सरकार का तुष्टिकरण फार्मूला बता रहे हैं क्योंकि हालिया विधान सभा चुनावों में सवर्ण समाज की नाराजगी का खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा था। ऐसे में कयास लगाए जा रहे थे कि लोकसभा चुनाव में भी सवर्ण समाज भाजपा के खिलाफ वोट कर सकता है लेकिन मोदी सरकार के इस दांव से अब स्थितियां पलट सकती हैं। उधर, इसके खिलाफ बहुजन समाज भी एकजुट हो सकता है।

सवर्ण समाज को साधने के अलावा मोदी सरकार ने पिछले साल एससी/एसटी एक्ट में संशोधन कर अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय के बड़े हिस्से को भी तुष्ट करने की पहल की थी। इतना ही नहीं तीन तलाक पर अध्यादेश और दो बार बिल लाकर मोदी सरकार और भाजपा ने मुस्लिम महिलाओं को भी तुष्ट करने की कोशिश की है। बता दें कि भाजपा तुष्टिकरण का विरोध करती रही है और अक्सर कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाती रही है। इतिहास गवाह रहा है कि देश में कई सत्ताधारी दलों ने तुष्टिकरण की राजनीति की है। कुछ तो फायदे में रहे, जबकि कुछ को सत्ता तक गंवानी पड़ी है।

राजीव गांधी ने गंवाई गद्दी: 1984 के अंत में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर ने लोकसभा की 543 में से कांग्रेस को 401 सीटें दिलाई थीं। राजीव गांधी दोबारा प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल में अगले साल 1985 में 23 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने चर्चित शाहबानो केस में अहम फैसला सुनाया और तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को पति से गुजारा भत्ता लेने का हकदार ठहराया। कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 125 जो तलाकशुदा महिला को गुजारा भत्ता लेने का हकदार बनाता है, वह मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है। तब मुस्लिमों ने इसे शरियत के खिलाफ फैसला बताया। राजीव गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चलते हुए 1986 में संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। इतना ही नहीं 1987 में उन्होंने हिन्दुओं को खुश करने के लिए बाबरी मस्जिद के ताले खुलवा दिए थे लेकिन 1989 के चुनावों में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई और राजीव गांधी को गद्दी छोड़नी पड़ी। कांग्रेस को 207 सीटों का नुकसान हुआ। पार्टी का आंकड़ा 197 तक ही पहुंच सका। हालांकि, तब कांग्रेस के खिलाफ बोफोर्स घोटाले की हवा भी चरम पर थी।

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वीपी सिंह ने गंवाई सत्ता: 1989 में राजीव गांधी के बाद जनता दल के नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी पी सिंह) की अगुवाई में नेशनल फ्रंट की सरकार बनी। वीपी सिंह 1989 के चुनावों में बोफोर्स तोप घोटाले को लेकर राजीव गांधी पर आक्रामक बने रहे थे। जनता दल को 143 सीटें मिली थीं। भाजपा ने उनकी सरकार को समर्थन दिया था। 1990 में वी पी सिंह ने ओबीसी समुदाय को खुश करने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का फैसला किया था लेकिन उनकी सरकार को समर्थन दे रही भाजपा ने इसका जमकर विरोध किया और मंडल के खिलाफ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रामरथ यात्रा की शुरुआत कर दी। आडवाणी का रथ जब बिहार पहुंचा तो वहां के मुख्यमंत्री और जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव ने 23 अक्टूबर, 1990 को समस्तीपुर में उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। इससे नाराज भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और उनकी सरकार गिर गई। बाद में कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर की सरकार बनी। ओबीसी को आरक्षण देने के फैसले के खिलाफ तब देशभर में आंदोलन हुए थे और मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा था। बाद में कोर्ट ने फैसला देते हुए आरक्षण को हरी झंडी दे दी लेकिन उसकी सीमा 50 फीसदी तक सीमित कर दी थी।

नरसिम्हा राव भी हुए शिकार: चंद्रशेखर सरकार गिरने के बाद 1991 में लोकसभा चुनाव हुए। मंडल-कमंडल की लड़ाई के बीच इन चुनावों में कांग्रेस की जीत हुई और पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने। राव को नरम हिन्दूवादी नेता कहा जाता था। 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में कार सेवकों ने बाबरी ढांचा गिरा दिया था। इससे देशभर में तनाव पैदा हुआ था। इस घटना के एक महीने बाद नरसिम्हा राव ने सॉफ्ट हिन्दुत्व की राह पर चलते हुए राम मंदिर बनाने का एक अध्यादेश लाया था। 7 जनवरी, 1993 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उस अध्यादेश पर हस्ताक्षर कर दिए थे। बाद में सरकार ने इस पर बिल भी लाया था। बिल और अध्यादेश के मुताबिक राव सरकार को 60.70 एकड़ जमीन अधिग्रहण करना था, सरकार ने ऐसा कर भी लिया था लेकिन सरकार की योजना थी कि उस पर राम मंदिर, मस्जिद, एक म्यूजियम और एक पुस्तकालय बनवाया जाए। भाजपा ने इसका जबर्दस्त विरोध किया। मुस्लिम संगठनों ने भी इसका विरोध किया था। बाद में कोर्ट ने उस पर स्टे लगा दिया। नतीजतन, अल्पमत की नरसिम्हा राव सरकार न तो हिन्दुओं को और न ही मुस्लिमों को तुष्ट कर सकी और दोनों वर्गों में उनके खिलाफ गुस्सा पैदा हो गया। जब 1996 के चुनाव हुए तो राव की सरकार गिर गई और एक बार फिर से जनता दल की अगुवाई में तीसरे मोर्चे के सरकार बनी।

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