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इत्र नगरी में सपा को भितरघात का भय

कन्नौज में इत्र बनाने के तकरीबन 200 से ज्यादा कारखाने हैं। मुख्यमंत्री रहने के दौरान अखिलेश यादव ने फ्रांस का दौरा किया था और वहां से लौटते ही उन्होंने इंटरनैशनल परफ्यूम म्यूजियम के साथ ही इत्र पार्क बनाने का ऐलान किया था।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और डिंपल यादव फोटो सोर्स- ट्विटर/सपा

उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट अखिलेश यादव की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी है। यहां से पत्नी डिंपल यादव चुनाव मैदान में हैं। वर्ष 2012 के लोकसभा उपचुनाव में वे इस सीट से निर्विरोध सांसद रह चुकी हैं। 1999 से यह सीट समाजवादी पार्टी के कब्जे में है। इस बार चाचा शिवपाल यादव के अलग हो जाने से इस सीट पर समाजवादी पार्टी दो खेमों में बंटी नजर आ रही है। भारतीय जनता पार्टी ने कन्नौज से डिंपल को चुनौती देने के लिए सुब्रत पाठक पर एकबार फिर से भरोसा जताया है जबकि कांग्रेस ने यहां से अपना उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है।

कन्नौज का उदय गुप्तोत्तर काल में महान शासक हर्षवर्धन की राजधानी के रूप में हुआ था। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का उद्गम स्थान होने से इसे कन्नौज कह कर पुकारा जाने लगा। गंगा नदी के दोआब पर बसे इस जिले में समाजवादी विचारधारा का झंडा हमेशा बुलंद होता रहा है। इत्र की सुगन्ध से दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले उत्तर प्रदेश के इस शहर में विकास अब तक जमीन पर कहीं-कहीं ही उतरा है। कन्नौज में इत्र बनाने के तकरीबन 200 से ज्यादा कारखाने हैं। मुख्यमंत्री रहने के दौरान अखिलेश यादव ने फ्रांस का दौरा किया था और वहां से लौटते ही उन्होंने इंटरनैशनल परफ्यूम म्यूजियम के साथ ही इत्र पार्क बनाने का ऐलान किया था।

पांच साल उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने के बाद भी अपने ही गढ़ ने वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव को कन्नौज ने खारिज कर दिया। यहां की पांच विधानसभा सीटों में से सिर्फ एक पर ही समाजवादी पार्टी जीत दर्ज कर पाने में कामयाब हुई। वह भी 2400 मतों के अंतर से। बाकी की सभी चार सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने कब्जा जमा लिया। दो वर्ष पहले हुए विधानसभा के चुनावों में अपने ही गढ़ में अखिलेश यादव की इतनी करारी हार, लोकसभा चुनावों में उन्हें परेशान किये हुए है।

समाजवादी विचारधारा के जनक डॉ राम मनोहर लोहिया की कर्मभूमि रहे कन्नौज में इस बार समाजवादी पार्टी भितरघात की आशंका से दोहरी है। उसकी पेशानी पर बल शिवपाल सिंह यादव पैदा कर रहे हैं। यादव मतदाताओं की संख्या यहां अधिक होने से शिवपाल के समर्थकों की संख्या भी यहां खासी है। सिर्फ 1984 में इस लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। इंदिरा गांधी के निधन के बाद उपजी सहानभूति लहर में शीला दीक्षित यहां से सांसद बनी थीं। इस बार कांग्रेस ने यहां अपना प्रत्याशी नही उतारा है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक कन्नौज की जनसंख्या 16 लाख 57 हजार है। इनमें 16 फीसद यादव, 36 फीसद मुसलमान, 15 फीसद ब्राह्मण और करीब 10 फीसद राजपूत हैं। जबकि ओबीसी मतदाताओं में लोधी, कुशवाहा, पटेल, बघेल मतदाताओं की संख्या भी यहां खासी है। ऐसे में अल्पसंख्याक मतों का बिखराब रोकना अखिलेश यादव के लिए बड़ी चुनौती है।

डिंपल ने कन्नौज के सैदपुर सकरी गांव को गोद लिया था। जिसे दो साल में शीर्ष के पांच आदर्श ग्रामों में पंहुचा दिया है। डिंपल के गांव ने नरेंद्र मोदी के गांव को भी पीछे छोड़ दिया। पक्की सड़कें, पीने के लिए शुद्ध पानी, बिजली, शौचालय, प्राथमिक शिक्षा और चिकित्सा केंद्र । सब कुछ इस गांव में है। डिंपल यादव ने दूसरे गोद लिए गांव छिबरामऊ जिले के रौसेन में भी विकास कार्य कराए हैं। बावजूद इसके विधानसभा चुनावों में यहां की पांच में से चार सीटें जीत कर भाजपा ने अखिलेश के गढ़ में पांव जमा लिए हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होता है कि इस बार मतदाता किस दल पर अपना भरोसा जताते हैं?

ऐसा रहा काम

कन्नौज लोकसभा सीट से 2014 में दूसरी बार जीतीं डिंपल यादव की लोकसभा में मौजूदगी 31 प्रतिशत रही। कन्नौज लोकसभा में विकास कार्य के लिए सांसद डिंपल यादव ने छह से सात करोड़ की धनराशि के प्रस्ताव शासन को भेजे। जो डीआरडीए तथा ग्रामीण अभियन्त्रण विभाग में लम्बित पड़े हैं। विगत दो वित्तीय वर्ष से शासन द्वारा सांसद निधि निर्गत न किए जाने से 27 छोटी सड़कें ग्रामीण अभियन्त्रण विभाग में तथा डीआरडीए विभाग में 42 सड़कें लम्बित हैं।

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